अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)
Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary
लौगाक्षि भास्कर द्वारा
दीपिकाटीकासहितः। ५९ का खनित्र रूप गुण अर्थ करने पर जिस यागमें वह गुण होगा वह याग भी प्रमाणान्तरसे अप्राप्त है अतः उसी वाक्यसे यागका भी विधान करके खनित्र रूप गुण विशिष्ट यागका विधान होगा। यह विशिष्ट विधान मत्वर्थ लक्षणाके विना नहीं हो सकता है। अतः मत्वर्थ लक्षणा में गौरव होगा। मत्वर्थ लक्षणा नहीं माननेसे वाक्यभेद होगा। यह विषय विध्यर्थ निरूपणमें 'सोमेन यजेत' यहां पर कह आये हैं अतः उद्भिद् शब्दका याग नाम ही मानना सर्वथा उचित है। नामधेयत्वस्य वाक्यभेदप्रसङ्गरूपद्वितीयनिमित्तोदाहरणम्। 'चित्रया यजेत पशुकाम' इत्यत्र चित्राशब्दस्य कर्मनामधेयत्वं वाक्य- भेदभयात्। तथा हि न तावदत्र गुणविशिष्टयागविधानं संभवति । 'दधि मधु पयो घृतं धाना उदकं तण्डुलास्तत्संसृष्टं प्राजापत्यमि'त्यनेन गुण- स्य विहितत्वात्तद्विशिष्टयागविध्यनुपपत्तेः। यागस्य फलसंबन्धे गुणसंबन्धे च विधीयमाने वाक्यभेदः। तस्माच्चित्राशब्दः कर्मनामधेयम्। तथा च 'चित्रायागेन पशुं भावयेदि'ति सामानाधिकरण्येनान्वयान्न वाक्यभेदः। “चित्रया यजेत पशुकामः”, यहां पर वाक्यभेदके भयसे चित्रा शब्द यागका नाम होता है। जैसे 'चित्रया यजेत' यहां चित्रवर्ण रूप गुण विशिष्ट यागका विधान नहीं होता है क्योंकि 'दधि मधु पयो घृतं' इत्यादिसे गुण विहित है अतः गुण विशिष्ट यागका विधान नहीं हो सकता है। 'दधि मधु' इत्यादिका अर्थ है कि दधि मधु दूध घृत धान जल और चावल इन द्रव्योंसे युक्त (तत्संसृष्ट) प्रजापति- देवताक याग होता है अतः दध्यादि गुणका स्पष्टतः विधान है। यदि यागमें पशुरूप फलके सम्बन्धका और चित्रवर्ण रूप गुणके सम्बन्धका विधान करेंगे तो वाक्यभेद हो जायगा। अतः चित्राशब्द याग विशेषका नाम है। तब 'चित्रा- यागसे पशु की भावना करे' यहां पर चित्रा और यागका सामानाधिकरण्य (अभेद) से अन्वय होता है अतः वाक्यभेद नहीं है। प्रकृतेष्टेरनेकद्रव्यत्वेन चित्राशब्दवाच्यत्वोपपत्तिः। प्रकृतेष्टि = प्रकृतयाग अर्थात् चित्रायाग दध्यादि अनेक द्रव्योंसे होता है। अतः चित्रा शब्दार्थ की भी उपपत्ति होती है। यहां पर यह शंका उठती है कि चित्रा शब्दसे चित्रत्व और स्त्रीत्वका ज्ञान होता है। स्त्रीत्व प्राणीका धर्म है अतः दध्यादि कर्मक यागमें उसका विशेषण नहीं हो सकता। इसलिये 'चित्रया यजेत' इस वाक्यमें यजेत पदसे 'अग्नीषोमीयं पशुमालभेत' एतद्विहित अग्नीषो- ५ अ० सं०
६० अर्थसंग्रहः मीयपशु यागका अनुवाद कर उसमें चित्रत्व और स्त्रीत्वका विधान हो सकता है तब चित्राशब्द याग विशेषका नाम कैसे होगा । इसका उत्तर करते हैं कि प्राप्तकर्ममें अनेक गुणोंका विधान होनेसे वाक्यभेद हो जाता है अतः अग्नीषो- मीय पशु यागमें चित्रत्व और स्त्रीत्व गुणोंका विधान होनेसे वाक्यभेद दुर्वार होगा। अभियुक्तोंका कथन भी है 'प्राप्ते कर्मणि नानेको विधातुं शक्यते गुणः। अप्राप्ते तु विधीयन्ते बहवोऽप्येकयत्नतः।' अतः चित्राशब्द यागविशेषका ही नाम है। तत्प्रख्यशास्त्रात्नामधेयत्वम् । 'अग्निहोत्रं जुहोति' त्यत्राग्निहोत्रशब्दस्य कर्मनामधेयत्वं तत्प्रख्यशा- स्त्रात् । तस्य गुणस्य प्रख्यापकस्य प्रापकस्य शास्त्रस्य विद्यमानत्वात् , अग्निहोत्रशब्दः कर्मनामधेयमिति यावत् । 'अग्निहोत्रं जुहोति' तत्प्रख्य शास्त्रसे अग्निहोत्र शब्द याग विशेषका नाम है। तत्प्रख्य शास्त्रका अर्थ करते हैं कि (तस्य) गुणका (प्रख्यापक) प्रापक अर्थात् प्राप्ति करानेवाला शास्त्र अर्थ है अतः अग्निहोत्र शब्द कर्मनामधेय है । नन्वयं गुणविधिरेव कुतो नेति चेन्न। यद्यग्नौ होत्रमस्मिन्निति सप्तमीसमासमाश्रित्य होमाधारत्वेनाग्निरूपो गुणो विधेयस्तदा 'यदाहव- नीये जुहोती'त्यनेनैवाग्नेः प्राप्तत्वात्तद्विधानानर्थक्यम् । अग्नये होत्र- मिति चतुर्थीसमासमाश्रित्य अग्निदेवतारूपगुणोऽनेन विधीयत इति चेन्न । तद्देवतायाः शास्त्रान्तरेण प्राप्तत्वात् । यहां शंका उठती है कि 'अग्निहोत्रं जुहोति' इस वाक्यसे गुणका ही विधान है नामधेय नहीं है। इसका उत्तर देते हैं कि अग्निहोत्र शब्दमें 'अग्नौ होत्रं अस्मिन्' इस विग्रहसे यदि सप्तमी समास मानकर यागका आधार अग्नि है। अतः अग्नि रूप गुणका विधान करेंगे तो 'यदाहवनीये जुहोति' इसीसे अग्नि रूपाधिकरण प्राप्त है पुनः उसका विधान करना व्यर्थ होगा। 'अग्नये होत्रम्' ऐसे चतुर्थी समास मानकर अग्निरूप देवताका भी विधान नहीं कर सकते क्योंकि— अग्निरूप देवता शास्त्रान्तरसे ही प्राप्त है अतः अग्निहोत्र नामधेय है । देवतारूपेणाग्नि प्रापकशास्त्रप्रश्नः । किं तच्छास्त्रान्तरमिति चेत् । 'यदग्नये च प्रजापतये च सायं जुहो- ती'ति केचित् । अपरे तु 'अग्निज्योतिर्ज्योतिरग्निः स्वाहे'ति मन्त्रवर्ण एवा- ग्निरूपदेवताप्रापकः ।
