अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)
Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary
लौगाक्षि भास्कर द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४६ : अर्थसंग्रहः - होता है और प्रधान (सोम) के साथ प्रत्यासत्तिका भी लाभ होता है किन्तु सवनीय का सुत्याकाल रूप स्वस्थान का अतिक्रमण नहीं होता है। और अग्नीषोमीय देश (औपवसथ्यदिन)में अनुष्ठान करने पर सवनीय का स्वस्थान (सुत्याकाल) का अतिक्रमण होता है एवं विकृति यागमें साहित्यविषयक “सह पशूनालभेत” इस विधिसे अग्नी- षोमीयपशुका जो सवनीय देश है उसका भी अतिक्रमण होता है इसी तरह आनुबन्ध्यपशुके स्वस्थान (अवभृथके बाद) का अतिक्रमण होता है और साहित्य-विधिसे प्राप्त सवनीय स्थान (सुत्याकाल) का अतिक्रमण होता है। एवं आनुबन्ध्यदेश (अवभृथान्त) में तीनोंके अनुष्ठान करनेसे सवनीयके स्वस्थान (सौत्यदिन) का अतिक्रमण (दूसरे स्थान पर चला जाना) होता है और आनुबन्ध्यपशुका साहित्य-विधिसे प्राप्त जो सवनीय देश है उसका अतिक्रमण होता है एवं अग्नीषोमीयपशुके स्वस्थान (औपवसथ्यदिन) का अतिक्रमण और पूर्वोक्त रीतिसे प्राप्त सवनीय देशका भी अतिक्रमण होता है। अतः सवनी- यदेशमें अनुष्ठान करने पर सवनीयपशुका स्वस्थानातिक्रमण नहीं होता है। अन्य देशोंमें करनेसे तो सबोंका स्वस्थानातिक्रमण होता है। इस लिये सवनीय देश में ही अनुष्ठान करना चाहिए। इस तरह सवनीय देशमें सब अनुष्ठानोंके निर्णय होने पर सर्वप्रथम सवनीयपशुका ही अनुष्ठान होगा। क्योंकि आश्विन (सोमग्रह) ग्रहणके अव्यवहित उत्तर कालमें ही उसकी उपस्थिति सर्वप्रथम होती है। प्रकृता- "वाश्विनंग्रहं कृत्वा त्रिवृता यूपं परिवीय आग्नेयं सवनीयं पशु- मुपाकरोती"त्याश्विनग्रहणानन्तरं सवनीयो विहित इति साद्यस्केऽप्याश्विन- ग्रहणे कृते सवनीय एवोपस्थितो भवति। अतो युक्तं तस्य स्थानात्प्रथम- मनुष्ठानमितरयोस्तु पश्चादित्युक्तम् । विकृति यागके सवनीय स्थानका निर्णायक प्रकृति याग सम्बन्धि सवनीय स्थान को श्रुतिसे सिद्ध करते हैं-प्रकृति (ज्योतिष्टोम) याग में (त्रिगुणितरज्जु) से यूप- का परिवेष्टन कर आश्विन (सोम ग्रह) ग्रहणको करनेके बाद सवनीयपशुका उपाकरण (स्पर्श) करना चाहिए इस तरह आश्विन ग्रहणके बाद सवनीय का देश सिद्ध होता है। अतः साद्यस्कमें भी आश्विन ग्रहण करनेके बाद सव- नीय ही उपस्थित होता है। इसलिये स्थान क्रमसे सवनीयपशुका सर्वप्रथम अनुष्ठान करना उचित है।