अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)
Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary
लौगाक्षि भास्कर द्वारा
पृष्ठ 55, कुल 84 में से
संदर्भ में पढ़ेंदीपिकाटीकासहितः । ४९ प्रधानके साथ विप्रकर्ष ( दूरता ) हो जाता है और मुख्य क्रममें अंगोंको प्रधान के साथ ( संनिकर्ष ) सामीप्य रहता है । जैसे दर्शपूर्णमास यागमें आग्नेय यागका अनुष्ठान होता है पश्चात् सांनाय्य ( दधि-दूध रूप हविविशेष ) का अनुष्ठान होता है सांनाय्यके वत्सापाकरण ( बछड़ेको हटाना ) दोहनादि अर्थात् दुग्धधर्म = वत्ससंयोग और हटाना एवं दुहना आदि धर्मोंका पहले अनुष्ठान होता है वहां यदि प्रवृत्तिक्रमसे अवदानाभिघारण प्रभृति सभी अंगोंका पहले ही अनुष्ठान हो पश्चात् आग्नेय धर्म=अवदानादिका अनुष्ठान तब आग्नेय यागका और बाद में सांनाय्य यागका अनुष्ठान किया जाय तो सभी सांनाय्य धर्मोंको अपने प्रधान सांनाय्य यागके साथ मध्यमें आग्नेय धर्मानुष्ठान और आग्नेय यागानुष्ठान दो से व्यवधान होगा । यदि वत्सापाकरण प्रभृति कितने धर्मोंका पहले अनुष्ठान करने पर भी अवदानादि दूसरे धर्मोंका अनुष्ठान मुख्य क्रमानुरोधसे आग्नेय धर्मानुष्ठान करनेके बाद ही करते हैं तब सभी आग्नेय और सान्नाय्य धर्मोंका अपने २ प्रधानके मध्यमें विजातीय एक २ व्यवधान होता है अर्थात् आग्नेय धर्मोंका सान्नाय्य धर्मोंसे और सान्नाय्य धर्मोंका आग्नेय यागसे व्यवधान होता है । अतः प्रवृत्तिक्रमसे मुख्य क्रम बलवान् है । प्रवृत्तिक्रमलक्षणम् । सहप्रयुज्यमानेषु प्रधानेषु संनिपातिनामङ्गानामावृत्त्यानुष्ठाने कर्तव्ये हि द्वितीयादिपदार्थानां प्रथमानुष्ठितपदार्थक्रमाद्यः क्रमः स प्रवृत्तिक्रमः । यथा प्राजापत्यपश्वङ्गेषु । प्राजापत्या हि 'वैश्वदेवीं कृत्वा प्राजापत्यैश्चर- न्ती'ति वाक्येन तृतीयानिर्देशात्सेतिकर्तव्यताका एककालत्वेन विहिताः, अतस्तेषां तदङ्गानां चोपाकरणनियोजनप्रभृतीनां साहित्यं संपाद्यम् । तच्च प्राजापत्यपशूनां संप्रतिपन्नदेवताकत्वेन युगपदनुष्ठानादुपपद्यते । तदङ्गानां चोपाकरणादीनां युगपदनुष्ठानमशक्यम् । अतस्तेषां साहित्यमव्यवहिता- नुष्ठानात्संपाद्यम् । अंगोंके साथ २ अनुष्ठान किये जानेवाले प्रधानोंमें ( संनिपातिनामंगानाम् ) सन्निपत्योपकारक अंगोंकी आवृत्तिसे अनुष्ठान कर्तव्य हो तो द्वितीयादि पदार्थोंका प्रथमानुष्ठित पदार्थ क्रमसे जो क्रम होता है उसको प्रवृत्तिक्रम कहते हैं । जैसे प्राजापत्य पशुओंके अंगोंमें “वैश्वदेवीं कृत्वा प्राजापत्यैश्चरन्ति” यहां पर प्राजा-