भारतकोश
अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary

लौगाक्षि भास्कर द्वारा

DevanagariHindipublished84 पृष्ठ

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शादि द्रव्य त्यागसे यागजन्य उत्पत्त्यपूर्व द्वारा फलापूर्वरूप अदृष्ट प्रयोजनको और देवताके उद्देश्य होनेसे देवता स्मरण रूप दृष्ट प्रयोजनको करता है । आरादुपकारकाणि । द्रव्याद्यनुद्दिश्य केवलं विधीयमानं कर्म आरादुपकारकम् । यथा प्रयाजादि । आरादुपकारकं च परमापूर्वोत्पत्तावेवोपयुज्यते । संनिपत्योप- कारकं तु द्रव्यदेवतासंस्कारद्वारा यागस्वरूपेऽप्युपयुज्यते । इदमेव चाश्र- यि कर्मेत्युच्यते । तदेवं निरूपितः संक्षेपतो विनियोगविधिः । द्रव्यादि रूप उद्देश्यके बिना ही केवल विधीयमान जो कर्म उसे आरादुपका- रक कहते हैं । जैसे प्रयाजादि । आरादुपकारक की उपयोगिता परमापूर्वोत्पत्तिमें ही होता है । ससन्निपत्योपकारक की तो याग स्वरूप और द्रव्य देवता संस्कार द्वारा यागोत्पत्त्यपूर्वमें भी उपयोगिता होती है । (इदं) सन्निपत्योपकारकको ही मीमांसा में आश्रयि कर्मपदसे व्यवहार करते हैं । इस तरह संक्षेपसे विनियोग विधिको निरूपण हो गया ॥ प्रयोगविधिः । प्रयोगप्राशुभावबोधको विधिः प्रयोगविधिः स चाङ्गवाक्यैकवाक्यता- तापन्नः प्रधानविधिरवे । स हि साङ्गं प्रधानमनुष्ठापयन्विलम्बे प्रमाणा- भावादविलम्बापरपर्यायं प्रयोगप्राशुभावं विधत्ते । न च तद्विलम्बेऽपि प्रमाणाभाव इति वाच्यम् । विलम्बे हि अङ्गप्रधानविध्येकवाक्यतावगत- तत्साहित्यानुपपत्तिः । विलम्बेन क्रियमाणयोः पदार्थयोरिदमनेन सह- कृतमिति साहित्यव्यवहाराभावात् । स चाविलम्बो नियते क्रमे आश्रीय- माणे भवति । अन्यथा हि किमेतदनन्तरमेतत्कर्तव्यमेतदनन्तरं वेति प्रयोगविक्षेपापत्तेः । अतः प्रयोगविधिरवे स्वविधेयप्रयोगप्राशुभावसिद्धयर्थं नियतं क्रममपि पदार्थविशेषणतया विधत्ते । अत एवाङ्गानां क्रमबोधको विधिः प्रयोगविधिरित्यपि लक्षणम् । प्रयोगप्राशुभाव (प्रयोगको शीघ्र करनेके ) बोधक वाक्यको प्रयोग विधि कहते हैं प्रयाजादि अंग वाक्योंके साथ एकवाक्यता होने पर 'दर्शपूर्णमासाभ्यां स्वर्गकामो यजेत' इत्यादि प्रधान विधिको ही प्रयोग विधि कहते हैं। क्योंकि अंग सहित प्रधान प्रयोगके विलम्ब होनेमें किसी प्रमाणके नहीं रहनेके कारण प्रधान विधि ही अंग सहित प्रधान कर्ममें प्रवृत्ति कराती हुई अविलम्ब नामक