भारतकोश
अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary

लौगाक्षि भास्कर द्वारा

DevanagariHindipublished84 पृष्ठ

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दीपिकाटीकासहितः । ४१ पदार्थोंमें अतिव्याप्ति होगी क्योंकि अनेक कर्त्ताओं द्वारा यौगपद्येन ( एक समय में ) किये गये कार्योंमें भी विस्तार है परन्तु वहां पर क्रमका व्यवहार नहीं होता अतः दूसरा लक्षण कहते हैं—पौर्वापर्य्य ( पूर्वोत्तरभावेन स्थित ) को क्रम कहते हैं ॥ श्रुत्यादिषट्प्रमाणानि । तत्र षट् प्रमाणानि — श्रुति-अर्थ-पाठ-स्थान-मुख्य-प्रवृत्त्याख्यानि । क्रमके नियममें ६ प्रमाण है जैसे श्रुति, अर्थ, पाठ, स्थान, मुख और प्रवृत्ति । श्रुतिलक्षणम् । तत्र क्रमपरवचनं श्रुतिः । तच्च द्विविधम्—केवलक्रमपरं तद्विशिष्ट- पदार्थपरं चेति । तत्र ‘वेदं कृत्वा वेदिं करोती’ति केवलक्रमपरं, वेदि- करणादेर्वचनान्तरप्राप्तत्वात् । ‘वषट्कर्तुः प्रथमभक्ष’ इति तु क्रमविशिष्ट- पदार्थपरम् । एकप्रसरताभङ्गभयेन भक्षानुवादेन क्रममात्रस्य विधातुमशक्य- त्वात् । सेयं श्रुतिरितरप्रमाणापेक्षया बलवती । तेषां वचनकल्पनद्वारा क्रमप्रमाणत्वात् । अत एवाश्विनग्रहस्य पाठक्रमात्तृतीयस्थाने ग्रहणप्रसक्तौ आश्विना दशमो गृह्यत इति वचनाद्दशमस्थाने ग्रहणमित्युक्तम् । वृत्ति ( शक्ति अथवा लक्षणा ) से क्रम बोधक शब्दको श्रुति कहते हैं । श्रुति के दो भेद हैं, केवल क्रम बोधक और ‘क्रमविशिष्ट पदार्थ बोधक’ । ‘वेदं कृत्वा वेदिं करोति” यहां पर केवल क्रमका विधान है इसका अर्थ है कि—वेद ( कुशमुष्टि विशेष ) को करनेके बाद वेदि ( आहवनीयदेश और गार्हपत्यके मध्यमें चार अंगुलके खात—गड्ढाको वेदि कहते हैं जहाँ पर हवि विशेष डाला जाता है ) करनी चाहिए । यहां पर वेदिकरण वचनान्तरसे ही प्राप्त है केवल क्त्वा प्रत्ययसे क्रमका विधान होता है । एवं ‘वषट्कर्तुः प्रथमभक्षः’ यहां पर प्राथम्यविशिष्ट भक्षका विधान है अतः यह क्रमविशिष्ट पथार्थ बोधकका उदाहरण है । यहां पर भी भक्षको उद्देश्य करके प्राथम्य मात्रका विधान नहीं होता क्योंकि भक्षका विधान वचनान्तरसे प्राप्त नहीं है अतः इसी ( वषट्कर्तुः प्रथमभक्षः ) वाक्यसे यदि पहले भक्षका विधान करके पुनः भक्षका अनुवाद कर प्राथम्यका विधान करेंगे तो सर्व- मतसिद्ध एकप्रसरता ( एकवाक्यता ) का भंग हो जायगा । अतः प्राथम्यविशिष्ट भक्षका ही विधान होता है इसलिये विधेय होनेसे एकवाक्यताका भंग ( वाक्यभेद )