दीपिकाटीकासहितः । ६१ यहां पर यह प्रश्न होता है कि अग्निरूप देवता का प्रापक कौन शास्त्र है ? इसका उत्तर कोई देते हैं कि 'यदग्नये च' इत्यादि अग्नि देवता का प्रापक शास्त्रा- न्तर है । यहां पर केचित् पद से यह अस्वरस सूचित होता है कि 'अग्निर्ज्योति- रित्यादि मंत्र वर्ण से प्राप्त अग्नि का अनुवाद कर 'यदग्नये चे'त्यादि मंत्र से केवल अग्नि समुचित प्रजापतिमात्रका ही लाघव से विधान किया जाता है अतः 'यदग्नये च' इत्यादि शास्त्र अग्निदेवता प्रापक नहीं हो सकता है । अतः सिद्धान्त उत्तर 'अपरे तु' इत्यादि ग्रन्थ से देते हैं । (अपरे तु) सिद्धान्तवेत्ता कहते हैं कि 'अग्निर्ज्योतिर्ज्योतिरग्निः स्वाहा' यह मन्त्र वर्ण ही अग्नि रूप देवताका प्रापक है । नन्वग्नेर्मान्त्रवर्णिकत्वे प्रजापतिदेवतया बाधः स्यात् । मन्त्रवर्णस्य चतुर्थीतो दुर्बलत्वात् । यथाहुः-'तद्धितेन चतुर्थ्या वा मन्त्रवर्णेन वा पुनः । देवताया विधिस्तत्र दुर्बलं तु परं परम्'ति चेन्न । 'यदग्नये च प्रजा- पतये च सायं जुहोती'त्यत्र न केवलं प्रजापतिविधानम् , किन्तु मन्त्रव- र्णप्राप्तमग्निमनूद्य तत्समुचितप्रजापतेः । एवं च न बाधः, केवलप्रजाप- तिविधानाभावात् । न चात्र समुच्चितोभयविधानमेव कथं नेति वाच्य- म् । समुच्चितोभयविधानापेक्षयान्यतः प्राप्तमग्निमनूद्य तत्समुचितप्रजा- पतिमात्रविधाने लाघवात् । यहां पर यह शंका उठती है कि मंत्रवर्णसे यदि अग्निकी प्राप्ति मानेंगे तो प्रजापतिसे बाध होगा क्योंकि 'प्रजापतये' यहां पर चतुर्थीसे देवताकी उपस्थिति है और मंत्र वर्णमें देवता वाचक कोई पद नहीं है । अतः मंत्रवर्ण दुर्बल है । यद्यपि सम्प्रदानमें चतुर्थी होती है अतः चतुर्थीसे देवताका स्मरण नहीं हो सकता है तथापि इज्यमान द्रव्यका उद्देश्य और ग्रहण करनेवाला ही सम्प्रदान होता है और इज्यमान द्रव्यका उद्देश्य देवता है इसलिये सम्प्रदानके अन्दर देवताका प्रवेश हो गया है अतः सम्प्रदानसे देवताका स्मरणमें कोई बाधक नहीं है । अतः मंत्रवर्ण चतुर्थीसे दुर्बल है । अभियुक्तोंका कथन भी है कि 'तद्धित, चतुर्थी और मंत्रवर्णसे देवताका विधान होता है उनमें उत्तरोत्तर दुर्बल है अर्थात् तद्धितसे चतुर्थी और चतुर्थीसे मंत्रवर्ण दुर्बल है ।' तब अग्निदेवता प्रापक मंत्रवर्ण कैसे होगा । इसका समाधान इस तरह करते हैं कि 'यदग्नये च प्रजापतये' इत्यादिसे केवल प्रजापतिका विधान नहीं है किन्तु मन्त्रवर्णसे प्राप्त अग्निका
६२ अर्थसंग्रहः— अनुवाद कर अग्नि समुच्चित प्रजापतिका विधान है अतः विना मंत्रवर्णके 'यदग्नये च' इत्यादिसे विधान नहीं हो सकता । अतः प्रजापतिसे मंत्रवर्णका बाध नहीं होगा क्योंकि उपजीव्यविरोध लगेगा । 'यदग्नये च' इसीसे अग्निविशिष्ट प्रजापति अर्थात् अग्नि और प्रजापति दोनोंका विधान नहीं हो सकता । क्योंकि समुच्चित दोनोंके विधानकी अपेक्षा दूसरोंसे प्राप्त अग्निका अनुवादकर अग्नि समुच्चित प्रजापति मात्रके विधानमें लाघव है । एवं प्रयाजेषु समिदादिदेवतानां 'समिधः समिधो अग्न आज्यस्य व्य- न्त्वि'त्यादिमन्त्रवर्णैभ्यः प्राप्तत्वात् । 'समिधो यजती' त्यादिषु समिदा- दिशब्दास्तत्प्रख्यशास्त्रात्कर्मनामधेयम् । इसी तरह प्रयाजमें समिदादि देवताओंकी प्राप्ति 'समिधः समिधो अग्न' इत्यादि- मंत्रवर्णसे होती है । अतः 'समिधो यजति' इत्यादिमें समिध प्रभृति शब्द यागका नाम है । तद्व्यपदेशेन कर्मनामधेयत्वम् । 'श्येनेनाभिचरन्यजेते' त्यत्र श्येनशब्दस्य कर्मनामधेयत्वं तद्व्यपदे- शात् । तेन व्यपदेशादुपमानात्तदन्यथानुपपत्तेरिति यावत् । तथा हि यद्विधेयं तस्य स्तुतिर्भवति । यद्यत्र श्येनो विधेयः स्यात् , तदर्थवादैस्त- स्यैव स्तुतिः कार्या । अत्र 'यथा वै श्येनो निपत्यादत्त' इत्यनेनार्थवादेन श्येनः स्तोतुं न शक्यः, श्येनोपमानेनार्थान्तरस्तुतेः क्रियमाणत्वात् । 'श्येनेनाभिचरन् यजेत', यहां पर श्येन शब्द यागका नाम है । इस वाक्यसे सोमयागमें सोमरूप द्रव्यको बाधकर सोमके स्थानमें श्येन पक्षिरूप गुणका विधान नहीं होता क्योंकि तद्व्यपदेश ( कथन ) रूप हेतुसे श्येन नामक यागका ही विधान होता है । तद्व्यपदेश शब्दका अर्थ करते हैं कि ( तेन ) श्येनसे ( व्यप- देशात् ) उपमानसे अर्थात् श्येनकी उपमासे अर्थवाद वाक्य द्वारा विधेय याग विशेषकी स्तुति होती है क्योंकि उपमान और उपमेयमें भेद अवश्य रहता है । यदि श्येनपक्षिरूप गुणका विधान हो तो अर्थवाद वाक्यसे श्येनपक्षी की उपमासे श्येनपक्षीकी ही स्तुति असंगत होगी । यही विषय अर्थवादवचन प्रदर्शन द्वारा ग्रन्थकार बतलाते हैं—'तथाहि-' इत्यादि । जैसे श्येन ( बाज ) मत्स्यादि जन्तुका नाश करता है उसी तरह श्येन यागसे शत्रु का नाश होता है । इस अर्थ-
दीपिकाटीकासहितः। ६३ वाद वाक्यसे श्येनपक्षीकी स्तुति नहीं कर सकते क्योंकि श्येनकी उपमासे दूसरोंकी स्तुतिकी जाती है। न च श्येनोपमानत्वेन स एव स्तोतुं शक्यते, उपमानोपमेयभावस्य भिन्ननिष्ठत्वात्। यदा तु श्येनसंज्ञको यागो विधीयते तदार्थवादेन श्ये- नोपमानेन तस्य स्तुतिः कर्तुं शक्यत इति श्येनशब्दः कर्मनामधेयं तद्व्य- पदेशादिति। श्येनकी उपमासे श्येनकी ही स्तुति नहीं कर सकते क्योंकि उपमान और उपमेयमें भेद रहता है अतः स्वका उपमेय स्व नहीं होगा। जब श्येन नामक यागका विधान होता है तब श्येनपक्षीकी उपमासे श्येन यागकी स्तुति कर सकते हैं अतः तद्व्यपदेशसे श्येन यागका नाम है। कर्मनामधेयत्वे उत्पत्तिशिष्टगुणबलीयस्त्वम्। उत्पत्तिशिष्टगुणबलीयस्त्वमपि पञ्चमं नामधेयनिमित्तमिति केचित्। यथा 'वैश्वदेवेन यजेते' त्यादौ। अत्रोत्पत्तिशिष्टाग्न्यादीनां बलीयस्त्वा- द्वैश्वदेवशब्दस्य विश्वदेवदेवताभिधायकत्वं न संभवतीति कर्मनामधेयत्वम्। किसीका मत है कि उत्पत्तिशिष्ट-गुणबलीयस्त्व (उत्पत्ति विधिसे बोधित गुण प्रबल होता है) भी कर्मनामधेयमें पांचवां निमित्त है। जैसे 'वैश्वदेवेन यजेते' त्यादि यहांपर वैश्वदेव देवता वाचक नहीं है क्योंकि उत्पत्ति विधिसे प्राप्त अग्न्यादि देव प्रबल है