भारतकोश
अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary

लौगाक्षि भास्कर द्वारा

DevanagariHindipublished84 पृष्ठ

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७२ : अर्थसंग्रहः - गृह्णाति' इस विशेष शास्त्रसे विकल्प होनेपर भी निषेधका ही ग्रहण होता है क्योंकि यहां पर्युदासका संभव नहीं है। नञर्थके दो भेद हैं-निषेध और पर्युदास । जहां प्रत्ययार्थके साथ अन्वय रहेगा वहां निषेध अर्थ जाना जाता है। और उत्तर पदार्थके साथ अन्वय रहनेपर पर्युदास अर्थ जाना जाता है। तथा हि—यद्यत्र षोडशिपदार्थेन नञोऽन्वयस्तदातिरात्रे षोडशिव्य- तिरिक्तं गृह्णातीति वाक्यार्थबोधः स्यात्, स च न संभवति, अतिरात्रे षोडशिनं गृह्णातीति प्रत्यक्षविधिविरोधात् । यदि चातिरात्रेण पदार्थेना- न्वयस्तदातिरात्रव्यतिरिक्ते षोडशिनं गृह्णातीति वाक्यार्थबोधः स्यात्, सोऽपि न संभवति तद्विधिविरोधात् । अतोऽत्रानन्यगत्या शास्त्रप्राप्तषोडशि- ग्रहणस्यैव निषेधः । न च विकल्पप्रसक्तिस्तस्याप्यपेक्षणीयत्वात् । 'नातिरात्रे षोडशिनं गृह्णाति' यहां पर्युदासका संभव नहीं है क्योंकि यदि 'नातिरात्रे' यहां पर षोडशि पदार्थके साथ नञर्थका अन्वय करेंगे तो 'अतिरात्र में षोडशिभिन्नका ग्रहण करे' यह वाक्यार्थ बोध होगा; परन्तु यह बोध संभव नहीं है क्योंकि 'अतिरात्रे षोडशिनं गृह्णाति' इस प्रत्यक्ष विधिसे विरोध लगेगा । यदि अतिरात्र पदार्थके साथ नञर्थका अन्वय करेंगे तो 'अतिरात्रभिन्नमें षोडशि ग्रहण करे' यह वाक्यार्थ बोध होगा लेकिन ये सभी संभव नहीं हैं क्योंकि 'अति रात्रे षोडशिनं गृह्णाति' इसी प्रत्यक्ष विधिसे विरोध होगा । अतः यहांपर पर्युदा- सका आश्रयण असंभव है अतः सामान्यशास्त्र प्राप्त षोडशी ग्रहणका पाक्षिक प्रतिषेध होता है । इसलिए विकल्पापत्ति दोष नहीं दे सकते हैं क्योंकि विकल्प यहां इष्ट ही है। विकल्पे प्रतिषिध्यमानस्याऽनर्थहेतुत्वाभाववर्णनम् । इयांस्तु विशेषो यद्विकल्पादकप्रतिषेधेऽपि प्रतिषिध्यमानस्य नानर्थ- हेतुत्वम्, विधिनिषेधोभयस्यापि क्रत्वर्थत्वात् । यत्र तु न विकल्पः, प्राप्तिश्च रागत एव, प्रतिषेधश्च पुरुषार्थः तत्र प्रतिषिध्यमानस्यानर्थहेतुत्वम्, यथा 'न कलञ्जं भक्षये'दित्यादौ कलञ्जभक्षणादेः, तत्र भक्षणनिषेधस्यैव पुरुषार्थत्वात् । यहां यह शंका होती है कि यदि 'नातिरात्रे' यहां विकल्प प्रसंग होनेपर भी षोडशि ग्रहणका प्रतिषेध करते हैं तो जैसे कलञ्ज भक्षण अनर्थका कारण है उसी तरह षोडशि ग्रहण भी अनर्थका कारण होगा । क्योंकि प्रतिषिध्यमान