अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)
Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary
लौगाक्षि भास्कर द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५४ : अर्थसंग्रहः - अथ मन्त्रमीमांसा । प्रयोगसमवेतार्थस्मारका मन्त्राः । तेषां च तादृशार्थस्मारकत्वेनैवा- र्थवत्त्वम् । नतु तदुच्चारणमदृष्टार्थम् , संभवति दृष्टफलकत्वेऽदृष्टफलकल्प- नाया अन्याय्यत्वात् , न च दृष्टस्यार्थस्मरणस्य प्रकारान्तरेणापि संभवा- न्मन्त्राम्नानं व्यर्थमिति वाच्यम् । मन्त्रैरेव स्मर्तव्यमिति नियमविध्याश्रय- णात् । प्रयोग ( समवेत ) सम्बद्ध जो अर्थ ( प्रयोजन ) है उसका स्मारक मन्त्र है । मन्त्रका ही प्रयोजन है कि प्रयोगसमवेत अर्थका स्मरण करावे किन्तु मन्त्रोच्चारण का अदृष्ट प्रयोजन नहीं है क्योंकि दृष्टफलकी संभावना रहने पर अदृष्टफलकी कल्पना करना अनुचित है । यहां पर यह शंका होती है कि अर्थस्मरणरूपदृष्ट प्रयोजनका ब्राह्मण-वाक्योंसे भी सम्भव है अतः उसके लिये मंत्रोच्चारण करना व्यर्थ है । इसका उत्तर करते हैं कि 'मन्त्रोंसे ही अर्थका स्मरण करे' इस नियम विधिका आश्रयण करनेसे मंत्रका उच्चारण व्यर्थ नहीं होगा ॥ नियमविधिः । नानासाधनसाध्यक्रियायामेकसाधनप्राप्तावप्राप्तस्यापरसाधनस्य प्राप- को विधिर्नियमविधिः । यथाहुः 'विधिरत्यन्तमप्राप्तौ नियमः पाक्षिके सति । तत्र चान्यत्र च प्राप्तौ परिसंख्येति गीयत' इति । अस्यार्थः - प्रमाणान्तरेणाप्राप्तस्य प्रापको विधिरपूर्वविधिः, यथा 'यजेत स्वर्गकाम' इत्यादिः । स्वर्गार्थतयागस्य प्रमाणान्तरेणाप्राप्तस्यानेन विधानात् । जहां पर अनेकों कारणोंसे क्रियाकी सिद्धि सम्भव हो उनमें एक कारणके प्राप्त रहने पर अप्राप्त दूसरे कारणोंका प्रापक ( प्राप्ति करानेवाली ) विधिको नियमविधि कहते हैं । नियमविधिमें प्रमाण बतलाते हैं - 'विधिरत्यन्तमप्राप्तौ' इत्यादि । इसमें प्रथम चरणका यह अर्थ है कि प्रमाणान्तरसे अप्राप्तका विधायक जो विधि उसे अपूर्व विधि कहते हैं जैसे 'यजेत स्वर्गकामः' स्वर्गके लिये प्रमाणान्तरसे अप्राप्तयागका इससे विधान किया गया है। अतः 'यजेत स्वर्गकामः' यह अपूर्वविधि है॥ पक्षेऽप्राप्तस्य प्रापको विधिर्नियमविधिः । यथा 'व्रीहीनवहन्ति' त्या- दिः । कथमस्य पक्षेऽप्राप्तप्रापकत्वमिति चेदित्थम् । अनेन ह्यवघातस्य वैतुष्यार्थत्वं न प्रतिपाद्यतेऽन्वयव्यतिरेकसिद्धत्वात् । किंतु नियमः । स