आर्यभटीयम् (आचार्य आर्यभट - परमेश्वर टीका एवं हिन्दी अनुवाद)
Aryabhatiya of Aryabhata with Hindi Commentary
आचार्य आर्यभट (४७६ ई.) / पं. उदयनारायण सिंह द्वारा
२२ आर्य्यभटीयम्- पय दो २ अर्थवाले शब्दों का भी प्रयोग किया है। वेद और वेदाङ्ग ज्योतिष- शास्त्र के पाठ और ज्योतिषशास्त्र के अनुशीलन में और ज्योतिषक मण्डल के पर्यवेक्षण (Observation) से भारतीय आर्य्यजाति विमुख हो, महर्षि- प्रणीत पुराणस्थ इन सब दो अर्थ वाले शब्दों के प्रकृत अर्थ ग्रहण में असम- र्थ हो गयी, और महर्षिगण पूजित आदित्य देव में अधिष्ठित परम पुरुष प्रकृतदेव श्रीहरि को भूल कर आर्य्यजाति अन्धे की नाई अपने गन्तव्य मार्ग को भूल कर इधर उधर भटकती फिरती है। क्या आश्चर्य है! क्या आश्चर्य है! क्या भयावह विधाट भारत में उपस्थित हुआ है! षडङ्ग को छोड़ कर कौन पण्डित वेद का अर्थ कर सकता? गोलरूप ग्रह-नक्षत्र की गति विधि छोड़ कर, कौन सुशिक्षित सुधीजन पुराण की व्याख्या कर सकते? इस भ्रम प्रमाद में फसकर भारत माता के हृदय के अरविन्द मुख मणि श्रीकृष्ण में भक्ति स्थापन करने से पराङ्मुख होकर, भौतिक कृष्ण के पदाश्रय ले रहे हैं। कोई तो नवद्वीप में मानव-ईश्वर स्थापन में भूरि यत्नतः ललायित हो रहे हैं। आर्यगण! एकवार आलस्य छोड़ कर नक्षत्र, चन्द्र, सूर्य, ग्रहों की गति परीक्षा करो तो वेदोक्त श्रीकृष्ण (श्रीविष्णु) के चरित्र की निर्मलता हृदयङ्गम कर सकोगे। खेड़-हारा हो कर आर्य्यजाति को निर्याक निरुत्तरभाव से अवन- त मस्तक में, देश २ में, विदेश में, नगर नगर में, गांव २ में, गली २ में, मार्ग में, घाट २ पर, श्रीकृष्णकी कलङ्क रटना और व्यङ्गोक्ति नहीं सुननी पड़ेगी। इसी खेद से हम लोगों ने आज पुराण के रूपक जाल को फाड़ने में हाथ डाला है। नहीं तो ऐसी मनोरम अपूर्व मरीचिका के ध्वंस करने में किस की प्रवृत्ति हो सकती? अब इस के आगे सिद्धान्त ज्योतिष तथा आर्यभटीय के विषय संक्षिप्त विचार किया जावेगा और अन्यान्य पुराणोक्त वा ब्राह्म- णोक्त उपाख्यानों का वर्णन-सिद्धान्त शिरोमणि के अनुवाद की भूमिका में लिखा जावेगा।
भूमिका ॥ २३ सिद्धान्तज्योतिषग्रन्थ ॥ भारतवासियो ! आप वेद और धर्मशास्त्र अध्ययन करते हैं, कोई वेद और धर्मशास्त्र अध्ययनार्थ तैयार हैं; परन्तु आप जानते हैं ! यह क्या लिखा है- “द्वे विद्ये वेदितव्यं इति हस्म यद्ब्रह्म विदोवदन्ति पराचैवा पराच । तत्रापरा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेदः शिक्षाकल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दो ज्यौतिषमिति” ॥ मुण्डक उ० १ । १ । ४, ५ ॥ अर्थात्-विद्या दो प्रकार की है, एक परा दूसरी अपरा । इन में ऋग्वेद यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त एवं ज्योतिष अपरा विद्या है। और जिस विद्या से अक्षर ब्रह्म का ज्ञान हो उसे परा विद्या कहते। इन में से शिक्षा आदि वेदरूपी पुरुष के छः अङ्ग स्वरूप हैं जैसा कि कहा है- “शब्द शास्त्रं मुखं ज्यौतिषं चक्षुषी, श्रोत्रमुक्तं निरुक्तञ्च कल्पः करौ । या तु शिक्षाऽस्य वेदस्य सा नासिका, पादपद्मद्वयं छन्द आदिर्बुधैः” ॥१०॥ अर्थात्-वेदरूपी पुरुष के व्याकरण तो मुख, ज्योतिष नेत्र, शिक्षा नासिका, कल्प दोनों हाथ और छन्दः (शास्त्र) पैर हैं। क्या विना नेत्र के वेद पुरुष को अन्धे रक्खेंगे एवं आप भी नेत्र हीन हो वेद के ज्योतिष सम्बन्धि गूढ़ मर्म का ऊटपटाङ्ग अश्लील अर्थ कर आर्यों का प्राचीन गौरव नष्ट करेंगे ? ज्योतिष शास्त्र कहने से-यह न समझ लीजिये कि केवल फलित के ग्रन्थों ही को ज्योतिष कहते किन्तु संहिता, जातक आदि और सिद्धान्त मिल कर ज्योतिष कहाता है। यह बात हम ही नहीं कहते किन्तु जगत् विख्यात पं० बापूदेव शास्त्री जी की वक्तृता हमारे सू०सि० की भूमिकामें पढ़ लीजिये । और महामहोपाध्याय पं० सुधाकर द्विवेदी जी अपने “ गणक तरङ्गिणी ” नामक ग्रन्थ में जिस में सिद्धान्त ज्योतिषियों का इतिहास लिखा है। लिखते हैं कि- “ आधुनिका ज्योतिर्विदः फलमात्रैकवेदिनः ” व्याकरण शास्त्र मज्ञात्वैव लघुपाराशरीबालबोधशीघ्रबोधमुहूर्त्तचिन्ता- मणानीलकण्ठीवृहज्जातकजैमिनिसूत्राणामेकदेशेन मत्ता आत्मानं कृत कृत्यं- ज्योतिषशास्त्रपारङ्गतमन्यन्ते। तत्र साहसिनो मकरन्दादिरचित सारण्यनुसारेण तिष्याद्युपपत्तिं विनैवाऽऽधारसारणी च वस्तुतः शुद्धा वा नेति सर्वमबुद्ध्वैव तिथिपत्रं विरचय्या ऽऽत्मप्रसिद्धिं कुर्वन्ति” । गणकतरङ्गिण्याम्” पृ० १३२ ॥ अर्थात्-आज कल प्रायः लोग, थोड़े से छोटे २ फलित ज्योतिष के ग्रन्थ शीघ्र बोध, मुहूर्त्तचिन्तामणि आदि पढ़ २ कर आपे को ज्योतिषी मान बैठते और
२४ आर्य्यभटीयस्य- तिथिपत्र बना २ कर अपनी प्रसिद्धि करते हैं और वास्तविक ज्योतिष सिद्धान्त संहिता के ग्रन्थ नहीं पढ़ते इत्यादि । कतिपय ग्रन्थों में ज्योतिष शास्त्र के पांच भेद लिखे हैं जैसा कि- पञ्चस्कन्धमिदंशास्त्रं होरागणितसंहिता । केरलिशकुनश्चैव प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ प्रश्नरत्नटीकाकारः । अर्थात् ज्योतिषशास्त्र पांच प्रकार का है, १ होरा, २ गणित, ३ संहिता, ४ केरलि एवं ५ शकुन । इसी प्रकार पूर्वोक्त म० म० पं० सुधाकर जी ने उक्त ग्रन्थ के प्रारम्भ में लिखा है कि- "अस्ति सिद्धान्तहोरासंहितारूपं स्कन्धत्र- यात्मकमष्टादशमहर्षिप्रणीतं ज्योतिषशास्त्रं वेदचक्षूरूपं परम्परातः प्रसिद्धम् । अष्टादशमहर्षयश्च ज्योतिषशास्त्र प्रतिपादका ये तेषां नामानि प्रकाशितानि (१) अत्र पुलस्त्य पौलिशयोर्भेदेन पराशरेण ज्योतिषशास्त्रप्रवर्त्तका एकोनविं- शति संख्याका आचार्या अभिहिताः । केचनाष्टादशाचार्य्यानुरोधेन