इसलिये वैश्वदेव यागका नाम है। यहां पर यह समझना चाहिए कि चातुर्मासमें चार पर्व हैं—वैश्वदेव, वरुणप्रघास, साकमेध और शुनासीरीय। उनमें वैश्वदेव पर्वमें आठ याग हैं 'आग्नेयमष्टाकपालं निर्वपति सौम्यं चरुं सावित्रं द्वादशकपालं सारस्वतं चरुं पौष्णं मारुतं सप्तकपालम् वैश्वदेवीमामिक्षां द्यावापृ- थिव्यमेककपालम्।' इन आठों यागोंके समीपमें (वैश्वदेवेन यजेत') यह वाक्य पठित है। यहां पर संशय होता है कि वैश्वदेव शब्द यागका नाम है अथवा देवता वाचक है। तब पूर्वपक्ष होता है कि आठों यागोंका 'यजेत' पदसे अनुवाद करके विश्वदेव देवता रूप गुणका विधान है। यद्यपि वैश्वदेवी आमिक्षामें विश्वदेव देवता प्राप्त है तथापि आग्नेयादि सात यागोंमें विश्वदेव अप्राप्त है अतः उसका विधान किया जाता है यद्यपि आग्नेयादि सात यागोंमें अग्न्यादि देवताओंका श्रवण है तथापि अगत्या उन सातों यागोंमें विकल्पसे विश्वदेव देवताका विधान हो सकता है क्योंकि वैश्वदेव यागका नाम होगा तो द्रव्य और देवताका श्रवण नहीं
६४ | अर्थसंग्रहः- रहनेके कारण द्रव्य और देवता स्वरूप यागका स्वरूप ही नहीं बनेगा अतः 'वैश्वदे- वेन यजेत' वह विधि व्यर्थ हो जायगी । अतः गुणका ही विधान है । तब सिद्धान्त करते हैं कि उत्पत्ति वाक्यसे विहित आग्नेयादि आठों यागोंका 'यजेत' पदसे अनुवादकर उन आठोंके समुदायका वैश्वदेव नाम विधान किया जाता है। द्रव्य देवताका श्रवण न रहनेसे यद्यपि यह विधि शास्त्र नहीं है, तथापि 'प्राचीनप्रवणे वैश्वदेवेन यजेत' इत्यादिमें एकही वैश्वदेव शब्दसे आठों यागोंका व्यवहार होता है अतः 'वैश्वदेवेन यजेत' यह शास्त्र व्यर्थ नहीं है । इन आठों यागोंका नाम वैश्वदेव है। इसमें दो कारण हैं जैसे छत्री (राजा) और अच्छत्री समुदायमें 'छत्रिणो यान्ति' प्रयोग होता है उसी तरह आभिक्षा यागमें समस्त (विश्वदेवोंके याग होनेके कारण आठोंमें वैश्वदेवत्वका व्यवहार होगा । अथवा आठोंका कर्त्ता विश्वदेव है अतः आठों यागोंमें वैश्वदेवत्व रहेगा । ब्राह्मण भागका प्रमाण भी है 'यद्विश्वे देवाः समयजन्त तद्वैश्वदेवस्य वैश्वदेवत्वम्' । देवताओंका विकल्प जो पूर्वपक्षमें किया है वह नहीं हो सकता है क्योंकि समान बल होनेसे ही विकल्प होता है। यहां पर अग्न्यादि, उत्पत्ति शिष्ट होनेसे प्रबल है और विश्वदेव उत्पन्न- शिष्ट होनेसे दुर्बल है प्रबल और दुर्बलमें प्रबल ही बाधक होता है। अतः अग्न्यादि ही देव हैं और वैश्वदेव इन आठोंका नाम है यह सिद्ध हुआ । वस्तुतस्तु तत्प्रख्यशास्त्रादेवास्य कर्मनामधेयत्वं प्रकृतयागे विश्वदेवरूप- गुणसंप्रतिपन्नशास्त्रस्यार्थवादरूपस्यैव सत्त्वात् । 'यद्विश्वेदेवाः समयजन्त तद्वैश्वदेवस्य वैश्वदेवत्वम्' इति । अब सिद्धान्त समाधान 'वस्तुतस्तु' से कहते हैं कि 'वैश्वदेव शब्द तत्प्रख्य शास्त्रसे ही यागका नाम है इन आठों वैश्वदेव नामक यागमें 'यद्विश्वेदेवाः समय- जन्त' यह अर्थवाद ही विश्वदेव गुणका प्रापक है । अथ निषेधमीमांसा । पुरुषस्य निवर्तकं वाक्यं निषेधः, निषेधवाक्यानाम नर्थहेतुक्रियानि- वृत्तिजनकत्वेनैवार्थवत्त्वात् । तथा हि यथा विधिः प्रवर्त्तनां प्रतिपादयन्स्व- प्रवर्त्तकत्वनिर्वाहार्थं विधेयस्य यागादेरिष्टसाधनत्वमाक्षिपन्पुरुषं तत्र प्रवर्त्त- यति, तथा 'न कलञ्जं भक्षये'दित्यादिनिषेधोऽपि निवर्त्तनां प्रतिपाद- यन्स्वनिवर्त्तकत्वनिर्वाहार्थं निषेध्यस्य कलञ्जभक्षणस्य परानिष्टसाधनत्वमा- क्षिपन्पुरुषं ततो निवर्त्तयति ।
४. मन्त्र, नामधेय, निषेध, अर्थवाद एवं मीमांसा उपसंहार
दीपिकाटीकासहितः । ६५ अब निषेध वाक्योंका प्रयोजन बतलानेके लिए पहले निषेध वाक्यका लक्षण करते हैं-पुरुषोंके निवर्त्तक वाक्यको निषेध वाक्य कहते हैं अनर्थ ( नरकादि ) का कारण जो कलञ्ज-भक्षणादि क्रिया है उस कलञ्ज-भक्षणादि क्रियाकी निवृत्ति करने- वाला ‘न कलञ्जं भक्षयेत्’ यह वाक्य है यही ( अर्थात् कलञ्ज-भक्षणादिसे पुरुषोंको निवृत्त करना ) प्रयोजन ‘न कलञ्जं भक्षयेत्’ इस निषेध वाक्यका है । दृष्टान्त द्वारा उसीकी सिद्धि करते हैं जैसे ‘स्वर्गकामो यजेत’ इत्यादि विधि वाक्य प्रवर्त्तना ( विधि ) को बतलाता हुआ अपनेमें प्रवर्त्तकत्व ( प्रवृत्तिजनकत्व ) का निर्वाहके लिए विधेयार्थ यागमें इष्ट ( स्वर्गादि ) साधनत्वका निश्चय करता हुआ पुरुषोंको यागमें प्रवृत्ति कराता है । उसी तरह ‘न कलञ्जं भक्षयेत्’ इत्यादि निषेध वाक्य भी निवर्त्तना ( निषेध ) को बतलाता हुआ अपनेमें निवर्त्तकत्व ( निवृत्तिजनकत्व ) का निर्वाहके लिये निषेध्य कलञ्ज-भक्षणमें ( परानिष्ट ) नरकादिसाधनत्वका निश्चय करता हुआ कलञ्जादि-भक्षणसे निवृत्ति कराता है । विषाक्त बाणसे मारे गये पशुओंके मांसको कलञ्ज कहते हैं । लिङर्थशब्दभावनाया नञर्थेनान्वयः । ननु निषेधवाक्यस्य कथं निवर्तनाप्रतिपादकत्वमिति चेदुच्यते । न तावदत्र धात्वर्थस्य नञर्थेनान्वयः, अव्यवधानेऽपि तस्य प्रत्ययार्थभावनो- पसर्जनत्वेनोपस्थितेः । न ह्यन्योपसर्जनत्वेनोपस्थितमन्यत्रान्वेति । अन्यथा राजपुरुषमानयेत्यादावपि राज्ञः क्रियान्वयापत्तेः । अतः प्रत्ययार्थस्यैव नञर्थेनान्वयः । तत्रापि नाख्यातत्वांशवाच्यार्थभावनायाः । तस्या लिङंश- वाच्यप्रवर्तनोपसर्जनत्वेनोपस्थितेः, किन्तु लिङंशवाच्यशब्दभावनायाः, तस्याः सर्वापेक्षया प्रधानत्वात् । यहां पर यह प्रश्न उठता है कि ‘निषेध वाक्योंका अर्थ निवर्तना ( निवृत्ति ) नहीं हो सकता है क्योंकि नञर्थ-अभावका अन्वय धात्वर्थके साथ होगा । तब जैसे ‘यजेत’ यहांपर यागकर्तव्यता वाक्यार्थ होता है उसी तरह ‘न कलञ्जं भक्षयेत्’ इत्यादि स्थलमें भी कलञ्जकर्मक भक्षणाभावकर्तव्यता ही वाक्यार्थ होगा । इसका समाधान करते हैं कि धात्वर्थका नञर्थ-अभावके साथ अन्वय नहीं कर सकते हैं क्योंकि अव्यवधानसे धात्वर्थकी उपस्थिति होनेपर भी धात्वर्थकी प्रत्ययार्थ भावनामें ( उपसर्जनत्वेन ) विशेषण रूपसे उपस्थिति होती है । एकमें जो विशेषण रहता है वह फिर दूसरे पदार्थोंमें विशेषण नहीं होता यह नियम है, ऐसा नियम
