भारतकोश
अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary

लौगाक्षि भास्कर द्वारा

DevanagariHindipublished84 पृष्ठ

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प्रयोग प्राशुभाव ( शीघ्रता ) का विधान करती है । यहां यह शंका होती है कि जैसे प्रयोग विलम्बमें कोई प्रमाण नहीं है वैसे ही प्रयोगकी शीघ्रतामें भी कोई प्रमाण नहीं है । इसका उत्तर यह है कि प्रयाजादि अंग और दर्शादि प्रधान विधि की एकवाक्यतासे उन दोनोंके साहित्य ( साथ ) का ज्ञान होता है । यदि प्रयोगमें विलम्ब होगा तो साहित्यकी उत्पत्ति नहीं होगी । क्योंकि जैसे 'पूर्व और पर दिनोंमें किये गये अध्ययनादिकार्योंमें "आजका अध्ययन पूर्व दिनके अध्ययनसे सहकृत है" ऐसा व्यवहार नहीं होता है इसी तरह विलम्बसे किए गये अंग और प्रधानमें "अंग सहकृत प्रधान है" ऐसा साहित्य का व्यवहार नहीं होगा जब क्रम नियत रहता है तभी अंग और प्रधानका अविलम्ब होता है । जैसे पहले आग्नेय हविष्का अभिधारण ( पिघला हुआ घृतसे सेचन ) करना चाहिए तब ऐन्द्रदधि हविष्का अभिधारण करना चाहिए । एवं उसके बाद आग्नेय यागका अनुष्ठान तदनन्तर ऐन्द्रयागका अनुष्ठान करना चाहिए । यही क्रम नियत है ( अन्यथा ) ऐसा क्रम नहीं स्वीकार करने पर "क्या आग्नेय हविष् अभिधारणके बाद ऐन्द्रदधि हविष्का अभिधारण करना चाहिए अथवा ऐन्द्रदधि हविष् अभिधारणके बाद आग्नेय हविष्का अभिधारण करना चाहिए ?" ऐसा सन्देह होनेसे प्रयोगविक्षेप ( सभी अनुष्ठानका नाश ) हो जायगा । अर्थात् 'संशयात्मा विनश्यति' इस वचनसे ऐहलौकिक सुख साधनमें भी जब संशयात्मा की प्रवृत्ति नहीं होती तब पारलौकिक सुख साधनमें प्रवृत्ति होना तो सुतरां असंभव है । अतः प्रयोगविधि ही अनुष्ठानोंकी अविलम्बसे सिद्धिके लिये नियत क्रम का विधान करेगी । पदार्थ ( क्रिया ) में क्रम विशेषण है अतः वाक्यभेद नहीं होगा क्योंकि विशेष विशिष्टके विधानसे वाक्यभेद नहीं होता किन्तु अलग २ विधानसे ही वाक्यभेद होता है । अतएव प्रयोग विधिसे क्रमविशिष्टके विधान होनेके कारण "अंगोंके क्रम बोधक विधिको प्रयोग विधि कहते हैं" ऐसा भी लक्षण हो सकता है ॥ क्रमस्वरूपम् । तत्र क्रमो नाम विततिविशेषः, पौर्वापर्य्यरूपो वा । क्रम बोधक पद-घटक ( एकदेश ) क्रम पदार्थ क्या है ? ऐसी आकांक्षा होने पर क्रमका लक्षण करते हैं-वितति ( विस्तार ) विशेषको ही क्रम कहते हैं । यहां पर वितति विशेषको क्रमका लक्षण करने पर अनेक व्यक्तियोंसे युगपत् अनुष्ठित