भारतकोश
अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary

लौगाक्षि भास्कर द्वारा

DevanagariHindipublished84 पृष्ठ

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पृष्ठ 61

दीपिकाटीकासहितः। ५५ चाप्राप्तांशपूरणम्। वैतुष्यस्य हि नानोपायसाध्यत्वाद्यदावघातं परित्यज्य उपायान्तरं ग्रहीतुमारभते, तदावघातस्याप्राप्तत्वेन तद्विधाननामकमप्राप्तां- शपूरणमेवानेन विधिना क्रियते। अतश्च नियमविधावप्राप्तांशपूरणात्मको नियम एव वाक्यार्थः। पक्षेऽप्राप्तावघातस्य विधानमिति यावत्। द्वितीयचरणका अर्थ और उदाहरण कहते हैं—पक्षमें अप्राप्तका प्रापक विधान को नियत विधि कहते हैं। जैसे ‘व्रीहीनवहन्ति’ आदि। यह विधि पक्षमें अप्राप्त का प्रापक कैसे होती है यह बतलाते हैं—इस विधिसे (वैतुष्य) तुषविमोकके लिये अवघात (मुशलसे कूटना) का विधान नहीं है क्योंकि यह अन्वयव्यतिरेक- सिद्ध है, अर्थात् अवघातादि होनेपर व्रीहिका तुषविमोक होगा और अवघातादि नहीं होने पर तुषविमोक नहीं होगा इस तरहके अन्वयव्यतिरेकसे ही वैतुष्यके लिये अवघात सिद्ध है अतः अवघातका अत्यन्त अप्राप्त नहीं होनेसे उसका विधान नहीं हो सकता है। किन्तु ‘व्रीहीनवहन्ति’ यह नियम विधि है, अर्थात् अवघातसे ही तुषविमोक करना चाहिए। यह नियम अप्राप्तांशका पूरक है क्योंकि अवघात और नखविदलन प्रभृति अनेकों उपायोंसे वैतुष्य हो सकता है। उनमें जब अवघातको छोड़कर नखविदलनसे ही तुषविमोक करना प्रारम्भ करते हैं तब अवघात अप्राप्त हो जाता है अतः उस वाक्यसे अवघात-विधान नामक अप्राप्तांशपूरणका ही विधान होता है। इसलिये नियम विधिमें अप्राप्तांशपूरणात्मक नियम ही वाक्यार्थ है। अर्थात् नियम विधिसे पक्षमें अप्राप्त अवघातका विधान होता है ॥ परिसंख्याविधिः । उभयोश्च युगपत्प्राप्तावितरव्यावृत्तिपरो विधिः परिसंख्याविधिः । यथा—‘पञ्च पञ्चनखा भक्ष्या’ इति । इदं हि वाक्यं न पञ्चनखभक्षणं, तस्य रागतः प्राप्तत्वात् । नापि नियमपरं, पञ्चपञ्चनखभक्षणस्य युग- पत्प्राप्तेः पक्षेऽप्राप्त्यभावात् । अत इदमपञ्चनखभक्षणनिवृत्तिपरमिति भवति परिसंख्याविधिः । तृतीय और चतुर्थ चरण की व्याख्या करते हैं। युगपत् (एक समय) में दो की प्राप्ति रहने पर दूसरों की (व्यावृत्ति) निवृत्तिपरक वावयको ही परिसंख्या विधि कहते हैं। जैसे—"पञ्च पञ्चनखा भक्ष्या ब्रह्मक्षत्रेण राघव। शशकः शल्लकी गोधा खड्गी कूर्मोऽथ पञ्चमः” खरगोश, शाही, गोह, गेंडा, कूर्म, इत्यादि, इस-