आर्यभटीयम् (आचार्य आर्यभट - परमेश्वर टीका एवं हिन्दी अनुवाद)
Aryabhatiya of Aryabhata with Hindi Commentary
आचार्य आर्यभट (४७६ ई.) / पं. उदयनारायण सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआर्य्यभटीये- ८९ भा०:—लम्बन संस्कृत अमावास्या काल में अल्पविक्षेप चन्द्रमा जब सूर्य्य मण्डल में प्रवेश करता है, तब न्यूनतर ग्रहणमध्य होता है । अर्थात् अधिक काल एवं अल्पकाल का चन्द्रग्रहण मध्य होता है । पौर्णमासी को जब चन्द्र- मा, भूच्छाया में प्रवेश करता है, तब चन्द्रग्रहण का मध्य होता है ॥ ३८ ॥ भूरविविवरं विभजेद्भूगुणितन्तु रविभूविशेषेण । भूच्छायादीर्घत्वं लब्धं भूगोलविष्कम्भात् ॥ ३९ ॥ भूरविविवरमर्कस्य स्फुटयोजनतुल्यं तद्भूगुणितं भूव्यासयोजनगुणितं कृत्वा रविभूविशेषेण रविव्यासयोरन्तरेण योजनात्मकेन, विभजेत् । तत्र लब्धं भूच्छा- याया दैर्घ्यं योजनात्मकं भवति । भूगोलविष्कम्भात् भूव्यासाधत् । भूगोलस्य मध्यात्प्रभृतीदं छायादैर्घ्यं भवतीत्यर्थः ॥ भच्छायायाश्चन्द्रकक्ष्याप्रदेशे व्यासो- जनानयनमाह । भा०:—पृथिवी और सूर्य्य का स्फुट योजन तुल्य भूव्यास योजन गुणित सूर्य्यव्यास और भूव्यास के योजनात्मक अन्तर से भाग देवे, भागफल भूच्छाया की चौड़ाई योजनात्मक होती है । पृथिवी के व्यासार्द्ध से अर्थात् भूगोल के मध्य प्रभृति से यह छाया दैर्घ्य होती है ॥ ३९ ॥ छायाग्रचन्द्रविवरं भूविष्कम्भेन तत् समभ्यस्तम् । भूच्छायया विभक्तं विद्यात्तमसस्स्वविष्कम्भम् ॥ ४० ॥ छायाग्रचन्द्रविवरं चन्द्रस्य स्फुटयोजनकर्णेन हीनं छायादैर्घ्यमित्यर्थः । तद्भूव्यासेन निहत्य भूच्छायादैर्घ्येण विभजेत् । अत्र लब्धं चन्द्रमार्गे तमसो भू- च्छायायास्स्वविष्कम्भो योजनात्मकव्यासो भवति । तं व्यासं त्रिज्याकर्णेन वि- भजेत् । तत्र लब्धं लिप्तात्मकस्तमोव्यासो भवति । अर्केन्द्रोश्च स्वयोजनव्यासं त्रिज्याकर्णेन निहत्य स्वस्फुटयोजनकर्णेन विभज्य लब्धं लिप्तात्मकस्वव्यासो भवति ॥ स्थित्यर्द्धानयनमाह । भा०:—चन्द्रमा के स्फुट योजन से कर्ण घटाकर अर्थात् छाया के लम्बाई को भूव्यास से गुणन कर गुणनफल में भूछाया के लम्बाई से भाग देवे; भागफल चन्द्रमा के मार्ग में तम (अन्धकार) अर्थात् भूछाया का स्वकीय विष्कम्भ अर्थात् यो- ज्ञनात्मक व्यास होगा । उस व्यास को त्रिज्या कर्ण द्वारा भाग देवे, भागफल लिप्तात्मक तमोव्यास होगा । सूर्य्य और चन्द्रमा के अपने २ योजन व्यास को