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अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary

लौगाक्षि भास्कर द्वारा

DevanagariHindipublished84 पृष्ठ

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४८ । अर्थसंग्रहः—

होता है। विपरीत क्रमसे करने पर आग्नेय हविष अभिघारण और आग्नेय याग में कोई व्यवधान नहीं होगा और ऐन्द्रदध्यभिघारण और ऐन्द्रयागमें दो व्यवधान होंगे। जैसे प्रथम ऐन्द्रदध्यभिघारण तब आग्नेय हविष अभिघारण उसके बाद आग्नेय याग तब ऐन्द्रयाग करने पर दो व्यवधान स्पष्ट हैं। ऐसा व्यवधान होना अनुचित है यह पहले कह चुके हैं। स च मुख्यः क्रमः पाठक्रमाद् दुर्बलः। मुख्यक्रमो हि प्रमाणान्तरसापे- क्षप्रधानक्रमप्रतिपत्तिसापेक्षतया विलम्बितप्रतिपत्तिकः। पाठक्रमस्तु निरपेक्षस्वाध्यायपाठक्रममात्रसापेक्षतया न तथेति बलवान्। स चायं मुख्यः क्रमः प्रवृत्तिक्रमाद् बलवान्। प्रवृत्तिक्रमे हि बहूनामङ्गानां प्रधा- नविप्रकर्षात्, मुख्यक्रमे तु संनिकर्षात्। यह मुख्य क्रम पाठक्रमसे दुर्बल है क्योंकि पहले प्रमाणान्तरसे प्रधान क्रमका ( प्रतिपत्ति ) ज्ञान होगा बादमें प्रधान क्रम ज्ञानसे मुख्य क्रमका ज्ञान होगा अतः मुख्य क्रमका ज्ञान विलम्बसे होगा। पाठक्रम में केवल स्वाध्याय पाठक्रम की ही अपेक्षा होती है और स्वाध्याय पाठक्रममें किसीकी अपेक्षा नहीं होती है। अतः पाठक्रम बलवान् है। जैसे दर्श-पूर्णमास में पूर्णिमामें उपांशु ( याग ) और अग्नीषोमीय याग कहे हैं। उनमें उपांशुयागका द्रव्य आज्य ( घृत ) है आज्यका धर्म उत्पवन ( ऊपर फेकना ) प्रभृति है। अग्नीषोमीय यागका द्रव्य पुरोडाश है। और उसका धर्म निर्वापन ( काटना ) अवघात प्रभृति है। यहां पर यह संशय होता है कि पहले आज्य धर्मका अनु- ष्ठान होना चाहिए अथवा पुरोडाश धर्मका अनुष्ठान होना चाहिये ? तब पूर्वपक्ष होता है कि प्रधान क्रमके अनुसारसे ही अंगोंका क्रम होता है। यहां पर पहले उपांशु याग है पश्चात् अग्नीषोमीय याग। अतः पहले उपांशुयागका द्रव्य आज्य धर्मका ही अनुष्ठान होना चाहिए पश्चात् पुरोडाश धर्मका। उसके बाद सिद्धान्त करते हैं कि प्रथम पुरोडाश धर्मका पाठ है पश्चात् आज्यधर्मका पाठ है। उनमें मुख्य क्रमसे आज्यधर्मका अनुष्ठान प्राप्त रहने पर भी उसको बाधकर पाठक्रम से पुरोडाश धर्मका ही अनुष्ठान करना चाहिए। क्योंकि वैदिक शब्दोंसे पाठ- क्रमका ज्ञान शीघ्र हो जाता है और मुख्य क्रमानुसारी क्रमका तो युक्तियोंसे कल्पना करने पर ज्ञान होता है। अतः पाठक्रमसे मुख्य क्रम दुर्बल है। परन्तु प्रवृत्ति क्रमसे मुख्यक्रम बलवान् होता है क्योंकि प्रवृत्ति क्रममें बहुतों अंगोंको

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