भारतकोश
अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary

लौगाक्षि भास्कर द्वारा

DevanagariHindipublished84 पृष्ठ

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पृष्ठ 75

दीपिकाटीकासहितः । ६६ यहं करोति नानुयाजेषु' इत्यादिस्थलमें है। यहां पर विकल्पापत्ति होने लगेगी अतः पर्युदासका आश्रयण करते हैं । जैसे इस ( नानुयाजेषु ) वाक्यमें नञर्थाभावके साथ प्रत्ययार्थका अन्वय होने पर यही अर्थ होगा कि अनुयाजमें 'येयजामहे' नहीं करे इससे 'येयजामह' इस मंत्रोच्चारणका निषेध सिद्ध होनेसे प्राप्तका ही निषेध होता है अतः प्राप्तिपूर्वक निषेध होगा और 'यजतिषु येयजामहं करोति' अर्थात् यागमें 'येयजामह' मन्त्रका उच्चारण करना चाहिए इस शास्त्रसे ही येयजामह मन्त्रोच्चारणकी प्राप्ति करनी होगी । परन्तु शास्त्र प्राप्तका प्रतिषेध होने पर विकल्प होता है । बाध नहीं होता है इसका कारण स्वयं ग्रन्थकार आगे बतलायेंगे । जैसे रागसे कलञ्जादि भक्षणमें प्रवृत्त पुरुषोंको भक्षण प्राप्तिके कारण भूत रागका बाध करता हुआ 'न कलंजं भक्षयेत्' यह निषेधशास्त्र कलंजभक्षणसे लौटाता है वैसे 'येयजामह' इस मन्त्रप्राप्तिके कारणभूत 'यजतिषु येयजामहं' इस शास्त्रका 'नानुयाजेषु' इस शास्त्रान्तरसे बाध नहीं होता है । न च 'पदे जुहोती'तिविशेषशास्त्रेण 'आहवनीये जुहोति'ति शास्त्र- स्येव 'नानुयाजेष्वि'त्यनेन 'यजतिषु येयजामहं करोती'त्यस्य बाधः स्या- दिति वाच्यम् । परस्परनिरपेक्षयोरेव शास्त्रयोर्बाध्यबाधकभावात् । पदशा- स्त्रस्य हि स्वार्थविधानार्थमाहवनीयशास्त्रानपेक्षत्वान्निरपेक्षत्वम् । प्रकृते तु निषेधशास्त्रस्य निषेध्यप्रसक्त्यर्थं 'यजतिषु येयजामह'मित्यस्यापेक्षत्वान्न निरपेक्षत्वम् । यहां पर यह शंका उठती है कि जैसे 'पदे जुहोति' इस विशेष शास्त्रसे 'आह- वनीये जुहोति' इस सामान्यशास्त्रका बाध होता है उसी तरह 'यजतिषु येयजामहं करोति' इस सामान्यशास्त्रका 'नानुयाजेषु' इस विशेष शास्त्रसे बाध होना चाहिये । उसका समाधान करते हैं कि— परस्पर निरपेक्ष शास्त्रोंमें बाध्यबाधकभाव होता है । 'पदे जुहोति' इस शास्त्रमें स्वार्थविधानके लिये 'आहवनीय शास्त्रकी अपेक्षा नहीं है । अतः पदशास्त्रसे आहवनीयशास्त्रका बाध होता है । प्रकृतमें तो निषेधशास्त्रको निषेध्य (जिसका निषेध करेगा) प्राप्तिके लिए 'यजतिषु येयजामहं करोति' इस शास्त्रकी अपेक्षा होती है अतः उपजीव्यविरोधके भयसे प्रकृतमें बाध्यबाधकभाव नहीं होगा । बाधायोगोपसंहारः । तस्माच्छास्त्रविहितस्य शास्त्रान्तरेण प्रतिषेधे विकल्प एव । स च न-