भारतकोश
अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary

लौगाक्षि भास्कर द्वारा

DevanagariHindipublished84 पृष्ठ

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पृष्ठ 69

दीपिकाटीकासहितः। ६३ वाद वाक्यसे श्येनपक्षीकी स्तुति नहीं कर सकते क्योंकि श्येनकी उपमासे दूसरोंकी स्तुतिकी जाती है। न च श्येनोपमानत्वेन स एव स्तोतुं शक्यते, उपमानोपमेयभावस्य भिन्ननिष्ठत्वात्। यदा तु श्येनसंज्ञको यागो विधीयते तदार्थवादेन श्ये- नोपमानेन तस्य स्तुतिः कर्तुं शक्यत इति श्येनशब्दः कर्मनामधेयं तद्व्य- पदेशादिति। श्येनकी उपमासे श्येनकी ही स्तुति नहीं कर सकते क्योंकि उपमान और उपमेयमें भेद रहता है अतः स्वका उपमेय स्व नहीं होगा। जब श्येन नामक यागका विधान होता है तब श्येनपक्षीकी उपमासे श्येन यागकी स्तुति कर सकते हैं अतः तद्व्यपदेशसे श्येन यागका नाम है। कर्मनामधेयत्वे उत्पत्तिशिष्टगुणबलीयस्त्वम्। उत्पत्तिशिष्टगुणबलीयस्त्वमपि पञ्चमं नामधेयनिमित्तमिति केचित्। यथा 'वैश्वदेवेन यजेते' त्यादौ। अत्रोत्पत्तिशिष्टाग्न्यादीनां बलीयस्त्वा- द्वैश्वदेवशब्दस्य विश्वदेवदेवताभिधायकत्वं न संभवतीति कर्मनामधेयत्वम्। किसीका मत है कि उत्पत्तिशिष्ट-गुणबलीयस्त्व (उत्पत्ति विधिसे बोधित गुण प्रबल होता है) भी कर्मनामधेयमें पांचवां निमित्त है। जैसे 'वैश्वदेवेन यजेते' त्यादि यहांपर वैश्वदेव देवता वाचक नहीं है क्योंकि उत्पत्ति विधिसे प्राप्त अग्न्यादि देव प्रबल है इसलिये वैश्वदेव यागका नाम है। यहां पर यह समझना चाहिए कि चातुर्मासमें चार पर्व हैं—वैश्वदेव, वरुणप्रघास, साकमेध और शुनासीरीय। उनमें वैश्वदेव पर्वमें आठ याग हैं 'आग्नेयमष्टाकपालं निर्वपति सौम्यं चरुं सावित्रं द्वादशकपालं सारस्वतं चरुं पौष्णं मारुतं सप्तकपालम् वैश्वदेवीमामिक्षां द्यावापृ- थिव्यमेककपालम्।' इन आठों यागोंके समीपमें (वैश्वदेवेन यजेत') यह वाक्य पठित है। यहां पर संशय होता है कि वैश्वदेव शब्द यागका नाम है अथवा देवता वाचक है। तब पूर्वपक्ष होता है कि आठों यागोंका 'यजेत' पदसे अनुवाद करके विश्वदेव देवता रूप गुणका विधान है। यद्यपि वैश्वदेवी आमिक्षामें विश्वदेव देवता प्राप्त है तथापि आग्नेयादि सात यागोंमें विश्वदेव अप्राप्त है अतः उसका विधान किया जाता है यद्यपि आग्नेयादि सात यागोंमें अग्न्यादि देवताओंका श्रवण है तथापि अगत्या उन सातों यागोंमें विकल्पसे विश्वदेव देवताका विधान हो सकता है क्योंकि वैश्वदेव यागका नाम होगा तो द्रव्य और देवताका श्रवण नहीं