भारतकोश
अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary

लौगाक्षि भास्कर द्वारा

DevanagariHindipublished84 पृष्ठ

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४४ अर्थसंग्रहः— है उसी तरह अनुष्ठान किया जाता है और जिस तरह मंत्रका पाठ रहता है उसी तरह स्मरण होता है । इसलिये मंत्रपाठ अन्तरंग है संसारमें भी लोग अन्तरंग का ही कार्य करते हैं । अतः मन्त्रपाठ प्रबल है। अब ब्राह्मण पाठक्रमका उदाहरण देते हैं-प्रयाजयागोंमें (समिधो यजति, तनूनपातं यजति) इस तरह पाठसे जो क्रम लिया जाता है वह ब्राह्मण पाठ क्रमसे ही समझना चाहिये । यद्यपि ब्राह्मण वाक्य अर्थ समझा कर चरितार्थ हो जाता है तथापि प्रयाजादि यागोंका स्मारक कोई दूसरा नहीं है अतः ब्राह्मण वाक्य ही क्रमका भी स्मारक होता है । स्थानलक्षणम् । स्थानं नामोपस्थितिः । यस्य हि देशे योऽनुष्ठीयते तत्पूर्व्तने पदार्थे कृते स एव प्रथममुपस्थितो भवतीति युक्तं तस्य प्रथममनुष्ठानम् । अत एव साद्यस्के-अग्नीषोमीय-सवनीया-नुवन्ध्यानां सवनीयदेशे सहानुष्ठाने कर्तव्ये आदौ सवनीयपशोरनुष्ठानमितरयोः पश्चात् । तस्मिन्देशे आश्विन- ग्रहणानन्तरं सवनीयस्यैव प्रथममुपस्थितिः । उपस्थितिको स्थान कहते हैं । अर्थात् प्रकृति यागके नानादेशोंमें वर्तमान पदार्थोंका विकृति यागमें अतिदेश वचनसे एकदेशमें अनुष्ठान करना हो तो जिसके देशमें अनुष्ठान करेंगे उसका पहले अनुष्ठान होता है पश्चात् दूसरोंका अनुष्ठान होता है इसीको स्थान क्रम कहते हैं । अर्थात् उक्त उपस्थित विशेषसे जो अनुष्ठान क्रम ज्ञात होता है उसीको स्थान क्रम कहते हैं । क्योंकि जिसके देशमें जो अनुष्ठान किया जाता है उससे पूर्ववर्ति पदार्थोंका अनुष्ठान कर लेने पर दूसरोंकी अपेक्षा उसीकी पहले उपस्थिति होती है । अतः उसका ही प्रथम अनुष्ठान करना उचित है । (अतएव) प्रथमोपस्थितका प्रथम अनुष्ठान करना उचित होनेके कारण ही साद्यस्क ( सोमयाग ) में सवनीयदेशमें अग्नीषोमीय, सवनीय और आनुवन्ध्य पशुओंका एकसाथ अनुष्ठानकी प्राप्ति होने पर भी प्रथम सवनीयपशुका ही अनुष्ठान होता है पश्चात् अग्नीषोमीयपशु और आनुबन्ध्यपशुका अनुष्ठान होता है । क्योंकि सवनीय देशमें आश्विन ग्रहण ( सोमग्रह ) के बाद सवनीय की ही प्रथम उपस्थिति है । तथा हि ज्योतिष्टोमे त्रयः पशुयागाः-अग्नीषोमीयः सवनीय आनुब- न्ध्यश्चेति । ते च भिन्नदेशाः-अग्नीषोमीय औपवसथ्येऽह्नि, सवनीयः सुत्याकाले, आनुबन्ध्यस्त्वन्ते । साद्यस्को नाम यागविशेषः । स चाव्यक्त-