६६ अर्थसंग्रहः— नहीं माननेसे 'राजपुरुषमानय' यहांपर आनयन क्रियामें राजाका अन्वय होने लगेगा । इसलिए प्रत्ययार्थका ही नञर्थ अभावमें अन्वय होगा । प्रत्ययार्थमें भी आख्याताार्थ आर्थी भावनाका अन्वय नहीं होगा क्योंकि आर्थीभावना लिङ् अर्थ ( वाच्य ) शाब्दीभावनामं विशेषण है अतः सर्वापेक्षया प्रधान जो लिङर्थ शाब्दी भावना है उसीका नञर्थके साथ अन्वय होगा । नञ्स्वभावकथनम् । नञश्चैष स्वभावो यत्स्वसमभिव्याहृतपदार्थविरोधिवोधकत्वम् । यथा 'घटो नास्ती'त्यादौ अस्तीतिशब्दसमभिव्याहृतो नञ् घटसत्त्वविरोधि घटासत्त्वं गमयति, तदिह लिङ्समभिव्याहृतो नञ् लिङर्थप्रवर्तनाविरो- थिनीं निवर्तनामेव बोधयति । विधिवाक्यश्रवणेऽयं मां प्रवर्तयतीति प्रती- तेः । तस्मान्निषेधवाक्यस्थले निवर्तनैव वाक्यार्थः । यदा तु प्रत्ययार्थस्य तत्रान्वये बाधकं तदा धात्वर्थस्यैव तत्रान्वयः । नञ्का यह स्वभाव है कि स्व ( नञ् ) समभिव्याहृत ( पासमें वर्तमान ) पदार्थका विरोधी जो है उसका बोधक होता है । जैसे 'घटो नास्ति' यहां पर अस्ति शब्दका समभिव्याहृत नञ् घटसत्त्वके विरोधी घटसत्ताभावका बोधक होता है उसी तरह लिङ्-समभिव्याहृत नञ् लिङर्थप्रवर्तनाके विरोधी अर्थात् निवर्तनाका बोधक होगा । क्योंकि जैसे विधि वाक्यके श्रवण होनेसे यह विधि मुझे यागादिमें प्रवृत्ति कराती है ऐसी प्रतीति होती है उसी तरह निषेध-वाक्य श्रवण होनेपर यह निषेध-वाक्य कलञ्ज-भक्षणसे मुझे निवृत्ति कराता है ऐसी प्रतीति होती है । इसलिये निषेध-वाक्य-स्थलमें निवर्तना ही वाक्यार्थ है । इस तरह निषेध-वाक्यस्थल में निवर्तनाको वाक्यार्थ माननेसे विधि और निषेधका भिन्नार्थत्व होता है । भक्षणाभावकर्तव्यताको वाक्यार्थ माननेसे विधि और निषेध दोनों जगह कर्तव्यता ही वाक्यार्थ होगा तो दोनोंमें समानार्थत्व हो जायगा । और समानार्थत्व अनुचित है । कहा भी है कि 'अन्तरं यादृशं लोके ब्रह्महत्याश्वमेधयोः । दृश्यते तादृगेवेह विधानप्रतिषेधयोः' यदि नञर्थ अभावके साथ प्रत्ययार्थका अन्वयमें बाधक हो तो धात्वर्थका ही अन्वय होता है । बाधकं द्विविधम् । तच्च बाधकं द्विविधम्–तस्य व्रतमित्युपक्रमो विकल्पप्रसक्तिश्च । तत्राद्यं
दीपिकाटीकासहितः। ६७ 'नेक्षेतोद्यन्तमादित्य'मित्यादौ। तस्य व्रतमित्युपक्रम्यैतद्वाक्यपाठात्। तथा चात्र पर्युदासाश्रयणम्। नञर्थ अभावके साथ प्रत्ययार्थका अन्वय होनेमें दो बाधक हैं 'तस्य व्रतम्' यह (उपक्रम) प्रकरण और विकल्पप्राप्ति। उनमें 'नेक्षेतोद्यन्तमादित्यम्' यह प्रथमका उदाहरण है (तस्य) स्नातक विशेष ब्रह्मचारीका (व्रतम्) प्रजापति- देवताक आदित्यानीक्षणसंकल्पादि जो अनुष्ठेय नियम है उस प्रकरणमें 'नेक्षेतोद्य- न्तमादित्यं नास्तं यन्तं कदाचन' इसका पाठ है यहां नञर्थ पर्युदास मानना होगा अर्थात् यहां नञर्थमें धात्वर्थका ही अन्वय होगा प्रत्ययार्थका नहीं। तथा हि—व्रतशब्दस्य कर्तव्यर्थे रूढत्वात्तस्य व्रतमित्यत्र स्नातकस्य व्रतानां कर्तव्यत्वेनोपक्रमात्। किं तत्कर्तव्यमित्याकाङ्क्षायां 'नेक्षेतोद्यन्त- मि'त्यादिना कर्तव्यर्थ एव प्रतिपादनीयः। अन्यथा पूर्वोत्तरवाक्ययोरेक- वाक्यत्वं न स्यात्। यहां पर नञर्थमें प्रत्ययार्थका अन्वय नहीं होता है क्योंकि कर्तव्य अर्थमें व्रत शब्दकी रूढि है अतः 'तस्य व्रतम्' इस वाक्यसे स्नातकके व्रतोंका कर्तव्यत्वेन उपादान है अर्थात् स्नातक ब्रह्मचारियोंका क्या कर्तव्य है ऐसी आकांक्षा होनेपर 'नेक्षेतोद्यन्तम्' इत्यादि वाक्य कर्तव्यार्थ ही कहा गया है। यदि 'नेक्षेत' इत्यादि कर्तव्यार्थ नहीं कहा जाय तो 'तस्य व्रतम्' और 'नेक्षेत' इन दोनोंकी एकवाक्यता नहीं होगी। तथा च नञर्थेन न प्रत्ययार्थान्वयः कर्तव्यार्थानवबोधात्। विध्यर्थ- प्रवर्तनाविरोधिनिवर्तनाया एव तादृशनञा बोधनात्, तस्याश्च कर्तव्यार्थ- त्वाभावात। तस्मान्नेक्षेतेत्यत्र नञा धात्वर्थविरोध्यनीक्षणसंकल्प एव लक्ष- णया प्रतिपाद्यते तस्य कर्तव्यत्वसंभवात्। 'नेक्षेत' इससे कर्तव्यार्थको ही प्रतिपादित होनेके कारण नञर्थाभावके साथ प्रत्ययार्थका अन्वय नहीं होता क्योंकि प्रत्ययार्थके अन्वयसे कर्तव्यार्थका बोध नहीं होकर विध्यर्थ प्रवर्तनाके विरोधी निवर्तनाका ही बोध होगा और निवर्तनाका कर्तव्य अर्थ नहीं होता। किन्तु निवृत्ति अर्थ होता है। इसलिये 'नेक्षेत' यहां पर नञ्से धात्वर्थका विरोधी अनीक्षण संकल्पका लक्षणाद्वारा प्रतिपादन होता है और अनीक्षण संकल्पका कर्तव्यार्थत्व संभव है।
६८ | अर्थसंग्रहः—