पुलस्त्यो- मनुविशेषणपरश्चेति वदन्ति । नारदेन तु सूर्यं हित्वा सप्तदशाचार्या एव स्वसं- हितायां प्रकाशिताः । तत्रापि ब्रह्माचार्यो वसिष्ठोऽत्रिरित्यादौ ब्रह्मसूर्यो वसि- ष्ठोऽङ्गिरित्यनेपाठं वदन्ति । अथाहो एते संहिताकारा महात्मनो लगधस्य न कुर्व्वन्ति चर्चाम् । येन महात्मना वेदाङ्गमूलरूपं ज्यौतिषं पञ्चवर्षयुगवर्णन परं विलक्षणं चक्रे । सूर्येण मयारुणकृते ब्रह्मणा नारदाय व्यासेन स्वशिष्याय वसिष्ठेन माण्डव्यवामदेवाभ्यां पाराशरेण मैत्रेयाय पुलस्त्याचार्यो गर्गात्रिभिश्चैवं स्वस्व- शिष्येभ्यो ज्योतिषशास्त्र विशेषाः प्रतिपादिताः । तथाचाह पराशरः । “नारदाय यथा ब्रह्मा, शौनकाय सुधाकरः । माण्डव्यवामदेवाभ्याम्, वसिष्ठोयतपुरातनम् ॥ नारायणो वसिष्ठाय, रामेशायापिचोक्तवान् । व्यासःशिष्याय सूर्योऽपि, मयारुणकृतेस्फुटम् ॥ पुलस्त्याचार्य्यगर्गात्रि, रोमकादिभििरीतम् । विवस्वता महर्षीणाम्, स्वयमेव युगेयुगे ॥ मैत्रेयाय मयाप्युक्तम्, गुह्यमध्यात्मसंज्ञकम् । शास्त्रमाद्यं तदेवेदम्, लोकेयच्चाति दुर्लभम् ॥ (१)-"सूर्यःपितामहो व्यासो वसिष्ठोऽत्रिपराशरः । कश्यपोनारदोगर्गो मरीचिर्मनुरङ्गिराः ॥ लोमशःपौलिशश्चैव च्यवनो यवनो भृगुः । शौनकोऽष्टादशाश्चैते ज्योतिःशास्त्रप्रवर्त्तकाः ॥ पराशरश्च —विश्वसृङ्नारदो व्यासो वसिष्ठोऽत्रि पराशरः । लोमशोयवनः सूर्य श्च्यवनः कश्यपो भृगुः ॥ पुलस्त्यःमनुगाचार्यो पौलिशःशौनकोऽङ्गिराः । गर्गोमरीचिरित्येते ज्ञेयाज्योतिःप्रवर्त्तकाः॥
भूमिका ॥ २५ अथैतेषामाचार्याणां समयादिनिरूपणं तत्तद्रचितसिद्धान्तानामलाभेऽतीव काठिन्यमतो ऽस्माभिस्तोत्रज्योतिषसिद्धान्तग्रन्थकारपुरुषाणा मुत्तरोत्तरं ख- ण्डनप्रतिखण्डनद्वारेण बहुविशेषरचयितॄणां यावच्छक्यं तत्तद्ग्रन्थमर्मस्थलानां सम्यगवलोकनेन समयादिकं निरूप्यते ॥ उपरोक्त संस्कृत का आशय—नीचे लिखे सिद्धान्तज्योतिष के ग्रन्थों के नाम तो पाये जाते हैं पर ये ग्रन्थ नहीं मिलते अतएव ये ग्रन्थ कब २ बने इस का पता लगाना कठिन है ॥ सिद्धान्त ज्योतिष ग्रन्थों के नाम ॥ ग्रन्थ नाम । ग्रन्थ नाम । ग्रन्थ नाम । ग्रन्थ नाम । १ ब्रह्मसिद्धान्त । ६ मनुसिद्धान्त । ११ पुलस्तसिद्धान्त । १६ च्यवनसिद्धान्त २ मरीचिसद्धान्त । ७ अङ्गिरस्सिद्धान्त । १२ वसिष्ठसिद्धान्त । १७ गर्गसिद्धान्त । ३ नारदसिद्धान्त । ८ बृहस्पतिसिद्धान्त । १३ पराशरसिद्धान्त । १८ पुलिससिद्धान्त । ४ कश्यपसिद्धान्त । ६ अत्रिसिद्धान्त । १४ व्याससिद्धान्त । १६ लोमशसिद्धान्त । ५ सूर्य्यसिद्धान्त । १० सोमांसद्धान्त । १५ भृगुसिद्धान्त । २० यवनसिद्धान्त । आधुनिक पौरुष ज्योतिष ग्रन्थ ॥ ग्रन्थ नाम । ग्रन्थ कर्त्ता ग्रन्थनिर्माणकाल स्थान १ आर्य्यभटीय । पं० आर्य्यभट ४२३ शाके पटना २ पञ्चसिद्धान्तिका । पं० वराहमिहिर ४२७ ,, कालपी ३ ब्रह्मस्फुटसिद्धान्त । पं० ब्रह्मगुप्त ५२० ,, भीलमाल (दक्षिणपश्चिमोत्तर) ४ द्विती. यआर्य्य सिद्धान्त । द्विती.