भारतकोश
आर्यभटीयम् (आचार्य आर्यभट - परमेश्वर टीका एवं हिन्दी अनुवाद)

आर्यभटीयम् (आचार्य आर्यभट - परमेश्वर टीका एवं हिन्दी अनुवाद)

Aryabhatiya of Aryabhata with Hindi Commentary

आचार्य आर्यभट (४७६ ई.) / पं. उदयनारायण सिंह द्वारा

DevanagariSanskritpublished134 पृष्ठ

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२२ आर्य्यभटीयम्- पय दो २ अर्थवाले शब्दों का भी प्रयोग किया है। वेद और वेदाङ्ग ज्योतिष- शास्त्र के पाठ और ज्योतिषशास्त्र के अनुशीलन में और ज्योतिषक मण्डल के पर्यवेक्षण (Observation) से भारतीय आर्य्यजाति विमुख हो, महर्षि- प्रणीत पुराणस्थ इन सब दो अर्थ वाले शब्दों के प्रकृत अर्थ ग्रहण में असम- र्थ हो गयी, और महर्षिगण पूजित आदित्य देव में अधिष्ठित परम पुरुष प्रकृतदेव श्रीहरि को भूल कर आर्य्यजाति अन्धे की नाई अपने गन्तव्य मार्ग को भूल कर इधर उधर भटकती फिरती है। क्या आश्चर्य है! क्या आश्चर्य है! क्या भयावह विधाट भारत में उपस्थित हुआ है! षडङ्ग को छोड़ कर कौन पण्डित वेद का अर्थ कर सकता? गोलरूप ग्रह-नक्षत्र की गति विधि छोड़ कर, कौन सुशिक्षित सुधीजन पुराण की व्याख्या कर सकते? इस भ्रम प्रमाद में फसकर भारत माता के हृदय के अरविन्द मुख मणि श्रीकृष्ण में भक्ति स्थापन करने से पराङ्मुख होकर, भौतिक कृष्ण के पदाश्रय ले रहे हैं। कोई तो नवद्वीप में मानव-ईश्वर स्थापन में भूरि यत्नतः ललायित हो रहे हैं। आर्यगण! एकवार आलस्य छोड़ कर नक्षत्र, चन्द्र, सूर्य, ग्रहों की गति परीक्षा करो तो वेदोक्त श्रीकृष्ण (श्रीविष्णु) के चरित्र की निर्मलता हृदयङ्गम कर सकोगे। खेड़-हारा हो कर आर्य्यजाति को निर्याक निरुत्तरभाव से अवन- त मस्तक में, देश २ में, विदेश में, नगर नगर में, गांव २ में, गली २ में, मार्ग में, घाट २ पर, श्रीकृष्णकी कलङ्क रटना और व्यङ्गोक्ति नहीं सुननी पड़ेगी। इसी खेद से हम लोगों ने आज पुराण के रूपक जाल को फाड़ने में हाथ डाला है। नहीं तो ऐसी मनोरम अपूर्व मरीचिका के ध्वंस करने में किस की प्रवृत्ति हो सकती? अब इस के आगे सिद्धान्त ज्योतिष तथा आर्यभटीय के विषय संक्षिप्त विचार किया जावेगा और अन्यान्य पुराणोक्त वा ब्राह्म- णोक्त उपाख्यानों का वर्णन-सिद्धान्त शिरोमणि के अनुवाद की भूमिका में लिखा जावेगा।