अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)
Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary
लौगाक्षि भास्कर द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदीपिकाटीकासहितः । ४३ न्यर्थप्रत्ययं जनयन्ति । यथाप्रत्ययं च पदार्थानामनुष्ठानम् । स च पाठो द्विविधः — मन्त्रपाठो ब्राह्मणपाठश्चेति । तत्राग्नेयाग्नीषोमीयोस्तत्तद्याज्या- नुवाक्यानां पाठाद्यः क्रम आश्रीयते स मंत्रपाठात् । पदार्थ बोधक (कहने वाला) वाक्योंका जो क्रम है उसको पाठक्रम कहते हैं । पाठक्रमसे पदार्थोंका क्रम जाना जाता है । क्योंकि जिस क्रमसे वाक्यका पाठ रहता है उसी क्रमसे पढ़ा जाता है । और उसी क्रमसे अर्थोंका ज्ञान होता है । बादमें (यथाप्रत्ययं) जिस क्रमसे पदार्थोंका ज्ञान होता है उसी क्रमसे पदार्थोंका अनुष्ठान होता है । इस पाठके दो भेद हैं—मंत्रपाठ और ब्राह्मणपाठ । स चायं मन्त्रपाठो ब्राह्मणपाठाद् बलीयान्, अनुष्ठाने ब्राह्मण- वाक्यापेक्षया मन्त्रपाठस्यान्तरङ्गत्वान् । ब्राह्मणवाक्यं हि प्रयोगाद् बहिरेवेदं कर्तव्यमिति अवबोध्य कृतार्थम् । मन्त्राः पुनः प्रयोगकाले व्याप्रीयन्ते, अनुष्ठानक्रमस्य स्मरणक्रमाधीनत्वान् । तत्क्रमस्य च मन्त्रक्रमाधीनत्वादन्तरङ्गोऽयं मन्त्रपाठ इति । प्रयाजानां 'समिधो यजति, तनूनपातं यजति' इत्येवंविधपाठक्रमाद्यः क्रमः स ब्राह्मणपाठ- क्रमात् । यद्यपि ब्राह्मणवाक्यान्यर्थं विधाय कृतार्थानि तथापि प्रयाजादीनां क्रमस्मारकान्तरस्याभावात्तान्येव क्रमस्मारकत्वेन स्वीक्रियन्ते । मंत्रपाठ क्रमका उदाहरण देते हैं—आग्नेय और अग्नीषोमीय यागमें तत्तत् याज्या और आनुवाक्याओंके पाठसे जो क्रम लिया जाता है वह मंत्रपाठ क्रमसे ही समझना चाहिये । अर्थात् अग्नीषोमीय यागको तैत्तिरीय ब्राह्मणके पञ्चम प्रपाठके द्वितीय अनुवाकमें कहा है और आग्नेययागको षष्ठ प्रपाठके तीसरे अनुवाक में कहा है परन्तु मन्त्रपाठमें प्रथम आग्नेय यागका मन्त्र है पश्चात् अग्नीषोमीय याग का मंत्र है । अतः मन्त्रपाठ क्रमसे प्रथम आग्नेय यागका ही अनुष्ठान होता है पीछे अग्नीषोमीय यागका अनुष्ठान होता है । यहां पर यह शंका उठती है कि ब्राह्मणपाठ क्रमसे प्रथम अग्नीषोमीय यागका ही अनुष्ठान क्यों नहीं होता ? इसका उत्तर करते हैं कि ब्राह्मणपाठसे मन्त्रपाठ बलवान् होता है क्योंकि अनुष्ठानमें ब्राह्मणवाक्यकी अपेक्षा मंत्र पाठ अन्तरंग (स्वसमीप ) है । मंत्रपाठ को अन्तरंग सिद्ध करते हैं—प्रयोग (अनुष्ठान) से पृथक् ही 'अग्नी- षोमीय याग करना चाहिए" इस तरह समझा कर ब्राह्मणवाक्य चरितार्थ हो जाता है और मंत्र तो अनुष्ठानकालमें ही व्यापार करता है क्योंकि जिस तरह स्मरण होता ४ अ० सं०