यआर्यभट ८७५ ,, ५ सिद्धान्त शिरोमणि । पं० भास्कराचार्य्य १०७२ ,, दौलताबाद ६ सिद्धान्तसार्वभौम । पं० मुनीश्वर १५२५ ,, एलचपुर ७ तत्त्वविवेक । पं० कमलाकर भट्ट १५८० ,, विदर्भ आर्यभटीय ॥ उपलब्ध पौरुष ज्योतिष ग्रन्थों में सब से पुराना—“आर्यभटीय” है । आर्यभट नामक ज्योतिषी ने आर्याछन्द के १२० श्लोकों में इस ग्रन्थ को शाके ४२३ में—स्थान कुसुम पुर (बिहार प्रान्त के अन्तर्गत पाटलिपुत्र या पटना) में बनाया और इस ग्रन्थ का नाम “आर्यभटीय” रक्खा । लोग इसे “आर्य- सिद्धान्त,” “लघु आर्यसिद्धान्त” या “प्रथमार्य-सिद्धान्त” भी कहते हैं। आर्य- भट स्वयं अपने जन्मस्थान एवं ग्रन्थ निर्माणकाल के विषय में यों लिखते हैं कि — “ब्रह्म कु शशिशुधभृगुरविकुजगुरुकोणभगणान्ममस्कृत्य । आर्य्यभटस्त्विह निगदति कुसुम पुरेऽभ्यर्चितं ज्ञानम्॥१॥आ०भ०ग०प०१श्लो० भा०:--पृथिवी, चन्द्रमा, बुध, शुक्र, आदि अधिष्ठित परब्रह्म को नम-
२६ आर्य्यभटीयम्- स्कार कर आर्य्यभट इस 'कुसुम पुर' (पटना) के लोगों से समाहृत आर्य्यभटीय ग्रन्थ को कहते हैं ॥ १ ॥ पुनः— “षष्ट्यब्दानां षष्टिर्यदा व्यतीतास्त्रयश्च युगपादाः । त्र्यधिका विंशतिरब्दास्तदेह मम जन्मनोऽतीताः ॥ आ०भ०गी०३श्लो०॥१९॥ भा०:–इस वर्त्तमान २८ वीं चौयुगी के चतुर्थ भाग में से तीसरे भाग के ६० वर्ष बीतने पर मेरा (आर्य्यभट का) जन्म हुआ। और मेरे जन्म काल से अब तक २३ वर्ष बीत गयीं। वर्त्तमान महायुग के चतुर्थपाद के ३६०० सौ वर्ष बीतने पर मेरी उमर २३ वर्ष की हुई। इसी समय मैं ने इस ग्रन्थ को रचा ॥ १० ॥ पुनः आर्य्यभट ने यह भी लिखा है कि मैं ने यह ग्रन्थ प्राचीन वैदिक ज्योतिष के अनुसार ही बनाया है–इसे नवीन रचना समझ कर लोग इस की निन्दा न करें:– “सदसज्ज्ञान समुद्रात् समुद्धृतं देवताप्रसादेन ! सञ्ज्ञानोत्तमरत्नं मया निमग्नं स्वमति नावा ॥” आ०भा०गी०४श्लो०४९ भा०:–ज्योतिषशास्त्ररूपी समुद्र में अपनी बुद्धिरूपी नौका पर सवार हो समुद्र में निमग्न होकर ब्रह्मा (ब्रह्माकृत वेदाङ्ग ज्योतिष) की कृपा से सद्ज्ञान रूप रत्न को मैं ने (आर्य्यभट ने) बाहर किया अर्थात् प्रकाशित किया॥४९॥पुनः– “आर्य्यभटीयं नाम्ना पूर्वं स्वायम्भुवं सदा सद्यत् । सुकृतायुषोः प्रणाशं कुरुते प्रति कञ्चुकं योऽस्य ॥ आ०भ०गी०४श्लो०५० भा०:–आदि काल में जिस ज्योतिषशास्त्र को वेद से निकाल कर लोक में प्रचार किया गया उसी ज्योतिषशास्त्र को अर्थात् वैदिक ज्योतिषशास्त्रको मैं ने (आर्य्यभट ने) “आर्य्यभटीय” नाम से प्रकाशित किया। इस शास्त्र में जो कोई व्यक्ति मिथ्या दोष दिखलाकर इस का तिरस्कार करेगा–उस के सुकृत, पुण्य वा यश एवं आयु का नाश होगा ॥ ५० ॥ इस “आर्य्यभटीय” में दो मुख्य भाग हैं और १०८ आर्या छन्द के श्लोक हैं अतएव कोई २ इस को “आर्याष्टशत” भी कहते हैं। इन दो भागों को कोई २ टीकाकार–भिन्न २ दो ग्रन्थ मानते हैं–जैसा कि–इस के टीकाकारों में से सूर्ययज्वन्–टीकाकार ने–इन भागों को दो प्रबन्ध मानकर प्रत्येक की आदि में विघ्न शास्त्र्यर्थ मङ्गलाचरण किया है; अतएव बहुत से लोगों ने इन दो भागों को भिन्न २ ग्रन्थ माना है। परन्तु ग्रन्थ देखने से मालूम होता है कि एक भाग दूसरे भाग पर अवलम्ब रखता है। अर्थात् यदि एक को छोड़ दिया जावे तो दूसरे का कुछ उपयोग नहीं रहता। इस लिये दोनों को मिलाकर एक सिद्धान्त मानना ठीक है। स्वयं आर्य्यभट ने भी प्रथम भाग का कोई पृथक नाम
भूमिका ॥ २७ • नहीं रक्खा है और न उस के अन्त में उपसंहार ही किया है, एकत्र पूरे (दोनों भागों का) ग्रन्थ के अन्त में ही उपसंहार किया है और "आर्य- भटीय" ऐसा नाम रक्खा है। इसीप्रकार ग्रन्थकार ने ग्रन्थ भर में चार पाद रक्खे हैं पाद का अर्थ चौथा भाग है और चतुर्थ भाग किसी पूरे १६ अंशों की वस्तु में होता है-अतएव प्रथम पाद के पूर्व दो श्लोक, प्रथम पाद में १० श्लो०, द्वितीय में ३३ श्लो०, तृतीय पाद में २५ और चतुर्थ में ५०, यों सब मिल कर १२१ श्लोक हैं। परन्तु "आर्याष्टशत" इस लेख को देख कर बहुतसे युरोपियन विद्वानों ने भ्रम से इस ग्रन्थ में ८०० श्लोकों का होना माना है। जो श्रीमान् डाक्टर करण साहब के-सन् १८७४ ई० के छप वाये संस्कृत टीका- सहित आर्यभटीय के देखने से पाश्चात्य विद्वानों का ८०१ आर्या श्लो० होने का भ्रम दूर हुआ। आर्यसिद्धान्त नाम से एक दूसरा भी ज्योतिष ग्रन्थ- प्रसिद्ध है-उस पर विचार किया जाता है। द्वितीय आर्यसिद्धान्त ॥ द्वितीय आर्यभट शाके ८७५ में हुए "प्रथम आर्यभट" के अतिरिक्त यह एक द्वितीय "आर्यभट" नवीन हुए; अतएव इन्हें "द्वितीयआर्यभट" और इन के ग्रन्थ को "द्वितीयआर्यसिद्धान्त" कहते हैं। पूना के "दक्षिण- कालिज" में "द्वितीय आर्यसिद्धान्त की एक प्रति है जिस पर "लघुआर्य- सिद्धान्त" लिखा है, परन्तु स्वयं ग्रन्थकार ने अपने ग्रन्थ में ग्रन्थ का नाम "लघु" या "बृहत्" कुछ भी नहीं लिखा है। इस ग्रन्थ के पहिली "आर्या" (छन्द) में लिखा है कि- "विधि ध खगागम पाटी कुट्टक बीजादि दृष्टशास्त्रेण । आर्यभटेन क्रियते सिद्धान्तो रुचिर आर्याभिः" ॥ भाः-इन ने अपने ग्रन्थ को "सिद्धान्त" ऐसा लिखा है इस के पूर्व के "आर्यभट" से यह नवीन हैं, (जो आगे सिद्ध होगा) इसलिये इन को "द्वितीय आर्यभट" और इन के सिद्धान्त को "द्वितीय आर्यसिद्धान्त" कहते हैं। इन ने अपना ग्रन्थ निर्माण या जन्मकाल के विषय में कुछ नहीं लिखा है। किन्तु "पराशरसिद्धान्त" ग्रन्थ का मध्यम मान दिया है इससे इन ने दोनों सिद्धान्त ग्रन्थों का उल्लेख किया है। "एतत् सिद्धान्तद्वयमषिष्ट्यादि कलौ युगे जातम्" ॥ २ ॥ अध्याय २ ॥ इस के अनुसार कलियुग के थोड़े ही समय बीतने पर ये दोनों सिद्धान्त रचे गये ऐसा दिखलाने का-इन का उद्देश्य है।
