भारतकोश
अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary

लौगाक्षि भास्कर द्वारा

DevanagariHindipublished84 पृष्ठ

पृष्ठ 65, कुल 84 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 65

दीपिकाटीकासहितः। ५९ का खनित्र रूप गुण अर्थ करने पर जिस यागमें वह गुण होगा वह याग भी प्रमाणान्तरसे अप्राप्त है अतः उसी वाक्यसे यागका भी विधान करके खनित्र रूप गुण विशिष्ट यागका विधान होगा। यह विशिष्ट विधान मत्वर्थ लक्षणाके विना नहीं हो सकता है। अतः मत्वर्थ लक्षणा में गौरव होगा। मत्वर्थ लक्षणा नहीं माननेसे वाक्यभेद होगा। यह विषय विध्यर्थ निरूपणमें 'सोमेन यजेत' यहां पर कह आये हैं अतः उद्भिद् शब्दका याग नाम ही मानना सर्वथा उचित है। नामधेयत्वस्य वाक्यभेदप्रसङ्गरूपद्वितीयनिमित्तोदाहरणम्। 'चित्रया यजेत पशुकाम' इत्यत्र चित्राशब्दस्य कर्मनामधेयत्वं वाक्य- भेदभयात्। तथा हि न तावदत्र गुणविशिष्टयागविधानं संभवति । 'दधि मधु पयो घृतं धाना उदकं तण्डुलास्तत्संसृष्टं प्राजापत्यमि'त्यनेन गुण- स्य विहितत्वात्तद्विशिष्टयागविध्यनुपपत्तेः। यागस्य फलसंबन्धे गुणसंबन्धे च विधीयमाने वाक्यभेदः। तस्माच्चित्राशब्दः कर्मनामधेयम्। तथा च 'चित्रायागेन पशुं भावयेदि'ति सामानाधिकरण्येनान्वयान्न वाक्यभेदः। “चित्रया यजेत पशुकामः”, यहां पर वाक्यभेदके भयसे चित्रा शब्द यागका नाम होता है। जैसे 'चित्रया यजेत' यहां चित्रवर्ण रूप गुण विशिष्ट यागका विधान नहीं होता है क्योंकि 'दधि मधु पयो घृतं' इत्यादिसे गुण विहित है अतः गुण विशिष्ट यागका विधान नहीं हो सकता है। 'दधि मधु' इत्यादिका अर्थ है कि दधि मधु दूध घृत धान जल और चावल इन द्रव्योंसे युक्त (तत्संसृष्ट) प्रजापति- देवताक याग होता है अतः दध्यादि गुणका स्पष्टतः विधान है। यदि यागमें पशुरूप फलके सम्बन्धका और चित्रवर्ण रूप गुणके सम्बन्धका विधान करेंगे तो वाक्यभेद हो जायगा। अतः चित्राशब्द याग विशेषका नाम है। तब 'चित्रा- यागसे पशु की भावना करे' यहां पर चित्रा और यागका सामानाधिकरण्य (अभेद) से अन्वय होता है अतः वाक्यभेद नहीं है। प्रकृतेष्टेरनेकद्रव्यत्वेन चित्राशब्दवाच्यत्वोपपत्तिः। प्रकृतेष्टि = प्रकृतयाग अर्थात् चित्रायाग दध्यादि अनेक द्रव्योंसे होता है। अतः चित्रा शब्दार्थ की भी उपपत्ति होती है। यहां पर यह शंका उठती है कि चित्रा शब्दसे चित्रत्व और स्त्रीत्वका ज्ञान होता है। स्त्रीत्व प्राणीका धर्म है अतः दध्यादि कर्मक यागमें उसका विशेषण नहीं हो सकता। इसलिये 'चित्रया यजेत' इस वाक्यमें यजेत पदसे 'अग्नीषोमीयं पशुमालभेत' एतद्विहित अग्नीषो- ५ अ० सं०