अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)
Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary
लौगाक्षि भास्कर द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदीपिकाटीकासहितः । ६१ यहां पर यह प्रश्न होता है कि अग्निरूप देवता का प्रापक कौन शास्त्र है ? इसका उत्तर कोई देते हैं कि 'यदग्नये च' इत्यादि अग्नि देवता का प्रापक शास्त्रा- न्तर है । यहां पर केचित् पद से यह अस्वरस सूचित होता है कि 'अग्निर्ज्योति- रित्यादि मंत्र वर्ण से प्राप्त अग्नि का अनुवाद कर 'यदग्नये चे'त्यादि मंत्र से केवल अग्नि समुचित प्रजापतिमात्रका ही लाघव से विधान किया जाता है अतः 'यदग्नये च' इत्यादि शास्त्र अग्निदेवता प्रापक नहीं हो सकता है । अतः सिद्धान्त उत्तर 'अपरे तु' इत्यादि ग्रन्थ से देते हैं । (अपरे तु) सिद्धान्तवेत्ता कहते हैं कि 'अग्निर्ज्योतिर्ज्योतिरग्निः स्वाहा' यह मन्त्र वर्ण ही अग्नि रूप देवताका प्रापक है । नन्वग्नेर्मान्त्रवर्णिकत्वे प्रजापतिदेवतया बाधः स्यात् । मन्त्रवर्णस्य चतुर्थीतो दुर्बलत्वात् । यथाहुः-'तद्धितेन चतुर्थ्या वा मन्त्रवर्णेन वा पुनः । देवताया विधिस्तत्र दुर्बलं तु परं परम्'ति चेन्न । 'यदग्नये च प्रजा- पतये च सायं जुहोती'त्यत्र न केवलं प्रजापतिविधानम् , किन्तु मन्त्रव- र्णप्राप्तमग्निमनूद्य तत्समुचितप्रजापतेः । एवं च न बाधः, केवलप्रजाप- तिविधानाभावात् । न चात्र समुच्चितोभयविधानमेव कथं नेति वाच्य- म् । समुच्चितोभयविधानापेक्षयान्यतः प्राप्तमग्निमनूद्य तत्समुचितप्रजा- पतिमात्रविधाने लाघवात् । यहां पर यह शंका उठती है कि मंत्रवर्णसे यदि अग्निकी प्राप्ति मानेंगे तो प्रजापतिसे बाध होगा क्योंकि 'प्रजापतये' यहां पर चतुर्थीसे देवताकी उपस्थिति है और मंत्र वर्णमें देवता वाचक कोई पद नहीं है । अतः मंत्रवर्ण दुर्बल है । यद्यपि सम्प्रदानमें चतुर्थी होती है अतः चतुर्थीसे देवताका स्मरण नहीं हो सकता है तथापि इज्यमान द्रव्यका उद्देश्य और ग्रहण करनेवाला ही सम्प्रदान होता है और इज्यमान द्रव्यका उद्देश्य देवता है इसलिये सम्प्रदानके अन्दर देवताका प्रवेश हो गया है अतः सम्प्रदानसे देवताका स्मरणमें कोई बाधक नहीं है । अतः मंत्रवर्ण चतुर्थीसे दुर्बल है । अभियुक्तोंका कथन भी है कि 'तद्धित, चतुर्थी और मंत्रवर्णसे देवताका विधान होता है उनमें उत्तरोत्तर दुर्बल है अर्थात् तद्धितसे चतुर्थी और चतुर्थीसे मंत्रवर्ण दुर्बल है ।' तब अग्निदेवता प्रापक मंत्रवर्ण कैसे होगा । इसका समाधान इस तरह करते हैं कि 'यदग्नये च प्रजापतये' इत्यादिसे केवल प्रजापतिका विधान नहीं है किन्तु मन्त्रवर्णसे प्राप्त अग्निका