भारतकोश
आर्यभटीयम् (आचार्य आर्यभट - परमेश्वर टीका एवं हिन्दी अनुवाद)

आर्यभटीयम् (आचार्य आर्यभट - परमेश्वर टीका एवं हिन्दी अनुवाद)

Aryabhatiya of Aryabhata with Hindi Commentary

आचार्य आर्यभट (४७६ ई.) / पं. उदयनारायण सिंह द्वारा

DevanagariSanskritpublished134 पृष्ठ

पृष्ठ 125, कुल 134 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 125

आर्य्यभटीये- ८९ भा०:--दृग् हेतुभूत अपनी छाया या दृग्ज्या या दृक् क्षेपज्या है। वह यदि क्षितिज में आकाश मध्य से क्षितिज के अन्त तक होती है। अर्थात् व्यासार्द्ध तुल्य होती है, तब भूमि वशतः निष्पन्न (उत्पन्न) दृग्भेद व्यासार्द्ध होता है। अर्थात् भूव्यासार्द्ध तुल्य दृग्भेद योजन होता है। बीज में त्रैराशिक से कल्पना करे। अतएव दृग्गतिज्या को भूव्यासार्द्ध द्वारा गुणन कर त्रिज्या से भाग देवे भागफल दृग्भेद योजन होता है। ग्रहण में वह लम्बन होता है। दृक्क्षेपज्या को भूव्यासार्द्ध से गुणन कर त्रिज्या से भाग देवे भागफल ग्रहण में नतियोजन होता है। दृग्ज्या से इस प्रकार लब्ध दृङ्मण्डल गत कर्णरूप ल- म्बन योजन होता है। इस के द्वारा ग्रहण में व्यवहार नहीं किया जाता ॥३४॥ विक्षेपगुणाक्षज्या लम्बकभक्ता भवेदृणमुदक्स्थे। उदये धनमस्तमये दक्षिणगे धनमृणं चन्द्रे ॥ ३५ ॥ विक्षेपगुणिताक्षज्या लम्बकभाजिता लिप्तात्मकं दृक्फलं भवति । उदक्स्थे । अपमण्डलादुदक्स्थे चन्द्रे । उदये ऋणम् । उत्तरविक्षेप उदयविषये तदृक्फलं चन्द्रे ऋणं कार्यमित्यर्थः । अस्तमयविषये तत्फलं चन्द्रे धनं कुर्यात् । दक्षिणगे धनमृणं चन्द्रे । दक्षिणविक्षेप उदयविषये तत्फलं चन्द्रे धनं कार्यम् । तत्काल- चन्द्रे एतत् क्रियते । एतदाक्षं दृक्कर्म ॥ आयनं दृक्कर्मोह । भा०:--विक्षेप गुणित अक्षज्या लम्बक से भाग देने पर भागफल लिप्तात्मक दृक्फल होता है। अपमण्डल से उदक्स्थ चन्द्रमा में, उदय में ऋण करना अ- र्थात् उत्तर विक्षेप में उदय विषय में उस दृक्फल चन्द्रमा में ऋण करना चाहिये। अस्तमय विषय में उस फल को चन्द्रमा में धन करे। दक्षिण वि- क्षेप उदय विषय में उस फल को चन्द्रमा में धन करे। इस को आक्षदृक् कर्म कहते हैं ॥ ३५ ॥ विक्षेपापक्रमगुणमुत्क्रमणं विस्तारार्धकृतिभक्तम्। उदग्ऋणधनमुद्गयने दक्षिणगे धनमृणं याम्ये॥ ३६॥ उत्क्रमणं विक्षेपापक्रमगुणम् । सायनचन्द्रस्योत्क्रमणं कोट्या उत्क्रमज्ये- त्यर्थः । तद्विक्षेपेण . परमापक्रमेण च निहत्य विस्तारार्धस्य व्यासार्धस्य कृत्या विभजेत् । तत्र लब्धं लिप्तात्मकदृक्फलं भवति ॥ उदगृणधनमुद्गयने दक्षिणगे । उदगयन उदग्विक्षेपे तत्फलं चन्द्रे ऋणं भवति । तत्र दक्षिणगे विक्षेपे तत्फलं चन्द्रे धनं भवति । उदग्दक्षिणगे च क्रमादृणम् । इति योज्यम् ॥ धनमृणं याम्ये । १२

आर्यभटीयम् (आचार्य आर्यभट - परमेश्वर टीका एवं हिन्दी अनुवाद) · पृष्ठ 125, कुल 134 में से · BharatKosha