पर्युदासपक्षे नेक्षेतेत्यस्य वाक्यार्थः । आदित्यविषयकानीक्षणसंकल्पेन भावयेदिति वाक्यार्थः । तत्र भाव्या- काङ्क्षायाम् ‘एतावता हैनसा विमुक्तो भवती’तिवाक्यशेषावगतः पापक्षयो भाव्यतयान्वेति । एवं च पूर्वोत्तरयोरेकवाक्यत्वं निर्वहत्येव । न चात्र धात्वर्थविरोधिनः पदार्थान्तरस्यापि संभवात्कथमनीक्षणसंकल्पस्यैव भाव- नान्वय इति वाच्यम् । तस्य कर्तव्यताऽभावेन प्रकृते भावनान्वया- योग्यत्वात् । ‘सूर्यविषयकदर्शनाभाव-(अनीक्षण) संकल्पसे भावना करे’ यहां पर किसकी भावना करे ऐसी आकांक्षा होने पर ‘एतावता हैनसा विमुक्तो भवति’ इस वाक्य शेषसे ज्ञातपापक्षयरूप फलका ही (भाव्यतया) साध्यतया अन्वय होगा । इस तरहसे पूर्वोत्तर वाक्योंमें एकवाक्यताभी होगी । फलितार्थ यह हुआ कि स्नातक ब्रह्मचारी ‘उदय और अस्त समयमें सूर्यका दर्शन नहीं करूंगा’ इस तरहके संकल्प से पापका नाश करे । यहां पर यह शंका होती है कि धात्वर्थका नञर्थमें अन्वय करने पर भी धात्वर्थदर्शनका विरोधी दर्शनाभावविषयक संकल्प ही नहीं है अपितु कपड़ा प्रभृतिसे नयनपिधान भी विरोधी है अतः अनीक्षण संकल्पहीका अन्वय भावनामें कैसे होगा ? उसका समाधान करते हैं कि कपड़ाप्रभृतिसे नयनपिधानका दर्शनविरोधी होने पर भी अयोग्य होनेके कारण भावनामें अन्वय नहीं होगा क्योंकि कर्तव्यत्वेन विवक्षित पदार्थ की ही भावनान्वययोग्यता होती है । कपड़ा प्रभृतिसे नयनपिधान कर्तव्यत्वेन विवक्षित नहीं है अतः उसमें योग्यता भी नहीं हैं । विकल्पप्रसक्तौ पर्युदासाश्रयणम् । द्वितीयं ‘यजतिषु ये यजामहं करोति नानुयाजेष्वि’त्यादौ । अत्र विकल्प- प्रसक्तौ च पर्युदासाश्रयणात् । तथा हि-यद्यत्र वाक्ये नञर्थे प्रत्ययार्थान्वयः स्यात्तदा अनुयाजेषु ‘येयजामहे’ इति मन्त्रस्य प्रतिषेधः स्यात् , अनुयाजेषु येयजामहं न कुर्यादिति । स च प्राप्तिपूर्वक एव, प्राप्तस्यैव प्रतिषेधात् । प्राप्तिश्च ‘यजतिषु येयजामहं करोती’ति शास्त्रादेव वाच्या । शास्त्रप्राप्तस्य च प्रतिषेधे विकल्प एव, न तु बाधः । प्राप्तिमूलरागस्येव तन्मूलशास्त्रस्य शास्त्रान्तरेण बाधा- योगात् । नञर्थके साथ प्रत्ययार्थका अन्वयमें विकल्पप्रसक्तिरूपबाधक ‘यजतिषु येयजा-
दीपिकाटीकासहितः । ६६ यहं करोति नानुयाजेषु' इत्यादिस्थलमें है। यहां पर विकल्पापत्ति होने लगेगी अतः पर्युदासका आश्रयण करते हैं । जैसे इस ( नानुयाजेषु ) वाक्यमें नञर्थाभावके साथ प्रत्ययार्थका अन्वय होने पर यही अर्थ होगा कि अनुयाजमें 'येयजामहे' नहीं करे इससे 'येयजामह' इस मंत्रोच्चारणका निषेध सिद्ध होनेसे प्राप्तका ही निषेध होता है अतः प्राप्तिपूर्वक निषेध होगा और 'यजतिषु येयजामहं करोति' अर्थात् यागमें 'येयजामह' मन्त्रका उच्चारण करना चाहिए इस शास्त्रसे ही येयजामह मन्त्रोच्चारणकी प्राप्ति करनी होगी । परन्तु शास्त्र प्राप्तका प्रतिषेध होने पर विकल्प होता है । बाध नहीं होता है इसका कारण स्वयं ग्रन्थकार आगे बतलायेंगे । जैसे रागसे कलञ्जादि भक्षणमें प्रवृत्त पुरुषोंको भक्षण प्राप्तिके कारण भूत रागका बाध करता हुआ 'न कलंजं भक्षयेत्' यह निषेधशास्त्र कलंजभक्षणसे लौटाता है वैसे 'येयजामह' इस मन्त्रप्राप्तिके कारणभूत 'यजतिषु येयजामहं' इस शास्त्रका 'नानुयाजेषु' इस शास्त्रान्तरसे बाध नहीं होता है । न च 'पदे जुहोती'तिविशेषशास्त्रेण 'आहवनीये जुहोति'ति शास्त्र- स्येव 'नानुयाजेष्वि'त्यनेन 'यजतिषु येयजामहं करोती'त्यस्य बाधः स्या- दिति वाच्यम् । परस्परनिरपेक्षयोरेव शास्त्रयोर्बाध्यबाधकभावात् । पदशा- स्त्रस्य हि स्वार्थविधानार्थमाहवनीयशास्त्रानपेक्षत्वान्निरपेक्षत्वम् । प्रकृते तु निषेधशास्त्रस्य निषेध्यप्रसक्त्यर्थं 'यजतिषु येयजामह'मित्यस्यापेक्षत्वान्न निरपेक्षत्वम् । यहां पर यह शंका उठती है कि जैसे 'पदे जुहोति' इस विशेष शास्त्रसे 'आह- वनीये जुहोति' इस सामान्यशास्त्रका बाध होता है उसी तरह 'यजतिषु येयजामहं करोति' इस सामान्यशास्त्रका 'नानुयाजेषु' इस विशेष शास्त्रसे बाध होना चाहिये । उसका समाधान करते हैं कि— परस्पर निरपेक्ष शास्त्रोंमें बाध्यबाधकभाव होता है । 'पदे जुहोति' इस शास्त्रमें स्वार्थविधानके लिये 'आहवनीय शास्त्रकी अपेक्षा नहीं है । अतः पदशास्त्रसे आहवनीयशास्त्रका बाध होता है । प्रकृतमें तो निषेधशास्त्रको निषेध्य (जिसका निषेध करेगा) प्राप्तिके लिए 'यजतिषु येयजामहं करोति' इस शास्त्रकी अपेक्षा होती है अतः उपजीव्यविरोधके भयसे प्रकृतमें बाध्यबाधकभाव नहीं होगा । बाधायोगोपसंहारः । तस्माच्छास्त्रविहितस्य शास्त्रान्तरेण प्रतिषेधे विकल्प एव । स च न-
युक्तः । विकल्पे शास्त्रस्य पाक्षिकाप्रामाण्यापातात् । न ह्यनुयाजेषु येयजा- महमित्यस्यानुष्ठाने नानुयाजेष्वित्यस्य प्रामाण्यं संभवति, व्रीहियागानुष्ठाने यवशास्त्रस्येव । द्विरदृष्टकल्पना च स्यात् , विधिप्रतिषेधयोरपि पुरुषार्थ- त्वात् , अतो नात्र प्रतिषेधस्याश्रयणम् , किंतु नञोऽनुयाजसंबन्धमाश्रित्य पर्युदासस्यैव । पूर्वोक्त युक्तिसे निषेध्यशास्त्रका निषेधकशास्त्रसे सर्वथा बाध असंभव है अतः शास्त्रान्तरसे प्रतिषेध होने पर विकल्प ही होगा । परन्तु विकल्प उचित नहीं है । क्योंकि विकल्प होनेसे शास्त्रमें एकपक्षमें अप्रामाण्यापत्ति होगी । अनुयाजमें 'येयजामहं' मन्त्रका उच्चारण ( अनुष्ठान ) करनेसे 'नानुयाजेषु' इस शास्त्रमें प्रामाण्य कथमपि नहीं हो सकता अर्थात् जैसे व्रीहिसे याग करने पर यवशास्त्रमें अप्रामाण्य होता है उसी तरह 'नानुयाजेषु' इस शास्त्रका भी अप्रामाण्य होगा । और जैसे दर्शपूर्णमास यागमें मिथ्या नहीं बोलनेसे अदृष्टकी उत्पत्ति होती है उसी तरह विकल्प मानने से 'यजतिषु येयजामहं' इस शास्त्रमें भी यह ज्ञान होगाकि अनुयाजमें येयजामह मन्त्रके अनुष्ठानसे कोई उपकाररूप अदृष्ट होता है । एवं 'नानुयाजेषु' इस शास्त्रसे मालूम