भारतकोश
अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary

लौगाक्षि भास्कर द्वारा

DevanagariHindipublished84 पृष्ठ

पृष्ठ 59, कुल 84 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 59

दीपिकाटीकासहितः । ५३ अग्न्याधानमें भी शूद्रको अधिकार नहीं है । यद्यपि 'रथकारोऽग्नीनादधीत', इस वाक्यसे रथकार ( शूद्रविशेष ) को भी अग्न्याधानमें अधिकार कहा गया है । यहां पर 'रथं करोती'ति इस विग्रहसे त्रैवर्णिकका ग्रहण नहीं होता है किन्तु 'योगाद् रूढिर्बलीयसी' योगसे रूढि बलवती होती है इस नियमसे जातिविशेष वाचक ही रथकार शब्द है । अर्थात् वैश्यामें क्षत्रियसे उत्पन्नको माहिष्य कहते हैं और शूद्रामें वैश्यसे उत्पन्नको करणी कहते हैं और करणीमें माहिष्यसे उत्पन्नको रथकार कहते हैं । श्रीयाज्ञवल्क्य मुनिका वचन भी है—'माहिष्येण करण्यान्तु रथकारः प्रजायते' इति । तथापि इस रथकारको उत्तरकर्ममें अधिकार नहीं है । जिस यागमें उक्त वचनसे शूद्रका अधिकार हो उस यागमें भी अपूर्वविद्याकी कल्पना करके ही अधिकार होता है दूसरे यागोंमें नहीं । एवं सामर्थ्यमपि 'आख्यातानामर्थं ब्रुवतां शक्तिः सहकारिणी'ति न्यायान् समर्थं प्रत्येव विधिप्रवृत्तेः । तदेवं निरूपितो विधिः । इसी तरह विधिवाक्योंमें अश्रुत सामर्थ्य भी अधिकारीका विशेषण होता है ! क्योंकि 'अर्थको कहनेमें आख्यात ( तिङन्त-यजेत ) का सहकारी कारण सामर्थ्य ( शक्ति ) होता है' इस न्यायसे समर्थ अधिकारीको उद्देश्य करके विधिकी प्रवृत्ति होती है । अधिकारीमें सामर्थ्यविशेषण देनेसे यह सूचित होता है कि अन्ध और बधिर प्रभृतिको यागमें अधिकार नहीं है । यहां पर यह विचारणीय विषय है कि अन्ध और बधिर प्रभृति जब चेतन हैं तब उनको भी निरतिशय- सुखरूप स्वर्गकी इच्छा हो सकती है अतः यागमें उनका अधिकार क्यों नहीं है । यदि कहें कि अन्धको आज्य देखनेका सामर्थ्य नहीं है एवं बधिरको अध्वर्युप्रोक्त- मन्त्रश्रवणका सामर्थ्य नहीं है अतः यागमें अधिकार नहीं है तो भी वे यथाशक्ति अंगों का अनुष्ठान कर सकते हैं । क्योंकि 'यजेत स्वर्गकामः' इस प्रधानवाक्यसे सबको अधिकार की प्रतीति होती है अतः अन्धप्रभृतिको भी यागमें अधिकार होना चाहिये । इसका उत्तर कहते हैं कि यदि आज्यादिका अवेक्षणादि पुरुषार्थरूप से विहित किया जाता तो अवेक्षणादि-सामर्थ्य न रहने पर भी यागमें वैकल्य ( अङ्गका नाश ) नहीं होता किन्तु अवेक्षण ( देखना ) प्रभृति यागका ही अंग रूपसे विहित है । उस अंगको नहीं करने पर यागमें वैकल्य होनेसे यागका सम्पन्न नहीं होगा अतः यागमें अन्धप्रभृति असमर्थोंका अधिकार नहीं है । इस तरहसे विधिका निरूपण हुआ ॥