भारतकोश
अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary

लौगाक्षि भास्कर द्वारा

DevanagariHindipublished84 पृष्ठ

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दीपिकाटीकासहितः । ५७ भिन्न-पञ्चनखभक्षणाभावकी कल्पना करनी पड़ती है और रागतः प्राप्तः उक्त पञ्चपञ्चनखभक्षणका बाध भी करना पड़ता है । इन तीनों दोषोंमें श्रुतार्थहानि और अश्रुतार्थकल्पना शब्दके दोष हैं और प्राप्तबाध अर्थका दोष है । येषां तु प्रयोगसमवेतार्थस्मारकत्वं न संभवति तदुच्चारणस्यानन्यग- त्याऽदृष्टार्थकत्वं कल्प्यत इति नानर्थक्यमिति । अब यह शंका होती है कि यदि मन्त्रोच्चारणका प्रयोजन प्रयोगसमवेतार्थ- स्मरण ही है तो 'हुं फट्' आदि मन्त्रोंसे किसी अर्थका स्मरण नहीं होता । अतः वह मन्त्र व्यर्थ हो जायगा । इसका उत्तर देते हैं कि जिन मन्त्रोंसे प्रयोग सम- वेत अर्थ का स्मरण नहीं होता है, उन मन्त्रोंका उच्चारण (अनन्य- गत्या ) दूसरा उपाय नहीं रहनेके कारण अदृष्टार्थ ही मानना चाहिये । अथ नामधेयमीमांसा । नामधेयानां च विधेयार्थपरिच्छेदकतयार्थवत्त्वम् । तथा हि-'उद्भिदा यजेत पशुकाम' इत्यत्रोद्भिच्छब्दो यागनामधेयं तेन च विधेयार्थपरि- च्छेदः क्रियते । तथा हि-अनेन वाक्येनाप्राप्तत्वात्फलोद्देशेन यागो विधी- यते । यागसामान्यस्याविधेयत्वात् यागविशेष एव विधीयते । तत्र कोऽ- सौ यागविशेष इत्यपेक्षायामुद्भिच्छब्दादुद्भिद्रूपो याग इति ज्ञायते । 'उद्भिदा यागेन पशुं भावयेदि'त्यत्र सामानाधिकरण्येन नामधेयान्वयात् । विधेयार्थपरिच्छेदकतया विजातीयके निवृत्तिपूर्वक विधेयार्थका निश्चय करता हुआ नामधेय सार्थक होता है । जैसे 'उद्भिदा यजेत पशुकामः' यहां पर उद्भिद् शब्द यागका वाचक है उद्भिद् शब्दसे विधेयार्थका निश्चय होता है । क्योंकि 'उद्भिदा यजेत' इस वाक्यसे गो आदि पशुरूप फलको उद्देश्य करके अप्राप्त यागका विधान होता है । किन्तु याग सामान्यका यहां विधान नहीं है क्योंकि कारणमें वैलक्षण्यके बिना कार्यमें वैलक्षण्य नहीं होता है अतः याग- विशेषका ही विधान होता है । वह यागविशेष कौन है इस तरहकी आकांक्षा होने पर उद्भिद् रूप यागविशेषका ज्ञान होता है क्योंकि 'उद्भिदा यागेन पशुं भावयेत्' यहां पर उद्भिद् और यागको ( सामानाधिकरण्य ) अभेदसे अन्वय होता है अतः उद्भिद् यागका नाम है ।