होगाकि अनुयाजमें 'येयजामह' मन्त्रका अनुष्ठान नहीं करनेसे भी उपकाररूप कोई अदृष्ट होता है इस तरह दो अदृष्टों की कल्पना करनी होगी । इसलिये यहां पर प्रतिषेधका आश्रयण अर्थात् प्रत्ययार्थका नञर्थके साथ अन्वय नहीं है किन्तु नञर्थका अनुयाजके साथ सम्बन्ध मान कर पर्युदासका ही आश्रयण है । इत्थं चानुयाजव्यतिरिक्तेषु 'यजतिषु येयजामहं' इति मन्त्रं कुर्यादिति वाक्यार्थबोधः नञोऽनुयाजव्यतिरिक्ते लाक्षणिकत्वात् । एवं च न विकल्पः । अत्र च वाक्ये येयजामहं इति न विधीयते, यजतिषु येयजा- महमित्यनेनैव प्राप्तत्वात् । किंतु सामान्यशास्त्रप्राप्त-येयजामहं इत्यनुवादेन तस्यानुयाजव्यतिरिक्तविषयकत्वं विधीयते । यद्यजतिषु येयजामहं करोति तदनुयाजव्यतिरिक्तेष्विति । तब नञ्को अनुयाजव्यतिरिक्त ( भिन्न ) में लक्षण मानकर अनुयाज भिन्न में 'येयजामह' इस मन्त्र का अनुष्ठान करना चाहिये ऐसा वाक्यार्थ बोध होगा । इस तरह करने पर विकल्प नहीं होता । 'नानुयाजेषु' इस वाक्यसे 'येयजामह' इस का विधान नहीं किया जाता है क्योंकि 'यजतिषु येयजामह' इसीसे येयजामह
दीपिकाटीकासहितः। ७१ प्राप्त है। किन्तु सामान्य शास्त्र ( यजतिषु येयजामहं )-से प्राप्त येयजामहका अनुवादकर 'येयजामह'-को अनुयाजब्यतिरिक्त विषयकत्वका विधान करता है। अर्थात् अनुयाज भिन्न यागमें 'येयजामह' मन्त्रका उच्चारण करना चाहिये। ऐसे करनेसे कोई दोष नहीं होता है। अतः पर्युदास ही यहां उचित है। पर्युदासोपसंहारयोर्भेदवर्णनम्। नन्वेवं सामान्यशास्त्रप्राप्तस्य विशेषे संकोचनरूपादुपसंहारात्पर्युदास- स्य भेदो न स्यादिति चेन्न। उपसंहारो हि तन्मात्रसंकोचार्थः। यथा पुरोडाशं चतुर्धा करोतीति सामान्यप्राप्तचतुर्धाकरणम् आग्नेयं चतुर्धा करोतीति विशेषादाग्नेयपुरोडाशमात्रे संकोच्यते। पर्युदासस्तु तदन्यमात्र- संकोचार्थ इति ततो भेदात्। यहांपर प्रश्न होता है कि यदि पर्युदास स्थलमें भी सामान्य शास्त्रसे प्राप्तका विशेष में संकोच हो तो पर्युदास और उपसंहार में कोई भेद नहीं रहेगा क्योंकि सामान्य शास्त्रसे प्राप्तका विशेषमें संकोचको ही उपसंहार कहते हैं। इसका समाधान करते हैं कि सामान्यसे प्राप्तका विशेष मात्रमें संकोच करना ही उपसंहार होता है जैसे 'पुरोडाशं चतुर्धा करोति' इस सामान्य शास्त्र द्वारा प्राप्त पुरोडाशके चतुर्धाकरणसे 'आग्नेयं चतुर्धा करोति' इस विशेष शास्त्रसे अग्निदेवताक पुरोडाशका ही चतुर्धाकरण होता है दूसरे पुरोडाशका नहीं। पर्युदास स्थलमें सामान्यसे प्राप्तका विशेष शास्त्रसे विशेष भिन्नमें संकोच होता है इसलिये दोनोंमें बहुत भेद है। नवीनोंका मत है कि सामान्यसे प्राप्तका विशेषमें संकोच रूप जो विधि शास्त्रका व्यापार है उसे उपसंहार कहते हैं परन्तु 'पर्युदासः स विज्ञेयो यत्रोत्तर- पदेन नञ्' इस अभियुक्त वचनसे प्रत्ययातिरिक्त प्रातिपदिकार्थ अथवा धात्वर्थके साथ नञ्के सम्बन्धको पर्युदास कहते हैं। अतः पर्युदास और उपसंहारमें स्वरूपतः भेद स्पष्ट है। कुत्रचिद्विकल्पप्रसक्तावप्यनन्यगत्या प्रतिषेधाश्रयणम्। यथा 'नातिरात्रे षोडशिनं गृह्णाती'त्यादौ। अत्र हि 'अतिरात्रे षोडशिनं गृह्णाती'ति शास्त्र- प्राप्तषोडशिग्रहणस्य निषेधाद्विकल्पप्रसक्तावपि न पर्युदासाश्रयणम्, संभवात्। किसी स्थलमें विकल्प दोष होनेपर भी (अनन्यगत्या) पर्युदासका संभव नहीं होनेसे प्रतिषेधका ही आश्रयण होता है। जैसे 'अतिरात्रे षोडशिनं
७२ : अर्थसंग्रहः - गृह्णाति' इस विशेष शास्त्रसे विकल्प होनेपर भी निषेधका ही ग्रहण होता है क्योंकि यहां पर्युदासका संभव नहीं है। नञर्थके दो भेद हैं-निषेध और पर्युदास । जहां प्रत्ययार्थके साथ अन्वय रहेगा वहां निषेध अर्थ जाना जाता है। और उत्तर पदार्थके साथ अन्वय रहनेपर पर्युदास अर्थ जाना जाता है। तथा हि—यद्यत्र षोडशिपदार्थेन नञोऽन्वयस्तदातिरात्रे षोडशिव्य- तिरिक्तं गृह्णातीति वाक्यार्थबोधः स्यात्, स च न संभवति, अतिरात्रे षोडशिनं गृह्णातीति प्रत्यक्षविधिविरोधात् । यदि चातिरात्रेण पदार्थेना- न्वयस्तदातिरात्रव्यतिरिक्ते षोडशिनं गृह्णातीति वाक्यार्थबोधः स्यात्, सोऽपि न संभवति तद्विधिविरोधात् । अतोऽत्रानन्यगत्या शास्त्रप्राप्तषोडशि- ग्रहणस्यैव निषेधः । न च विकल्पप्रसक्तिस्तस्याप्यपेक्षणीयत्वात् । 'नातिरात्रे षोडशिनं गृह्णाति' यहां पर्युदासका संभव नहीं है क्योंकि यदि 'नातिरात्रे' यहां पर षोडशि पदार्थके साथ नञर्थका अन्वय करेंगे तो 'अतिरात्र में षोडशिभिन्नका ग्रहण करे' यह वाक्यार्थ बोध होगा; परन्तु यह बोध संभव नहीं है क्योंकि 'अतिरात्रे षोडशिनं गृह्णाति' इस प्रत्यक्ष विधिसे विरोध लगेगा । यदि अतिरात्र पदार्थके साथ नञर्थका अन्वय करेंगे तो 'अतिरात्रभिन्नमें षोडशि ग्रहण करे' यह वाक्यार्थ बोध होगा लेकिन ये सभी संभव नहीं हैं क्योंकि 'अति रात्रे षोडशिनं गृह्णाति' इसी प्रत्यक्ष विधिसे विरोध होगा । अतः यहांपर पर्युदा- सका आश्रयण असंभव है अतः सामान्यशास्त्र प्राप्त षोडशी ग्रहणका पाक्षिक प्रतिषेध होता है । इसलिए विकल्पापत्ति दोष नहीं दे सकते हैं क्योंकि विकल्प यहां इष्ट ही है। विकल्पे प्रतिषिध्यमानस्याऽनर्थहेतुत्वाभाववर्णनम् । इयांस्तु विशेषो यद्विकल्पादकप्रतिषेधेऽपि प्रतिषिध्यमानस्य नानर्थ- हेतुत्वम्, विधिनिषेधोभयस्यापि क्रत्वर्थत्वात् । यत्र तु न विकल्पः, प्राप्तिश्च रागत एव, प्रतिषेधश्च पुरुषार्थः तत्र प्रतिषिध्यमानस्यानर्थहेतुत्वम्, यथा 'न कलञ्जं भक्षये'दित्यादौ कलञ्जभक्षणादेः, तत्र भक्षणनिषेधस्यैव पुरुषार्थत्वात् । यहां यह शंका होती है कि यदि 'नातिरात्रे' यहां विकल्प प्रसंग होनेपर भी षोडशि ग्रहणका प्रतिषेध करते हैं तो जैसे कलञ्ज भक्षण अनर्थका कारण है उसी तरह षोडशि ग्रहण भी अनर्थका कारण होगा । क्योंकि प्रतिषिध्यमान
