अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)
Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary
लौगाक्षि भास्कर द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदीपिकाटीकासहितः । ५१ शुचिविहितकालजीविनः संध्योपासनजन्यप्रत्यवायपरिहाररूपफलस्वाम्यं बोध्यते । कर्म (यागादि) जन्य फल (स्वर्गादि) स्वाम्यके बोधक विधिको अधिकार विधि कहते हैं । कर्मजन्य फलभोक्तृत्व (भोग)-को ही कर्मजन्यफलस्वाम्य कहते हैं । कर्मके तीन भेद हैं नित्य, नैमित्तिक और काम्य । जिसको नहीं करने पर प्रत्यवाय (पातक) हो और करने पर प्रत्यवाय-परिहारके अतिरिक्त कोई विशेष फल नहीं हो उसे नित्य कर्म कहते हैं । जिसे नहीं करने पर प्रत्यवाय हो और करने पर फल मिले उसे नैमित्तिक कर्म कहते हैं । और जिसको नहीं करनेसे प्रत्यवाय नहीं हो और करनेसे फल हो उसे काम्य कर्म कहते हैं । इनमें काम्य कर्म के अधिकार विधिका उदाहरण देते हैं—"यजेत स्वर्गकामः" इत्यादि, यह विधि स्वर्ग- को उद्देश्य करके यागका विधान करती हुई स्वर्गकाम पुरुषको यागजन्य स्वर्ग- रूपफलभागी बतलाती है । एवं नैमित्तिक कर्ममें अधिकारविधिका उदाहरण देते हैं—'यस्याहिताग्नेरि'त्यादि । इसका यह अर्थ है कि जिस अग्न्याधान करनेवाले पुरुषोंका गृह अग्निसे जल जाय वह क्षाम (खिन्नता) गुणविशिष्ट अग्निको अष्टाकपाल (आठ कपालोंमें बनाया गया) पुरोडाश है । यह विधि अग्निदाहरूप निमित्तमें कर्म बतलाती हुई निमित्तवत्पुरुषको (जिनका घर जल गया है उनको) कर्मजन्यपापक्षयरूप फलभागी बतलाती है । अब नित्यकर्ममें अधिकार विधिका उदाहरण देते हैं 'अहरहः संध्यामुपासीत' यह विधि (शुचि) पवित्र होकर विहित कालमें जीनेवाले पुरुषोंको संध्योपासनजन्यप्रत्यवायपरिहाररूप फल- भागी बतलाती है । तच्च फलस्वाम्यं तस्यैव योऽधिकारविशिष्टः, अधिकारश्च स एव यद्वि- धिवाक्येषु पुरुषविशेषणत्वेन श्रूयते । यथा काम्ये कर्मणि फलकामना, नैमित्तिके कर्मणि निमित्तनिश्चयः, नित्ये संध्योपासनादौ शुचिविहितका- लजीवित्वम् । अत एव 'राजा राजसूयेन स्वाराज्यकामो यजेत' त्यनेन विधिवाक्येन स्वाराज्यमुद्दिश्य विदधतापि न स्वाराज्यमात्रकामस्य तत्फ- लभोक्तृत्वं प्रतिपाद्यते, किंतु राज्ञः सतः स्वाराज्यकामस्यैव, राजत्वस्या- प्यधिकारिविशेषणत्वेन श्रवणात् । जो व्यक्ति अधिकारविशिष्ट है उसीको फलभोक्तृत्व है । जिसका विधि वाक्यमें पुरुषविशेषणतया श्रवण हो वही अधिकार है । जैसे काम्यकर्ममें फल-