भारतकोश
अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary

लौगाक्षि भास्कर द्वारा

DevanagariHindipublished84 पृष्ठ

पृष्ठ 62, कुल 84 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 62

५६ अर्थसंग्रहः— वाक्यसे पञ्चनख-भक्षणका विधान नहीं है क्योंकि रागसे ही पञ्चनख-भक्षण प्राप्त है अत्यन्त अप्राप्त नहीं है अतः विधि भी नहीं है। एवं नियमपरक भी नहीं है क्योंकि एक कालमें शशकादि पञ्च पञ्चनखोंका भक्षण और शशकादिपञ्चभिन्न पञ्चनखोंका भक्षण प्राप्त होनेसे पक्षमें अप्राप्त नहीं है। अतः अपूर्व विधि और नियमविधि नहीं हो सकती है अपितु परिशेषात् परिसंख्या विधि होगी इस वाक्यसे शशकादि-पञ्चभिन्न पञ्चनख-भक्षण की निवृत्ति होती है। वस्तुतः उक्तपञ्च- पञ्चनखभिन्न पञ्चनख-भक्षणका निवृत्तिपरक वाक्य है ॥ परिसंख्यायाः श्रौतीत्वलाक्षणिकीत्वभेदौ । सा च द्विविधा-श्रौती लाक्षणिकी चेति। तत्र 'अत्र ह्येवावयन्ती'ति श्रौती परिसंख्या। एवकारेण पवमानातिरिक्तस्तोत्रव्यावृत्तेरभिधानात्। 'पञ्च पञ्चनखा भक्ष्या' इति तु लाक्षणिकी इतरनिवृत्तिवाचकपदाभावात्। अत एवैषा त्रिदोषग्रस्ता। परिसंख्याके दो भेद हैं—श्रौती और लाक्षणिकी। उनमें श्रौती परिसंख्या का उदाहरण है—'अत्र ह्येवावयन्ति' यहां पर अवयन्तिका गायन (गान) अर्थ है। इस वाक्यमें श्रुत एवकारसे पवमान (स्तोत्र विशेषका नाम है) से अतिरिक्त स्तोत्र की निवृत्ति होती है। लाक्षणिकी परिसंख्याका उदाहरण है—"पञ्च पञ्च- नखा भक्ष्याः” । क्योंकि यहां इतरनिवृत्तिवाचक कोई पद नहीं है किन्तु लक्षणासे इतर की निवृत्ति करनी होती है इसलिये इस परिसंख्यामें तीन दोष हैं ॥ परिसंख्याया दोषत्रयम् । दोषत्रयं च श्रुतहानि-रश्रुतकल्पना प्राप्तबाधश्चेति । तदुक्तम्-‘श्रुता- र्थस्य परित्यागादश्रुतार्थप्रकल्पनात् । प्राप्तस्य बाधादित्येवं परिसंख्या त्रिदू- षणा' इति । श्रुतस्य पञ्चनखभक्षणस्य हानात् , अश्रुताऽपञ्चनखभक्षणनि- वृत्तेः कल्पनात् , प्राप्तस्य चापञ्चनखभक्षणस्य बाधादिति । अस्मिंश्च दोष- त्रये दोषद्वयं शब्दानिष्ठम् । प्राप्तबाधस्त्वर्थनिष्ठ इति दिक् । उक्त परिसंख्यामें तीनों दोषोंको बतलाते हैं—श्रुतहानि, अश्रुतकी कल्पना और प्राप्तका बाध । इसमें प्रमाण देते हैं-‘श्रुतार्थस्ये'त्यादि । अर्थ स्पष्ट है। उक्त तीनों दोषोंका समन्वय करते हैं—'पञ्च पञ्चनखा भक्ष्याः' इस वाक्यमें श्रुत पञ्च पञ्चनखभक्षण विधानका त्याग करना पड़ता है। तथा अश्रुत शशकादिपञ्च-