अनर्थका कारण होता है । इसका समाधान करते हैं-यहां यही एक विशेषता है कि विकल्प होनेसे एकका प्रतिषेध होने पर भी प्रतिषिध्यमान षोडशि ग्रहण विहित होनेसे अनर्थका कारण नहीं होता है क्योंकि यहां विधि और निषेध दोनों ही क्रत्वर्थ हैं । जहां विकल्प विधायक कोई वचन नहीं है किन्तु विधि रागसे ही प्राप्त है और निषेध पुरुषार्थ है वहां पर प्रतिषिध्यमान पदार्थ अनर्थ का कारण होता है, जैसे 'न कलञ्जं भक्षयेत्' इत्यादि स्थलमें कलञ्ज भक्षण रागतः प्राप्त है और भक्षणका निषेध पुरुषार्थ है । अतः कलञ्जभक्षण अनर्थका कारण होता है । न च 'दीक्षितो न ददाति न जुहोती'त्यादौ शास्त्रप्राप्तदानहोमादीनां निषेधाद्विकल्पापत्तिरिति वाच्यम् । स्वतःपुरुषार्थभूतदानहोमादीनां निषे- धस्य पुरुषार्थत्वाभावेऽपि निषिध्यमानस्थानर्थहेतुत्वात्, यथा क्रतौ स्व- स्त्रीगमनादेः, तन्निषेधस्य क्रत्वर्थत्वेन तस्य क्रतुवैगुण्यसंपादकत्वात् । यहां पर प्रश्न होता है कि 'दीक्षितो न ददाति न जुहोति' इस स्थानमें यदि शास्त्र प्राप्त दान-होमादिका निषेध किया जाता है तो षोडशि ग्रहणके समान विकल्प होना चाहिये । इसका उत्तर कहते हैं कि 'षोडशि'ग्रहणकी विधि और प्रति- षेध दोनों ही क्रत्वर्थ हैं इसलिए विकल्प होता है । किन्तु दान-होमादि पुरुषार्थ है और उसका निषेध क्रत्वर्थ है इसलिए विकल्प नहीं होगा । जैसे क्रतुमें स्त्री गमनका निषेध होनेसे पुरुषार्थभूत स्वस्त्रीगमन क्रतुमें अनर्थका कारण होता है उसी तरह निषेध को पुरुषार्थ न होने पर भी निषिध्यमान दान-होम दीक्षितोंके लिए यज्ञमें अनर्थकारक है अर्थात् जैसे क्रतुमें स्वस्त्रीगमन, कलञ्ज-भक्षणादि के समान नरक साधन न होने पर भी क्रतुवैगुण्य सम्पादन द्वारा अनर्थ कारण होता है । वैसे ही दान-होमादि भी यज्ञमें अनर्थ साधन होता है । इसलिए निषेध वाक्य अनर्थ हेतु क्रिया की निवृत्ति द्वारा ही पुरुषार्थ साधक होते हैं । अर्थवादमीमांसा । प्राशस्त्यनिन्दान्यतरपरं वाक्यमर्थवादः । तस्य च लक्षणया प्रयोजन- वदर्थपर्यवसानम् । तथा हि-अर्थवादवाक्यं हि स्वार्थप्रतिपादने प्रयोजना- भावाद्धिधेयनिषेध्ययोः प्राशस्त्यनिन्दितत्वे लक्षणया प्रतिपादयति । स्वाथ- मात्रपरत्वे आनर्थक्यप्रसङ्गात् । आम्नायस्य हि क्रियार्थत्वात् । न चेष्टा- पत्तिः । 'स्वाध्यायोऽध्येतव्यः' इत्यध्ययनविधिना सकलवेदाध्ययनं कर्त्तव्य-
७४ अर्थसंग्रहः— मिति बोधयता सर्ववेदस्य प्रयोजनवदर्थपर्यवसायित्वं सूचयतोपात्तत्वेना- नर्थक्यानुपपत्तेः । प्राशस्त्य अथवा निन्दा-परक वाक्यको अर्थवाद कहते हैं। जहां पर 'वायु- र्वै क्षेपिष्ठा'—इत्यादि अर्थवाद वाक्य स्थलमें प्राशस्त्य अथवा निन्दा बोधक वाक्य नहीं है वहां पर भी लक्षणासे प्रयोजनवाला अर्थका बोधक होगा । क्योंकि अर्थ- वाद वाक्यका स्वार्थ प्रतिपादनमें कोई प्रयोजन नहीं रहता है । अतः विधि वाक्यको विधेयके प्राशस्त्यमें और निषेधको निषेध्यकी निन्दामें लक्षणा होती है । केवल स्वार्थमात्रका प्रतिपादन करनेसे व्यर्थ हो जायगा । क्योंकि समस्त वेदोंको क्रियाका प्रतिपादक मानते हैं इसलिए सिद्धार्थका प्रतिपादन द्वारा स्वार्थमात्रपरक मानकर चरितार्थ करना उचित नहीं है । वैयर्थ्यकी इष्टा- पत्ति नहीं कर सकते हैं क्योंकि 'स्वाध्यायोऽध्येतव्यः' यह अध्ययन विधि सारे वेदोंके अध्ययनकर्तव्यको समझाती हुई सकल वेदोंको प्रयोजनवदर्थपरक कहती है इसलिए अनर्थक नहीं हो सकता है । अर्थवादविभागः । स द्विविधः —विधिशेषो निषेधशेषश्चेति । तत्र 'वायव्यं श्वेतमालभेत भूतिकाम' इत्यादिविधिशेषस्य 'वायुर्वै क्षेपिष्ठा देवते'त्यादेर्विधेयार्थप्राश- स्त्यबोधकतयार्थवत्त्वम् । 'बर्हिषि रजतं न देय'मित्यादिनिषेधशेषस्य, 'सोऽरोदीद्यदरोदीत्तद्रुद्रस्य रुद्रत्वमि'त्यादेर्निषेध्यस्य निन्दितत्वबोधकतया- र्थवत्त्वम् । न च प्राशस्त्यादिबोधस्य निष्प्रयोजनत्वेन नार्थवादस्यार्थवत्त्व- मिति वाच्यम् । आलस्यादिवशादप्रवर्तमानस्य पुंसः प्रवृत्त्यादिजनकत्वेन तद्बोधस्योपयोगात् । अर्थवादके दो भेद हैं विधि शेष और निषेध शेष । उनमें 'वायव्यं श्वेत- मालभेत भूतिकामः' इस विधिका शेष 'वायुर्वै क्षेपिष्ठा देवता' इत्यादि मंत्र है । वह मंत्र विधेय भूत उक्त यज्ञादि कर्म रूप अर्थमें प्राशस्त्यका लक्षणासे बोधन द्वारा प्रवर्तक होनेसे सार्थक होता है । अर्थात् वायु (क्षेपिष्ठा) शीघ्र चलने वाले देवता हैं अतः वायु देवता निमित्तक कर्म अत्यन्त प्रशस्त है इस तरह बोध होनेसे श्रेष्ठजनों की उसमें प्रवृत्ति होती है । 'बर्हिषि रजतं न देयम्' इत्यादि निषेधका शेष (सोऽरोदीत्) इत्यादि है । यह लक्षणासे निषेध्य रजतादि की निन्दाका बोधन द्वारा सार्थक होता है । प्राशस्त्यादि बोधनका कोई प्रयोजन
