भारतकोश
अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary

लौगाक्षि भास्कर द्वारा

DevanagariHindipublished84 पृष्ठ

पृष्ठ 53, कुल 84 में से

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दीपिकाटीकासहितः । ४७ मुख्यक्रमलक्षणम् । प्रधानक्रमेण योऽङ्गानां क्रमः स मुख्यक्रमः । येन हि क्रमेण प्रधानानि क्रियन्ते तेनैव क्रमेण तेषामङ्गान्यनुष्ठीयन्ते चेत् तदा सर्वेषामङ्गानां स्वैः स्वैः प्रधानैस्तुल्यं व्यवधानं भवति । व्युत्क्रमेणानुष्ठाने केषांचिदङ्गानां स्वैः प्रधानैरत्यन्तमव्यवधानं केषांचिदत्यन्तं व्यवधानं स्यात् , तच्चायुक्तं, प्रयो- गविध्यवगतसाहित्यबाधापत्तेः । अतः प्रधानक्रमोऽप्यङ्गक्रमे हेतुः । अत एव प्रयाजशेषेणादावाग्नेयहविषोऽभिधारणं पश्चादैन्द्रस्य दध्नः, आग्नेयै- न्द्रयागयोः पौर्वापर्यात् । एवं च द्वयोरभिधारणयोः स्वस्वप्रधानेन तुल्यमे- कान्तरितं व्यवधानं, व्युत्क्रमेणाचारे त्वाग्नेयहविर्भिधारणाग्नेययागयो- रत्यन्तमव्यवधानम् , ऐन्द्रदध्यभिधारणैन्द्रयागयोर्द्वयन्तरितं व्यवधानं तच्चायुक्तमित्युक्तमेव । जिस क्रमसे प्रधानोंका अनुष्ठान किया जाय उसी क्रमसे अंगोंका जो अनु- ष्ठान किया जाय उसको मुख्य क्रम कहते हैं । क्योंकि जिस क्रमसे प्रधानोंका अनुष्ठान होता हो उसी क्रमसे यदि अंगोंका अनुष्ठान किया जाय तो सब अंगों का अपने २ प्रधानोंसे तुल्य व्यवधान होता है ( व्युत्क्रम ) विपरीत क्रमसे अनु- ष्ठान करने पर किसी अंगका अपने प्रधानके साथ अत्यन्त अव्यवधान ( सामी- प्य ) हो जायगा और किसी अंगका अपने प्रधानके साथ अत्यन्त व्यवधान ( दूर ) हो जायगा यह उचित नहीं है । क्योंकि प्रयोगविधिसे अंगोंके साथ प्रधान का जो साहित्य होता है उसका उच्छेद हो जायगा । इसलिये अंगोंके क्रममें प्रधानोंका क्रम कारण है । अतः अंग क्रममें प्रधान क्रमको कारण होनेसे ही प्रयाजके शेष ( अन्तभाग ) में प्रथम आग्नेय हविषका अभिधारण ( पिघला हुआ घृतसे अभिषेक ) होता है पश्चात् ऐन्द्रदधि हविषका अभिधारण होता है । क्योंकि प्रथम आग्नेय याग और पश्चात् ऐन्द्रयाग होता है यह बात पहले भी कह चुके हैं । इस तरहसे दोनों अभिधारणोंमें स्वस्व प्रधानसे एकान्तरित ( मध्यमें एक ) व्यवधान होता है । जैसे पहले आग्नेय हविषका अभिधारण तब ऐन्द्रदधिका अभिधारण बादमें आग्नेय याग तब ऐन्द्रयाग होनेसे आग्नेय हविष अभिधारण और आग्नेय यागके बीच केवल एक ऐन्द्रदधिका अभिधारण व्यवधान होता है एवं ऐन्द्रदध्यभिधारण और ऐन्द्रयागके मध्यमें केवल आग्नेय याग व्यवधान

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