अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)
Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary
लौगाक्षि भास्कर द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५० : अर्थसंग्रहः - पत्यैः इस तृतीया श्रुतिसे इतिकर्तव्यताके साथ २ समानकालमें अंग और प्राजापत्य पशुओं ( प्रजापतिर्देवता यस्य सः प्राजापत्यः स एव पशुयागः ) का अनुष्ठान विहित है अतः प्राजापत्य और उनके अंगोंके उपाकरण-नियोजनादि ( यूपबन्धन ) का साहित्य-सम्पादन करना चाहिए । तच्चैकस्योपाकरणं विधायापरस्योपाकरणं विधेयम् । एवं नियोजनादि- कमपि । तथा च प्राजापत्येषु कस्माचित्पशोरारभ्य एकं सर्वत्रानुष्ठाय द्वितीयादिपदार्थस्तेनैव क्रमेणानुष्ठेयः स प्रवृत्तिक्रमः । सोऽयं श्रुत्यादिभ्यो दुर्बलः । तदेवं संक्षेपतो निरूपितः षड्विधक्रमनिरूपणेन प्रयोगविधिः । ( तच्च ) यह साहित्य प्राजापत्य पशुओंका प्रजापति देवताकाल-( वैश्वदेवी अनुष्ठानके बाद जो काल ) त्व प्राप्त होनेके कारण युगपत् ( एक कालमें ) अनुष्ठान करनेसे हो सकता है । परन्तु प्राजापत्य पशुओंके जो उपाकरणादि अंग हैं उनका युगपत् अनुष्ठान अशक्य है क्योंकि प्राजापत्य पशु १७ हैं उन सबको एक समयमें एक आदमी उपाकरण और नियोजनादि नहीं कर सकता है । इसलिये उपाकरणादि अंगोंका अव्यवधानसे अनुष्ठान द्वारा साहित्य हो सकता है । अर्थात् एक पशुका उपाकरण कर दूसरे पशुका उपाकरण करनेसे अव्यवधानेन साहित्य हो सकता है । इसी तरह एक पशुका नियोजन ( यूपमें बन्धन ) कर दूसरेका नियोजन करना चाहिए । वैसा करने पर प्राजापत्य पशुओंमें एक पशुसे आरम्भ कर सब पशुओंमें क्रमशः उपाकरण कर उसी क्रमसे नियोजनादि भी करना चाहिए । इसीको प्रवृत्तिक्रम कहते हैं । यह प्रवृत्तिक्रम श्रुत्यादिक्रमसे दुर्बल है । इस तरहसे संक्षेपमें ६ वों प्रकारके क्रमोंके निरूपणके साथ प्रयोगविधिका निरूपण हुआ ॥ अधिकारविधिलक्षणम् । कर्मजन्यफलस्वाम्यबोधको विधिरधिकारविधिः । कर्मजन्यफलस्वाम्यं कर्मजन्यफलभोक्तृत्वम् । स च 'यजेत स्वर्गकामः' इत्यादिरूपः । स्वर्गमु- द्दिश्य यागं विदधताऽनेन स्वर्गकामस्य यागजन्यफलभोक्तृत्वं प्रतिपाद्यते । 'यस्याहिताग्नेरग्निर्गृहान्दहेत्सोऽग्नये क्षामवतेऽष्टाकपालं निर्वपे दि'त्या- दिनाऽग्निदाहादौ निमित्ते कर्म विदधता निमित्तवतः कर्मजन्यपापक्षय- रूपफलस्वाम्यं प्रतिपाद्यते । एवं 'अहरहः सन्ध्यामुपासीते' त्यादिना