भारतकोश
आर्यभटीयम् (आचार्य आर्यभट - परमेश्वर टीका एवं हिन्दी अनुवाद)

आर्यभटीयम् (आचार्य आर्यभट - परमेश्वर टीका एवं हिन्दी अनुवाद)

Aryabhatiya of Aryabhata with Hindi Commentary

आचार्य आर्यभट (४७६ ई.) / पं. उदयनारायण सिंह द्वारा

DevanagariSanskritpublished134 पृष्ठ

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९४ गीतिकापादः ॥ तस्य विक्षेपव्यत्ययात् स्पर्शे मोक्षे च दिग्भवति। अर्कैन्द्वोस्त्रिराशिसहितायनात् अयनशब्देनापक्रम उच्यते। त्रिराशिसहितादर्काच्चन्द्राच्च निष्पन्नोऽपक्रमोऽपि तयोरर्केन्द्वोर्वलनं भवति । स्पर्शे। इति ग्रहणे । इत्येवार्थतः। एतद्वायनावलनम् अस्य दिक्षु बिम्बस्य मुखेऽयनवद्भवति । चन्द्रस्य स्पर्शेऽयनवत् मोक्षेऽयनव्यत्य यात्। चन्द्राद्व्यत्ययेन सूर्यायनवलनं दिग्भवति । अक्षावलनायनचापयोस्तुल्य दिशोर्योगं कृत्वा भिन्नदिशोरन्तरं कृत्वा जीवामादाय सम्पर्कार्धेन निहत्य त्रि- ज्यया विभज्य लब्धे विक्षेपं संस्कुर्यात् । तत् स्फुटवलनं भवति । गृहीतबिम्ब- स्थानवर्णानाह । भा०:—( मध्यान्ह से क्रम गुणित अक्षाद्धं विस्तरहृत । नतज्या द्वारा गुणित अक्षज्या से त्रिज्या द्वारा भागदेकर भागफल चाप परिमाणा दिक् होगी) दक्षिण से मध्यान्ह में ( पूर्वकाल में) दक्षिण वलन होता है। अर्थात पूर्व कपाल में सूर्य के स्पर्श में दक्षिण वलन होता है। पश्चिम कपाल में उत्तर वलन होता है। चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण में सर्वत्र उलटा होता है। स्थित्यर्द्ध शब्द से उस का मूलभूत विक्षेप कहा जाता और सूर्य की स्फुट नति वलन होता है। और स्पर्श और मोक्ष में उसके नति तुल्य होता है । चन्द्रग्रहण में चन्द्रविक्षेप वलन होता है । उस के विक्षेप के व्यतिक्रम ( उलटा ) से स्पर्श और मोक्ष में दिशा होती है। अयन शब्द से अपक्रम कहा जाता है। तीन राशि सहित सूर्य और चन्द्रमा से निष्पन्न अपक्रम भी सूर्य और चन्द्रमा का वलन होता है। ग्रहण में यह आयनवलन होता है। इस की दिशा तो बिम्ब के मुख में अ- यन के तुल्य होगी। चन्द्र ग्रहण के स्पर्श में अयन तुल्य होगा। मोक्ष में अ- यन के विपर्य्यय-से चन्द्रमा से व्यतिक्रम द्वारा सूर्य आयन वलन होता है। आक्ष वलन के दोनों चाप के तुल्य दिशा का योग कर और यदि भिन्न होतो अन्तर कर चाप लेकर सम्पर्कार्द्ध से गुणन कर त्रिज्या से भाग देवे, भागफल में विक्षेप संस्कार करे तो वह स्फुट वलन होगा ॥ ४५ ॥ प्रग्रहणान्ते धूम्रः खण्डग्रहणे शशी भवति कृष्णः। सर्वग्रासे कपिलस्स कृष्णताम्रस्तमोमध्ये ॥ ४६ ॥ प्रग्रहणे प्रारम्भे । अन्ते मोक्षे समाप्तौ च । चन्द्रो धूम्रो भवति । खण्डग्र- हणेऽर्द्धबिम्बे गृहीतप्राये कृष्णवर्णः। सर्वग्रासे विमर्दे जाते सति कपिलः । सर्व- ग्रहणेऽपि तमोमध्यं प्रविशति सति कृष्णताम्र (वर्णद्वयशी भवति) । चन्द्र- वदर्कस्यापि वर्ण इति प्रकाशिकायामुक्तम् ॥ सूर्य्यग्रहणेऽदृश्यभागमाह ।