भारतकोश
अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary

लौगाक्षि भास्कर द्वारा

DevanagariHindipublished84 पृष्ठ

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६८ | अर्थसंग्रहः—

पर्युदासपक्षे नेक्षेतेत्यस्य वाक्यार्थः । आदित्यविषयकानीक्षणसंकल्पेन भावयेदिति वाक्यार्थः । तत्र भाव्या- काङ्क्षायाम् ‘एतावता हैनसा विमुक्तो भवती’तिवाक्यशेषावगतः पापक्षयो भाव्यतयान्वेति । एवं च पूर्वोत्तरयोरेकवाक्यत्वं निर्वहत्येव । न चात्र धात्वर्थविरोधिनः पदार्थान्तरस्यापि संभवात्कथमनीक्षणसंकल्पस्यैव भाव- नान्वय इति वाच्यम् । तस्य कर्तव्यताऽभावेन प्रकृते भावनान्वया- योग्यत्वात् । ‘सूर्यविषयकदर्शनाभाव-(अनीक्षण) संकल्पसे भावना करे’ यहां पर किसकी भावना करे ऐसी आकांक्षा होने पर ‘एतावता हैनसा विमुक्तो भवति’ इस वाक्य शेषसे ज्ञातपापक्षयरूप फलका ही (भाव्यतया) साध्यतया अन्वय होगा । इस तरहसे पूर्वोत्तर वाक्योंमें एकवाक्यताभी होगी । फलितार्थ यह हुआ कि स्नातक ब्रह्मचारी ‘उदय और अस्त समयमें सूर्यका दर्शन नहीं करूंगा’ इस तरहके संकल्प से पापका नाश करे । यहां पर यह शंका होती है कि धात्वर्थका नञर्थमें अन्वय करने पर भी धात्वर्थदर्शनका विरोधी दर्शनाभावविषयक संकल्प ही नहीं है अपितु कपड़ा प्रभृतिसे नयनपिधान भी विरोधी है अतः अनीक्षण संकल्पहीका अन्वय भावनामें कैसे होगा ? उसका समाधान करते हैं कि कपड़ाप्रभृतिसे नयनपिधानका दर्शनविरोधी होने पर भी अयोग्य होनेके कारण भावनामें अन्वय नहीं होगा क्योंकि कर्तव्यत्वेन विवक्षित पदार्थ की ही भावनान्वययोग्यता होती है । कपड़ा प्रभृतिसे नयनपिधान कर्तव्यत्वेन विवक्षित नहीं है अतः उसमें योग्यता भी नहीं हैं । विकल्पप्रसक्तौ पर्युदासाश्रयणम् । द्वितीयं ‘यजतिषु ये यजामहं करोति नानुयाजेष्वि’त्यादौ । अत्र विकल्प- प्रसक्तौ च पर्युदासाश्रयणात् । तथा हि-यद्यत्र वाक्ये नञर्थे प्रत्ययार्थान्वयः स्यात्तदा अनुयाजेषु ‘येयजामहे’ इति मन्त्रस्य प्रतिषेधः स्यात् , अनुयाजेषु येयजामहं न कुर्यादिति । स च प्राप्तिपूर्वक एव, प्राप्तस्यैव प्रतिषेधात् । प्राप्तिश्च ‘यजतिषु येयजामहं करोती’ति शास्त्रादेव वाच्या । शास्त्रप्राप्तस्य च प्रतिषेधे विकल्प एव, न तु बाधः । प्राप्तिमूलरागस्येव तन्मूलशास्त्रस्य शास्त्रान्तरेण बाधा- योगात् । नञर्थके साथ प्रत्ययार्थका अन्वयमें विकल्पप्रसक्तिरूपबाधक ‘यजतिषु येयजा-