भारतकोश
अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary

लौगाक्षि भास्कर द्वारा

DevanagariHindipublished84 पृष्ठ

पृष्ठ 58, कुल 84 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 58

५२ : अर्थसंग्रहः— ( स्वर्गादि ) कामना, नैमित्तिककर्ममें निमित्त-( अग्निदाहादि ) निश्चय और नित्यसंध्योपासनादि कर्ममें शुचि-विहितकाल-जीवित्व । अतएव विधिवाक्यमें पुरुषका विशेषण होकर श्रूयमाणको अधिकार होनेके कारणसे ही 'स्वाराज्य चाहनेवाला राजा राजसूययाग करे' यह विधिवाक्य स्वाराज्यको उद्देश्य करके यागका विधान करता हुआ भी केवल स्वाराज्यकाम पुरुषको ही राजसूययाग-जन्यफलभागी नहीं बतलाता है । अपितु राजा होता हुआ स्वाराज्यकाम पुरुषको ही उक्त फल- भागी बनाता है क्योंकि विधि ('राजा राजसूयेने'त्यादि) वाक्यमें अधिकारिपुरुषमें राजत्वका विशेषणरूपसे श्रवण होता है । यहां राजशब्देन क्षत्रियमात्रका ग्रहण है, राज्यसम्बन्धी मात्रका ग्रहण नहीं है । अतः राजसूययाग करनेका अधिकार क्षत्रियको ही है दूसरेको नहीं है । क्वचित्तु पुरुषविशेषणत्वेनाश्रुतमप्यधिकारिविशेषणम् । यथाध्ययन- विधिसिद्धा विद्या, क्रतुविधीनामर्थज्ञानापेक्षणीयत्वेनाध्ययनविधिसिद्धार्थ- ज्ञानवन्तं प्रत्येव प्रवृत्तेः । एवमग्निसाध्यकर्मसु आधानसिद्धाग्निमत्ता । अग्निसाध्यकर्मणामग्न्यपेक्षत्वेन तद्विधीनामाधानसिद्धाग्निमंतं प्रत्येव प्रवृत्तेः । कहीं पर विधिवाक्यमें पुरुषका विशेषणरूपसे जिसका श्रवण नहीं है वह भी अधिकारीका विशेषण होता है । जैसे अध्ययनविधिसे विद्याका विधिवाक्यमें श्रवण नहीं रहने पर भी विद्या अधिकारीका विशेषण होती है अर्थात् वेदाध्ययनसे जिसको विद्यालाभ हुआ है उसीको यागमें अधिकार है क्योंकि ऋतु ( यज्ञ ) विधियोंमें अर्थज्ञानकी अपेक्षा होती है इसलिये अध्ययनसे अर्थज्ञानवालेको ही उद्देश्य करके ऋतु-विधिकी प्रवृत्ति होती है । इसी तरहसे अग्निसाध्य विधिमें आधान ( स्थापन ) से अग्निमत्ताका श्रवण नहीं रहने पर भी वह अधिकारी का विशेषण है अर्थात् जिसने अग्न्याधानसे अग्निका लाभ किया है उसीको अग्नि- साध्यकर्ममें अधिकार है क्योंकि अग्निसाध्यकर्मोंमें अग्निकी अपेक्षा रहती है अतः अग्निसाध्यविधिकी प्रवृत्ति आधानसिद्ध अग्निवालोंको उद्देश्य करके ही होगी । इन दोनों विशेषणोंसे यह सूचित होता है कि शूद्रको यागमें अधिकार नहीं है । क्योंकि 'उपनीय तु यः शिष्यं वेदमध्यापयेत्' इस वाक्यसे उपनयनोत्तर ही वेदाध्ययन का विधान है । उन्नयन ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यका ही होता है अतः शूद्रको वेदाध्ययनमें अधिकार ही नहीं है । एवं 'वसन्ते ब्राह्मणोऽग्नीनादधीत' इस विधिसे