भारतकोश
अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary

लौगाक्षि भास्कर द्वारा

DevanagariHindipublished84 पृष्ठ

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६२ अर्थसंग्रहः— अनुवाद कर अग्नि समुच्चित प्रजापतिका विधान है अतः विना मंत्रवर्णके 'यदग्नये च' इत्यादिसे विधान नहीं हो सकता । अतः प्रजापतिसे मंत्रवर्णका बाध नहीं होगा क्योंकि उपजीव्यविरोध लगेगा । 'यदग्नये च' इसीसे अग्निविशिष्ट प्रजापति अर्थात् अग्नि और प्रजापति दोनोंका विधान नहीं हो सकता । क्योंकि समुच्चित दोनोंके विधानकी अपेक्षा दूसरोंसे प्राप्त अग्निका अनुवादकर अग्नि समुच्चित प्रजापति मात्रके विधानमें लाघव है । एवं प्रयाजेषु समिदादिदेवतानां 'समिधः समिधो अग्न आज्यस्य व्य- न्त्वि'त्यादिमन्त्रवर्णैभ्यः प्राप्तत्वात् । 'समिधो यजती' त्यादिषु समिदा- दिशब्दास्तत्प्रख्यशास्त्रात्कर्मनामधेयम् । इसी तरह प्रयाजमें समिदादि देवताओंकी प्राप्ति 'समिधः समिधो अग्न' इत्यादि- मंत्रवर्णसे होती है । अतः 'समिधो यजति' इत्यादिमें समिध प्रभृति शब्द यागका नाम है । तद्व्यपदेशेन कर्मनामधेयत्वम् । 'श्येनेनाभिचरन्यजेते' त्यत्र श्येनशब्दस्य कर्मनामधेयत्वं तद्व्यपदे- शात् । तेन व्यपदेशादुपमानात्तदन्यथानुपपत्तेरिति यावत् । तथा हि यद्विधेयं तस्य स्तुतिर्भवति । यद्यत्र श्येनो विधेयः स्यात् , तदर्थवादैस्त- स्यैव स्तुतिः कार्या । अत्र 'यथा वै श्येनो निपत्यादत्त' इत्यनेनार्थवादेन श्येनः स्तोतुं न शक्यः, श्येनोपमानेनार्थान्तरस्तुतेः क्रियमाणत्वात् । 'श्येनेनाभिचरन् यजेत', यहां पर श्येन शब्द यागका नाम है । इस वाक्यसे सोमयागमें सोमरूप द्रव्यको बाधकर सोमके स्थानमें श्येन पक्षिरूप गुणका विधान नहीं होता क्योंकि तद्व्यपदेश ( कथन ) रूप हेतुसे श्येन नामक यागका ही विधान होता है । तद्व्यपदेश शब्दका अर्थ करते हैं कि ( तेन ) श्येनसे ( व्यप- देशात् ) उपमानसे अर्थात् श्येनकी उपमासे अर्थवाद वाक्य द्वारा विधेय याग विशेषकी स्तुति होती है क्योंकि उपमान और उपमेयमें भेद अवश्य रहता है । यदि श्येनपक्षिरूप गुणका विधान हो तो अर्थवाद वाक्यसे श्येनपक्षी की उपमासे श्येनपक्षीकी ही स्तुति असंगत होगी । यही विषय अर्थवादवचन प्रदर्शन द्वारा ग्रन्थकार बतलाते हैं—'तथाहि-' इत्यादि । जैसे श्येन ( बाज ) मत्स्यादि जन्तुका नाश करता है उसी तरह श्येन यागसे शत्रु का नाश होता है । इस अर्थ-