भारतकोश
अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary

लौगाक्षि भास्कर द्वारा

DevanagariHindipublished84 पृष्ठ

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५८ अर्थसंग्रहः— नामधेयत्वे निमित्तचतुष्टयम् । नामधेयत्वं च निमित्तचतुष्टयात् । मत्वर्थलक्षणाभयाद्वाक्यभेदभयात्त- त्प्रख्यशास्त्रात्तद्व्यपदेशाच्चेति । निम्न चार निमित्तोंसे नामधेयत्व होता है । ( १ ) मत्वर्थ लक्षणाके भयसे । ( २ ) वाक्यभेदके भयसे । ( ३ ) तत्प्रख्य शास्त्रसे और ( ४ ) तद्व्यपदेशसे । नामधेयत्वस्य मत्वर्थलक्षणाप्रसङ्गरूपप्रथमनिमित्तोदाहरणम् । तत्र 'उद्भिदा यजेत पशुकाम' इत्यत्रोद्भिच्छब्दस्य यागनामधेयत्वं मत्वर्थलक्षणाभयात् । तथा हि न तावदनेन वाक्येन फलं प्रति यागविधा- नम् , तं प्रति च गुणविधानं युज्यते, वाक्यभेदापत्तेः । उद्भिच्छब्दस्य गुणसमर्पकत्वे च यागस्याप्यप्राप्तत्वात् गुणविशिष्टकर्मविधानं वाच्यम् । 'उद्भिद्वता यागेन पशुं भावयेदि'ति विशिष्टविधौ च मत्वर्थलक्षणेत्युक्तमेव । 'उद्भिदा यजेत पशुकामः' यहां पर मत्वर्थ लक्षणाके भयसे उद्भिद् शब्द यागका नाम है क्योंकि 'उद्भिदा यजेत' इस वाक्यसे पशुरूप फलको उद्देश्य करके यागका विधान और 'उद्भिद्यते भूमिः अनेन' इस विग्रह द्वारा यागको उद्देश्यकर खनित्र (कुदारी) का विधान नहीं कर सकते हैं क्योंकि दो विधेय होनेसे वाक्यभेद हो जायगा । यहां पर शंका उठती है कि 'दध्ना जुहोति' इस वाक्यसे जैसे गुणमात्रका विधान होता है उसी तरह खनित्ररूप गुणमात्रका ही विधान करना चाहिये । और जैसे 'गोदोहनेन पशुकामस्य' यहां पर गो- दोहनरूप गुणका फल पशु है उसी तरहसे 'खनित्ररूप गुणका फल पशु होगा' इस तरहसे 'उद्भिदा यजेत' यह गुण विधि ही होगी । इसका समाधान करते हैं—'पशुकामः' और 'यजेत' इन दोनों पदोंका अर्थ यह होता है कि यागसे पशु रूप फलकी भावना करे । इसके बाद 'किस यागसे' ? ऐसी आकांक्षा होने पर 'उद्भिदा' इस तृतीयान्त पदका यागनामधेयत्वसे अन्वय होता है । 'उद्भिद्यते प्राप्यते पशुफलमनेन यागेन' इस विग्रहसे भी यागका नाम उद्भिद् होता है । तथा हि उद्भिदा और यागेन इन दोनोंका अभेदान्वय ही नामधेयका निश्चय करता है । खनित्ररूप गुण विधान करने पर 'खनित्रसे साध्य किये जानेवाले यागसे पशुकी भावना करे' इस तरह अर्थ होने पर वैयधिकरण्येन (भेदसम्ब- न्धेन) अन्वय करना होगा । लेकिन अभेद सम्बन्धसे अन्वयका सम्भव हो तो भेद (खनित्रसाध्यत्व) सम्बन्धसे अन्वय अनुचित है । और उद्भिद् शब्द