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नहीं दिखाई देता है अतः अर्थवाद वाक्यका भी कोई प्रयोजन नहीं है ऐसी शंका नहीं कर सकते हैं क्योंकि आलस्यादिसे जो व्यक्ति यागमें प्रवृत्ति नहीं होते हैं उनको कर्म प्राशस्त्य बोधन द्वारा यज्ञादिमें प्रवृत्त कराता है अतः अर्थवाद वाक्य सार्थक है । अर्थवादस्य भेदत्रयम् । स पुनस्त्रेधा । तदुक्तम्—'विरोधे गुणवादः स्यादनुवादोऽवधारिते । भूतार्थवादस्तद्धानादर्थवादस्त्रिधा मतः' इति । अस्यार्थः-प्रमाणान्तरविरोधे सत्यर्थवादो गुणवादः, यथा 'आदित्यो यूप' इत्यादिः । यूप आदित्याभेद- स्य प्रत्यक्षबाधितत्वाद्रादित्यवदुज्ज्वलत्वरूपगुणोऽनेन लक्षणया प्रतिपाद्यते । प्रमाणान्तरावगतार्थबोधकोऽर्थवादोऽनुवादः, यथा 'अग्निर्हिमस्य भेषज- मि'ति, अत्र हिमविरोधित्वस्याग्नौ प्रत्यक्षावगतत्वात् । प्रमाणान्तरविरोध- तत्प्राप्तिरहितार्थबोधकोऽर्थवादो भूतार्थवादः, 'यथा इन्द्रो वृत्राय वज्रमुदय- च्छ'दित्यादिः । अर्थवादके और तीन भेद हैं । गुणवाद, अनुवाद और भूतार्थवाद । उन्हीं में प्रमाणभूत वृद्धका वचन बतलाते हैं—'विरोधे गुणवाद' इत्यादि । उनमें प्रत्येक का क्रमशः लक्षण करते हैं—प्रमाणान्तर से विरोध रहने पर जो अर्थवाद है उसे गुणवाद कहते हैं । जैसे 'आदित्यो यूपः' यहां पर यूप में आदित्य का अभेद प्रत्यक्ष प्रमाणसे बाधित है अतः इस वाक्यसे शुक्लरूप गुण लक्षणासे समझा जाता है अर्थात् उजला यूप । प्रमाणान्तरसे अवगत अर्थका बोधक जो अर्थ- वाद है उसे अनुवाद कहते हैं । जैसे 'अग्निर्हिमस्य भेषजम्' यहां प्रत्यक्ष प्रमाण से 'हिमका औषध अग्नि है' ऐसा अवगत ही है अतः यह अनुवाद है । जहां पर प्रमाणान्तर विरोध रहित और प्रमाणान्तर प्राप्ति रहित अर्थका बोधक अर्थ- वाद हो उसे भूतार्थवाद कहते हैं जैसे—'इन्द्रो वृत्राय वज्रमुदयच्छत्' यहां पर वृत्रके प्रति इन्द्रवज्रोद्यमनका निषेध अथवा वज्र उद्यमन किसीसे बोधित नहीं है अतः यह भूतार्थवाद है । ग्रन्थोपसंहारः । एवं च 'यजेत स्वर्गकाम' इत्यादिनिखिलवेदस्य साक्षात्परम्परया वा यागादिधर्मप्रतिपादकत्वं सिद्धम् । सोऽयं धर्मो यदुद्दिश्य विहितस्तदुद्देशेन
७६ अर्थसंग्रहः— क्रियमाणस्तद्धेतुः। ईश्वरार्पणबुद्ध्या क्रियमाणस्तु निःश्रेयसहेतुः। न च तदर्पणबुद्ध्यनुष्ठाने प्रमाणाभावः 'यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्। यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्'ति भगवद्गीतास्मृतेरेव प्रमा- णत्वात्। स्मृतिचरणे तत्प्रामाण्यस्य श्रुतिमूलकत्वेन व्यवस्थापनादिति शिवम् ॥ बालानां सुखबोधाय भास्करेण सुमेधसा। रचितोऽयं समासेन जैमिनीयार्थसंग्रहः ॥ १ ॥ इति श्रीमहामहोपाध्याय लौगाक्षिभास्करविरचितपूर्वमीमांसार्थ- संग्रहनामकं प्रकरणं समाप्तिम्गात् ॥ इस तरहसे 'यजेत स्वर्गकामः' इत्यादि सब वेद कोई साक्षात् और कोई परम्परया यागादि रूप धर्मका प्रतिपादक है यह सिद्ध हुआ। यह यागादि रूप धर्म जिस उद्देश्यसे विहित है उस उद्देश्यसे करने पर वह फल अवश्य मिलता है। ईश्वरार्पण बुद्धिसे याग करने पर मोक्ष मिलता है। ईश्वरार्पण बुद्धिसे अनुष्ठान करनेमें कोई प्रमाण नहीं है यह नहीं कह सकते हैं क्योंकि 'यत्क- रोषि' इत्यादि स्मृति ही प्रमाण है। स्मृति वेदमूलक है अतः स्मृति भी प्रमाण है। श्री लौगाक्षिभास्करने बालकोंको अनायाससे बोध हो इसलिए संक्षेपमें यह मीमांसाका अर्थसंग्रह नामक ग्रन्थ बनाया ॥ १ ॥ जयतु श्रीरामः समाप्तश्चायं ग्रन्थः।
पारिभाषिक शब्दों के अर्थों का संकलन अपूर्व — अदृष्ट ( धर्मविशेष ) | उत्पत्त्यपूर्व — धर्मविशेष अङ्गापूर्व — धर्मविशेष | उत्पवन — ऊपर फेकना अपौरुषेय — धर्मविशेष | उद्भिद् — पशुपोषक यागविशेष अर्थवाद — प्रशंसापरक वाक्य (फलश्रुति) | उपभृत् — यज्ञपात्रविशेष अमूर्त्त — निराकार | उलप -- तृणविशेष अश्वाभिधानी — घोड़े की लगाम रस्सी | औपवसथ्य — यज्ञारम्भदिनकृत्य विशेष अभिक्रमण — भ्रमण | कपाल — यज्ञकाष्ठपात्रविशेष अवत्त — खण्डित | कलञ्ज — विषाक्तबाणहतपशुमांसविशेष अभिषेचनीय — सोमयागविशेष | गार्हपत्य — अग्नि विशेष अवभृथ — यज्ञान्त दिनकृत्य विशेष | चमस — सोमरस अग्नीषोमीय — यज्ञारम्भ दिनविहित | चित्रा — यागविशेष पशुविशेष | जुहू — अर्धचन्द्राकृति यज्ञपात्र विशेष अक्ष — पाशा ( चौपड़ ) | दर्श — अमावास्या अभिघारण — द्रवितघृतसेचन | देवन — जूआ अनुयाज — यागविशेष | नियोजन — यूपबन्धन आर्थीभावना — पुरुषनिष्ठ प्रवृत्तिरूप | निर्वाप — प्रक्षेप व्यापार | निर्वापन — काटना आहवनीय — यज्ञीय अग्निविशेष | पर्णता — पलाश अनुवाक्या — यज्ञीय अग्निविशेष | पुरोडाश — चरु ( हवि विशेष ) आम्रन — यागविशेष | प्रकृतियाग — साङ्गोपाङ्गविहितयाग विशेष आनुबन्ध्य — यज्ञान्तविहित पशुविशेष | प्रयाज — समिधयागविशेष आश्विनग्रह — सोमरसग्रहण | प्राजापत्य — पशुयागविशेष इतिकर्तव्यता — कार्य करने का प्रकार | फलापूर्व — धर्मविशेष
( २ ) बर्हिष्—कुश | षोडशी—यज्ञविशेष भ्रातृव्य—शत्रु | सदन—स्थान यवागू—हलुआ | संदंश—संडशी के सदृश मंत्रद्वयमध्य याज्या—मंत्र विशेष | पठित मंत्र विशेष रथकार—नीच शूद्र विशेष | सवनीय—यज्ञमध्यविहित पशुविशेष रशना—घोड़े की लगाम ( रस्सी ) | समाख्या—योगशक्ति लिङ्ग—रूढिशक्ति | समुदायापूर्व—धर्मविशेष वाजपेय { पानयोग्य सुराविशेष | सद्यस्क—सोम यागविशेष { तत्साध्य यागविशेष | साधन—उपाय ( हेतु ) | साध्य—उद्देश्य ( प्रयोजन ) त्रिकृतियाग—कतिपय अङ्गरहित याग | सान्नाय्य—ऐन्द्र याग विशेष | सुत्या—सोमरसनिच्योतनकाल शाब्दीभावना—शब्दनिष्ठप्रवर्तन | सोम { अमरलता-रसविशेष- व्यापारविशेष | { तत्साध्य-यागविशेष श्येनाभिचार—वाजपक्षिखननसाध्य- | सौत्य—यज्ञमध्यदिन-कृत्यविशेष याग विशेष | स्योन—समीचीन श्रुति—प्रमाणान्तरनिरपेक्ष शब्दविशेष | स्वर्ग—सुख विशेष