आर्यभटीयम् (आचार्य आर्यभट - परमेश्वर टीका एवं हिन्दी अनुवाद)
Aryabhatiya of Aryabhata with Hindi Commentary
आचार्य आर्यभट (४७६ ई.) / पं. उदयनारायण सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका ॥ २३ सिद्धान्तज्योतिषग्रन्थ ॥ भारतवासियो ! आप वेद और धर्मशास्त्र अध्ययन करते हैं, कोई वेद और धर्मशास्त्र अध्ययनार्थ तैयार हैं; परन्तु आप जानते हैं ! यह क्या लिखा है- “द्वे विद्ये वेदितव्यं इति हस्म यद्ब्रह्म विदोवदन्ति पराचैवा पराच । तत्रापरा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेदः शिक्षाकल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दो ज्यौतिषमिति” ॥ मुण्डक उ० १ । १ । ४, ५ ॥ अर्थात्-विद्या दो प्रकार की है, एक परा दूसरी अपरा । इन में ऋग्वेद यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त एवं ज्योतिष अपरा विद्या है। और जिस विद्या से अक्षर ब्रह्म का ज्ञान हो उसे परा विद्या कहते। इन में से शिक्षा आदि वेदरूपी पुरुष के छः अङ्ग स्वरूप हैं जैसा कि कहा है- “शब्द शास्त्रं मुखं ज्यौतिषं चक्षुषी, श्रोत्रमुक्तं निरुक्तञ्च कल्पः करौ । या तु शिक्षाऽस्य वेदस्य सा नासिका, पादपद्मद्वयं छन्द आदिर्बुधैः” ॥१०॥ अर्थात्-वेदरूपी पुरुष के व्याकरण तो मुख, ज्योतिष नेत्र, शिक्षा नासिका, कल्प दोनों हाथ और छन्दः (शास्त्र) पैर हैं। क्या विना नेत्र के वेद पुरुष को अन्धे रक्खेंगे एवं आप भी नेत्र हीन हो वेद के ज्योतिष सम्बन्धि गूढ़ मर्म का ऊटपटाङ्ग अश्लील अर्थ कर आर्यों का प्राचीन गौरव नष्ट करेंगे ? ज्योतिष शास्त्र कहने से-यह न समझ लीजिये कि केवल फलित के ग्रन्थों ही को ज्योतिष कहते किन्तु संहिता, जातक आदि और सिद्धान्त मिल कर ज्योतिष कहाता है। यह बात हम ही नहीं कहते किन्तु जगत् विख्यात पं० बापूदेव शास्त्री जी की वक्तृता हमारे सू०सि० की भूमिकामें पढ़ लीजिये । और महामहोपाध्याय पं० सुधाकर द्विवेदी जी अपने “ गणक तरङ्गिणी ” नामक ग्रन्थ में जिस में सिद्धान्त ज्योतिषियों का इतिहास लिखा है। लिखते हैं कि- “ आधुनिका ज्योतिर्विदः फलमात्रैकवेदिनः ” व्याकरण शास्त्र मज्ञात्वैव लघुपाराशरीबालबोधशीघ्रबोधमुहूर्त्तचिन्ता- मणानीलकण्ठीवृहज्जातकजैमिनिसूत्राणामेकदेशेन मत्ता आत्मानं कृत कृत्यं- ज्योतिषशास्त्रपारङ्गतमन्यन्ते। तत्र साहसिनो मकरन्दादिरचित सारण्यनुसारेण तिष्याद्युपपत्तिं विनैवाऽऽधारसारणी च वस्तुतः शुद्धा वा नेति सर्वमबुद्ध्वैव तिथिपत्रं विरचय्या ऽऽत्मप्रसिद्धिं कुर्वन्ति” । गणकतरङ्गिण्याम्” पृ० १३२ ॥ अर्थात्-आज कल प्रायः लोग, थोड़े से छोटे २ फलित ज्योतिष के ग्रन्थ शीघ्र बोध, मुहूर्त्तचिन्तामणि आदि पढ़ २ कर आपे को ज्योतिषी मान बैठते और