भारतकोश
अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary

लौगाक्षि भास्कर द्वारा

DevanagariHindipublished84 पृष्ठ

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नहीं होगा । यह श्रुति अर्थादि प्रमाणों की अपेक्षा बलवती है, क्यों कि क्रमबोधक वचनकी कल्पना करने पर ही क्रममें अर्थादि प्रमाण हो सकते हैं और श्रुतिमें क्रमबोधक वचन प्रत्यक्षसिद्ध है अतः उसकी कल्पना नहीं करनी पड़ती । श्रुतिको सबसे प्रबल होनेसे ही ज्योतिष्टोम यागमें ऐन्द्रवायवादिग्रहोंमें आश्विनग्रह (सोम- ग्रह ) का तृतीय स्थानमें पाठ होने पर तृतीय स्थानमें ग्रहणकी प्राप्ति होने पर भी 'आश्विनो दशमो गृह्यते' इस वचनसे दशम स्थानमें ग्रहण होता है । अर्थात् पाठ, क्रमका बोधक नहीं होता है किन्तु बिना क्रमसे पाठकी अनुपपत्ति होती हैं अतः पाठसे क्रमकी कल्पना करते हैं । किन्तु 'दशमः' यह श्रुति साक्षात् क्रम बोधक है अतः पाठसे श्रुति प्रबल है । अर्थक्रमलक्षणम् । यत्र प्रयोजनवशेन क्रमनिर्णयः सोऽर्थक्रमः । यथा 'अग्निहोत्रं जुहो- ति', 'यवागूं पचति' त्यग्निहोत्रयवागूपाकयोः । अत्र हि यवाग्वा होमार्थ- त्वेन तत्पाकः प्रयोजनवशेन पूर्वमनुष्ठीयते । स चायं पाठक्रमाद् बलवान् । यथापाठं ह्यनुष्ठाने क्लृप्तप्रयोजनबाधोऽदृष्टार्थत्वं च स्यात् । न हि होमान- न्तरं क्रियमाणस्य पाकस्य किञ्चिद् दृष्टं प्रयोजनमस्ति । प्रयोजनसे जहां क्रमका निश्चय हो उसको अर्थ क्रम कहते हैं । जैसे अग्नि- होत्रहोम और यवागूपाक ( लपसी अर्थात् कम घी का हलुआ ) में अर्थ क्रम है। क्योंकि यहां पर यवागू होमके लिए बनायी जाती है इसलिये होम रूप प्रयोजनसे यवागू-पाक, अग्निहोत्र होमसे पहले किया जाता है । यदि होमसे पीछे यवागू-पाक हो तो 'यवाग्वा अग्निहोत्रं जुहोति' यह वचन व्यर्थ हो जायगा । अर्थक्रम पाठक्रमसे बलवान् होता है । क्योंकि पाठके अनुसार पहले होम और पीछे यवागू-पाक किया जाय तो (क्लृप्त) निश्चित प्रयोजन (यवागूसे अग्निहोत्र होम रूप) का बाध हो जायगा और यवागूपाकका अदृष्ट ( अप्रत्यक्ष ) प्रयोजन मानना पड़ेगा । क्योंकि होमके बाद यवागूपाकका कोई दृष्ट प्रयोजन नहीं है । यदि पहले यवागूपाक होता है तो उसका होमरूप दृष्ट प्रयोजन होता है । पाठक्रमलक्षणम् । पदार्थबोधकवाक्यानां यः क्रमः स पाठक्रमः । तस्माच्च पदार्थानां क्रम आश्रीयते । येन हि क्रमेण वाक्यानि पठितानि तेनैव क्रमेणाधीता-