अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)
Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary
लौगाक्षि भास्कर द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअनर्थका कारण होता है । इसका समाधान करते हैं-यहां यही एक विशेषता है कि विकल्प होनेसे एकका प्रतिषेध होने पर भी प्रतिषिध्यमान षोडशि ग्रहण विहित होनेसे अनर्थका कारण नहीं होता है क्योंकि यहां विधि और निषेध दोनों ही क्रत्वर्थ हैं । जहां विकल्प विधायक कोई वचन नहीं है किन्तु विधि रागसे ही प्राप्त है और निषेध पुरुषार्थ है वहां पर प्रतिषिध्यमान पदार्थ अनर्थ का कारण होता है, जैसे 'न कलञ्जं भक्षयेत्' इत्यादि स्थलमें कलञ्ज भक्षण रागतः प्राप्त है और भक्षणका निषेध पुरुषार्थ है । अतः कलञ्जभक्षण अनर्थका कारण होता है । न च 'दीक्षितो न ददाति न जुहोती'त्यादौ शास्त्रप्राप्तदानहोमादीनां निषेधाद्विकल्पापत्तिरिति वाच्यम् । स्वतःपुरुषार्थभूतदानहोमादीनां निषे- धस्य पुरुषार्थत्वाभावेऽपि निषिध्यमानस्थानर्थहेतुत्वात्, यथा क्रतौ स्व- स्त्रीगमनादेः, तन्निषेधस्य क्रत्वर्थत्वेन तस्य क्रतुवैगुण्यसंपादकत्वात् । यहां पर प्रश्न होता है कि 'दीक्षितो न ददाति न जुहोति' इस स्थानमें यदि शास्त्र प्राप्त दान-होमादिका निषेध किया जाता है तो षोडशि ग्रहणके समान विकल्प होना चाहिये । इसका उत्तर कहते हैं कि 'षोडशि'ग्रहणकी विधि और प्रति- षेध दोनों ही क्रत्वर्थ हैं इसलिए विकल्प होता है । किन्तु दान-होमादि पुरुषार्थ है और उसका निषेध क्रत्वर्थ है इसलिए विकल्प नहीं होगा । जैसे क्रतुमें स्त्री गमनका निषेध होनेसे पुरुषार्थभूत स्वस्त्रीगमन क्रतुमें अनर्थका कारण होता है उसी तरह निषेध को पुरुषार्थ न होने पर भी निषिध्यमान दान-होम दीक्षितोंके लिए यज्ञमें अनर्थकारक है अर्थात् जैसे क्रतुमें स्वस्त्रीगमन, कलञ्ज-भक्षणादि के समान नरक साधन न होने पर भी क्रतुवैगुण्य सम्पादन द्वारा अनर्थ कारण होता है । वैसे ही दान-होमादि भी यज्ञमें अनर्थ साधन होता है । इसलिए निषेध वाक्य अनर्थ हेतु क्रिया की निवृत्ति द्वारा ही पुरुषार्थ साधक होते हैं । अर्थवादमीमांसा । प्राशस्त्यनिन्दान्यतरपरं वाक्यमर्थवादः । तस्य च लक्षणया प्रयोजन- वदर्थपर्यवसानम् । तथा हि-अर्थवादवाक्यं हि स्वार्थप्रतिपादने प्रयोजना- भावाद्धिधेयनिषेध्ययोः प्राशस्त्यनिन्दितत्वे लक्षणया प्रतिपादयति । स्वाथ- मात्रपरत्वे आनर्थक्यप्रसङ्गात् । आम्नायस्य हि क्रियार्थत्वात् । न चेष्टा- पत्तिः । 'स्वाध्यायोऽध्येतव्यः' इत्यध्ययनविधिना सकलवेदाध्ययनं कर्त्तव्य-