अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)
Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary
लौगाक्षि भास्कर द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६० अर्थसंग्रहः मीयपशु यागका अनुवाद कर उसमें चित्रत्व और स्त्रीत्वका विधान हो सकता है तब चित्राशब्द याग विशेषका नाम कैसे होगा । इसका उत्तर करते हैं कि प्राप्तकर्ममें अनेक गुणोंका विधान होनेसे वाक्यभेद हो जाता है अतः अग्नीषो- मीय पशु यागमें चित्रत्व और स्त्रीत्व गुणोंका विधान होनेसे वाक्यभेद दुर्वार होगा। अभियुक्तोंका कथन भी है 'प्राप्ते कर्मणि नानेको विधातुं शक्यते गुणः। अप्राप्ते तु विधीयन्ते बहवोऽप्येकयत्नतः।' अतः चित्राशब्द यागविशेषका ही नाम है। तत्प्रख्यशास्त्रात्नामधेयत्वम् । 'अग्निहोत्रं जुहोति' त्यत्राग्निहोत्रशब्दस्य कर्मनामधेयत्वं तत्प्रख्यशा- स्त्रात् । तस्य गुणस्य प्रख्यापकस्य प्रापकस्य शास्त्रस्य विद्यमानत्वात् , अग्निहोत्रशब्दः कर्मनामधेयमिति यावत् । 'अग्निहोत्रं जुहोति' तत्प्रख्य शास्त्रसे अग्निहोत्र शब्द याग विशेषका नाम है। तत्प्रख्य शास्त्रका अर्थ करते हैं कि (तस्य) गुणका (प्रख्यापक) प्रापक अर्थात् प्राप्ति करानेवाला शास्त्र अर्थ है अतः अग्निहोत्र शब्द कर्मनामधेय है । नन्वयं गुणविधिरेव कुतो नेति चेन्न। यद्यग्नौ होत्रमस्मिन्निति सप्तमीसमासमाश्रित्य होमाधारत्वेनाग्निरूपो गुणो विधेयस्तदा 'यदाहव- नीये जुहोती'त्यनेनैवाग्नेः प्राप्तत्वात्तद्विधानानर्थक्यम् । अग्नये होत्र- मिति चतुर्थीसमासमाश्रित्य अग्निदेवतारूपगुणोऽनेन विधीयत इति चेन्न । तद्देवतायाः शास्त्रान्तरेण प्राप्तत्वात् । यहां शंका उठती है कि 'अग्निहोत्रं जुहोति' इस वाक्यसे गुणका ही विधान है नामधेय नहीं है। इसका उत्तर देते हैं कि अग्निहोत्र शब्दमें 'अग्नौ होत्रं अस्मिन्' इस विग्रहसे यदि सप्तमी समास मानकर यागका आधार अग्नि है। अतः अग्नि रूप गुणका विधान करेंगे तो 'यदाहवनीये जुहोति' इसीसे अग्नि रूपाधिकरण प्राप्त है पुनः उसका विधान करना व्यर्थ होगा। 'अग्नये होत्रम्' ऐसे चतुर्थी समास मानकर अग्निरूप देवताका भी विधान नहीं कर सकते क्योंकि— अग्निरूप देवता शास्त्रान्तरसे ही प्राप्त है अतः अग्निहोत्र नामधेय है । देवतारूपेणाग्नि प्रापकशास्त्रप्रश्नः । किं तच्छास्त्रान्तरमिति चेत् । 'यदग्नये च प्रजापतये च सायं जुहो- ती'ति केचित् । अपरे तु 'अग्निज्योतिर्ज्योतिरग्निः स्वाहे'ति मन्त्रवर्ण एवा- ग्निरूपदेवताप्रापकः ।