अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)
Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary
लौगाक्षि भास्कर द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६४ | अर्थसंग्रहः- रहनेके कारण द्रव्य और देवता स्वरूप यागका स्वरूप ही नहीं बनेगा अतः 'वैश्वदे- वेन यजेत' वह विधि व्यर्थ हो जायगी । अतः गुणका ही विधान है । तब सिद्धान्त करते हैं कि उत्पत्ति वाक्यसे विहित आग्नेयादि आठों यागोंका 'यजेत' पदसे अनुवादकर उन आठोंके समुदायका वैश्वदेव नाम विधान किया जाता है। द्रव्य देवताका श्रवण न रहनेसे यद्यपि यह विधि शास्त्र नहीं है, तथापि 'प्राचीनप्रवणे वैश्वदेवेन यजेत' इत्यादिमें एकही वैश्वदेव शब्दसे आठों यागोंका व्यवहार होता है अतः 'वैश्वदेवेन यजेत' यह शास्त्र व्यर्थ नहीं है । इन आठों यागोंका नाम वैश्वदेव है। इसमें दो कारण हैं जैसे छत्री (राजा) और अच्छत्री समुदायमें 'छत्रिणो यान्ति' प्रयोग होता है उसी तरह आभिक्षा यागमें समस्त (विश्वदेवोंके याग होनेके कारण आठोंमें वैश्वदेवत्वका व्यवहार होगा । अथवा आठोंका कर्त्ता विश्वदेव है अतः आठों यागोंमें वैश्वदेवत्व रहेगा । ब्राह्मण भागका प्रमाण भी है 'यद्विश्वे देवाः समयजन्त तद्वैश्वदेवस्य वैश्वदेवत्वम्' । देवताओंका विकल्प जो पूर्वपक्षमें किया है वह नहीं हो सकता है क्योंकि समान बल होनेसे ही विकल्प होता है। यहां पर अग्न्यादि, उत्पत्ति शिष्ट होनेसे प्रबल है और विश्वदेव उत्पन्न- शिष्ट होनेसे दुर्बल है प्रबल और दुर्बलमें प्रबल ही बाधक होता है। अतः अग्न्यादि ही देव हैं और वैश्वदेव इन आठोंका नाम है यह सिद्ध हुआ । वस्तुतस्तु तत्प्रख्यशास्त्रादेवास्य कर्मनामधेयत्वं प्रकृतयागे विश्वदेवरूप- गुणसंप्रतिपन्नशास्त्रस्यार्थवादरूपस्यैव सत्त्वात् । 'यद्विश्वेदेवाः समयजन्त तद्वैश्वदेवस्य वैश्वदेवत्वम्' इति । अब सिद्धान्त समाधान 'वस्तुतस्तु' से कहते हैं कि 'वैश्वदेव शब्द तत्प्रख्य शास्त्रसे ही यागका नाम है इन आठों वैश्वदेव नामक यागमें 'यद्विश्वेदेवाः समय- जन्त' यह अर्थवाद ही विश्वदेव गुणका प्रापक है । अथ निषेधमीमांसा । पुरुषस्य निवर्तकं वाक्यं निषेधः, निषेधवाक्यानाम नर्थहेतुक्रियानि- वृत्तिजनकत्वेनैवार्थवत्त्वात् । तथा हि यथा विधिः प्रवर्त्तनां प्रतिपादयन्स्व- प्रवर्त्तकत्वनिर्वाहार्थं विधेयस्य यागादेरिष्टसाधनत्वमाक्षिपन्पुरुषं तत्र प्रवर्त्त- यति, तथा 'न कलञ्जं भक्षये'दित्यादिनिषेधोऽपि निवर्त्तनां प्रतिपाद- यन्स्वनिवर्त्तकत्वनिर्वाहार्थं निषेध्यस्य कलञ्जभक्षणस्य परानिष्टसाधनत्वमा- क्षिपन्पुरुषं ततो निवर्त्तयति ।