आर्यभटीयम् (आचार्य आर्यभट - परमेश्वर टीका एवं हिन्दी अनुवाद)
Aryabhatiya of Aryabhata with Hindi Commentary
आचार्य आर्यभट (४७६ ई.) / पं. उदयनारायण सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९८ गीतिकापादः ॥ ङति ॥ शशिगाःशशिमण्डलोर्ध्वभागगता पितरश्शशिमासस्य चान्द्रमास- स्यार्धं रविं पश्यन्ति । शशिमासस्यापरार्धं न पश्यन्ति। अतः पितॄणां चान्द्रमा- सार्धं दिनं भवति । तदर्धं रात्रिश्च । अमावास्यायां हि चन्द्रमण्डलादूर्ध्वगतो ऽर्को भवति । अतस्तदानीं पितॄणां दिनार्धं भवति । पौर्णमास्यां चन्द्रमण्ड- लादधोगतोऽर्कः । अतस्तदा पितॄणां रात्र्यर्धं भवति । अष्टम्यर्थयोरुदयास्त- मयौ च । कुदिनार्धमिह मनुजाः । मानुजास्तावन्दिनस्यार्धं रविं पश्यन्ति । अपरमर्धं न पश्यन्ति । गोलकल्पनामार्याद्वयेनाह । भा०:--मेष, वृष, मिथुन, कर्कट, सिंह, कन्या, इन छः मास पर्य्यन्त देव गण सदा सूर्य्य को उदित देखते हैं, इस कारण देवताओं का छः मास का एक दिन होता है। और तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ, मीन, इन छः मास पर्य्यन्त देवगण सूर्य्य को नहीं देखते अतएव इन छः मास की उनकी एक रात्रि होती है । और प्रेत या असुरगण तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ, मीन, इन छः मास पर्य्यन्त सूर्य्य को सदैव उदित देखते इस लिये असुरों को छः मास का एक दिन होता है। एवं मेष, वृष, मिथुन, कर्कट, सिंह, कन्या, इन छः मास पर्य्यन्त असुरगण सूर्य्य को नहीं देखते इस कारण इतने समय इनकी छः मास की एक रात्रि होती है । और पितृगण ( चन्द्रलोकनिवासी ) चान्द्र मास के आधे भाग पर्य्यन्त सूर्य्य को देखते हैं अतएव इनका हमारे १५ दिन का एक दिन होता एवं इतने ही (१५) की उनकी एक रात्रि होती है। क्यों कि अमावास्या को चन्द्रमण्डल के उपरले भाग में सूर्य्य दीख पड़ता इस का- रण पितृगण को उस समय मध्यान्ह होता है और पौर्णमासी को चन्द्रमण्डल से नीचे सूर्य्य रहता अतएव इस समय पितृगण की आधीरात होती है । और कृष्णपक्ष के अष्टमी को पितृ लोगों का सूर्य्योदय और शुक्लपक्ष की अष्टमी को सूर्य्यास्त होता है । मनुष्यों को सावन दिन के आधा भाग पर्य्यन्त सूर्य्य दीखता एवं अपरार्द्ध नहीं दीखता ॥ १७॥ पूर्वापरमधऊर्ध्वं मण्डलमथ दक्षिणोत्तरञ्चैव । क्षितिजं समपार्श्वस्थं भानां यत्रोदयास्तमयौ ॥ १८ ॥ वंशशलाकादिना निर्मितमेकं मण्डलं वृत्तं पूर्वापरमधऊर्ध्वं निदध्यात् । तत् सममण्डलं नाम भवति । तत्प्रमाणमेवापरं मण्डलं दक्षिणोत्तरमधऊर्ध्वं निदध्यात् । तद्दक्षिणोत्तराख्यं भवति । पुनरन्यन्मण्डलं तत्प्रमाणं समपार्श्वस्थं