भारतकोश
आर्यभटीयम् (आचार्य आर्यभट - परमेश्वर टीका एवं हिन्दी अनुवाद)

आर्यभटीयम् (आचार्य आर्यभट - परमेश्वर टीका एवं हिन्दी अनुवाद)

Aryabhatiya of Aryabhata with Hindi Commentary

आचार्य आर्यभट (४७६ ई.) / पं. उदयनारायण सिंह द्वारा

DevanagariSanskritpublished134 पृष्ठ

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७६ गीतिकापादः ॥ पर लङ्का है। जल स्थान से अर्थात बड़वा मुख स्थान से चतुर्थ भाग अन्तराल में लङ्का है। लङ्कां की नाई सिद्धपुर, यवकोटी और रोमक भी भूकक्षा के चतुर्थ भाग अन्तराल में है। लङ्का के समान उत्तरदिशा में भूकक्षा के चतुर्थ अंश के चौथे भाग में अर्थात् १६ अंश पर उज्जायिनी नगरी है ॥ १४ ॥ भूव्यासार्धेनोनं दृश्यं देशात्समाद्भगोलार्धम् । अर्धं भूमिच्छन्नं भूव्यासार्धाधिकञ्चैव ॥१५॥ समाद्देशात् पर्वतादिव्यवधानरहिताद्भू पृष्ठाद्भगोलार्धं ज्योतिश्चक्रस्योपर्यर्धं भूव्यासार्धेनोनं भूव्यासार्धतुल्यांशहीनं दृश्यं भवति। अपरमर्धं भूव्यासार्धेना- धिकं भूमिच्छन्नमदृश्यं भवति। एतदुक्तं भवति । ज्योतिश्चक्रस्य यदूर्ध्वार्धं तस्य पूर्वभागे भूव्यासार्धतुल्योंऽशोऽस्माभिरदृश्यो भवति भूपृष्ठव्यवधानात्। तथा प- श्चिमभागेऽपि भूव्यासार्धतुल्यांशोऽस्माभिरदृश्यो भवांत। अतस्ताभ्यामंशाभ्यां हीनमुपर्यर्धं समदेशे भूपृष्ठेऽवस्थितैर्दृश्यं भवति । अपरमर्धं ताभ्यामंशाभ्यां युतं भूमिच्छन्नत्वात् समदेशे भूपृष्ठेऽवस्थितैरदृश्यं भवति ॥ ज्योतिश्चक्रे देवासुर दृश्य- भागमाह । भा०:-सम देश से अर्थात् पर्वत आदि से व्यवधान रहित भूपृष्ठ से भगोलार्ध ज्योतिश्चक्र के ऊपर का आधा-भूव्यासार्द्ध से ऊन-अर्थात् भूव्यासार्द्ध तुल्यांश हीन दृश्य होता है। दूसरा आधा भूव्यासार्द्ध से अधिक भूमिच्छन्न-अदृश्य होता है। आशय यह है कि भूपृष्ठ के व्यवधान से ज्योतिश्चक्र का जो ऊर्ध्व अर्द्ध भाग है उस के पूर्व भाग में भूव्यासार्द्ध तुल्यांश हम लोगों से अदृश्य होता है। तथा पश्चिमभाग में भूव्यासार्द्ध तुल्यअंश हम लोगों से अदृश्य होता है। इस कारण उन अंशों से हीन ऊपर नीचे देश में भूपृष्ठ में अव स्थित पुरुष से दृश्य होता है। दूसरा अर्द्ध उन अंशों से युक्त भूमि से छिपे होने से समदेश में भूपृष्ठ पर अवस्थित पुरुष से अदृश्य होता है ॥ १५॥ देवाः पश्यन्ति भगोलार्धमुद्ङ्मेरुसंस्थितास्सव्यम् । अपसव्यगं तथार्धं दक्षिणबडवामुखे प्रेताः ॥१६॥ उद्ङ्गतमेरुसंस्थिता देवास्सव्यं भगोलार्थं ज्योतिश्चक्राभिमुखस्य लङ्काराज्य- स्य पुरुषस्य सव्यभागतं पश्यन्ति । उद्ङ्गतमर्धमित्यर्थः । दक्षिणभागतबड- वामुखे स्थिताः प्रेता नरकवासिनोऽपसव्यगं दक्षिणभाग्गतमर्धं पश्यन्ति ।