२८ आर्यभटीयस्य- परन्तु ब्रह्मगुप्त के अनन्तर यह ग्रन्थ रचा गया ऐसा स्पष्ट प्रतीत होता है। इस का कारण यह है कि यह अपने सिद्धान्त को कलियुग के आरम्भ ही में बनना बतलाते हैं, इस से अपने ग्रन्थ को पौरुष ग्रन्थकारों में गणना करते हैं। ब्रह्म गुप्त के पहिले इन के ग्रन्थोल्लिखित वर्षमान या अन्यान्य मानों का वस्तुतः कहीं प्रचार होने का कोई प्रमाण नहीं मिलता। और ब्रह्म गुप्त ने अपने ग्रन्थ में आर्यभट-के दूषणों को सब से पहिले दिखलाया है। इस से ब्रह्मगुप्त के पहिले प्रथम--आर्यभट हुए यह सिद्ध होता है। द्वितीय आर्यभट के सिद्धान्त के किसी विषय का उल्लेख ब्रह्मगुप्त ने नहीं किया, यदि द्वितीय-आर्यभटग्रन्थ उस समय या उससे पहिले बना होता तो अवश्य इस का भी उल्लेख ब्रह्मगुप्त करते। "पञ्चसिद्धान्तिका" (जो शाके ४२१ का बना है) में अय गति का उल्लेख कुछ भी नहीं दीखता। पहिला आर्यभट, ब्रह्मगुप्त, लल्ल, इन के ग्रन्थों में अयनगांते का वर्णन नहीं है और इस द्वितीय आर्यसिद्धान्त में इसका वर्णन है। अधिक क्या कहा जावे-प्रथम आर्यभट के जो २ दूषण ब्रह्मगुप्त ने दिखलाये हैं, उस २ के उद्धार का यत्न, द्वितीय, आर्यभट ने किया है। इन के ग्रन्थ में युगपद्धति (सत, त्रेता, द्वापर, कलि) है; कल्प का आरम्भ रविवार को माना है, और पहिला आ० भ० में युग के आरम्भ में मध्यमग्रह एकत्र रहते, स्पष्टग्रह एकत्र नहीं रहते ऐसा लिखा है। इसका खण्डन ब्रह्मगुप्त ने किया है (अ० २। आर्या ४६) परन्तु द्वितीय आर्यभट के प्रमाण से सृष्टि के आरम्भ में स्पष्ट ग्रह एकत्र होते हैं इन सब प्रमाणों से ब्रह्मगुप्त के अनन्तर अर्थात् शाके ५८१ के अनन्तर २रे आ०भ० थे। यह उस समय का प्राचीन सिद्धान्त माना जाता और अर्वाचीन सिद्धान्त सब से पहिले आर्यकुलभूषण पं० भास्करा चार्य ने रचा। सिद्धान्त शिरोमणि के स्पष्टाधिकार के ६५ वें श्लोक में लिखा है कि " श्रीयर्यभटादिभिः सूक्ष्मत्वार्थं दृक्कोशोदयाः पठिताः " दृक्क्रोश अर्थात् राशि का तीसरा अंश (१० अंश)। प्रथम आर्यभट ने लग्नमान को तीस २ अंशों में किया है। दश २ अंशों का नहीं। परन्तु द्वितीय आ० भ० ने अ० ४ आर्या ३८-४१ में दृक्कोशोदय (लग्न- मान) कहा है। इस प्रमाण से दृक्कोशोदय साम्प्रत द्वितीय आर्यभट को छोड़ अन्य किसी ग्रन्थ में नहीं लिखा है। इस के अनुसार भास्कराचार्य के उक्त वाक्यानुसार आ०भ० पहिला नहीं, किन्तु द्वितीय आ० सि० ही सिद्ध होता है। जिस के अनुसार शाके १०७२ के पूर्व द्वितीय आर्यभट थे, ऐसा निश्चय होता है। द्वितीय आ० भ० ने अयनांश निकालने की रीति दियी है, इस के अनु-
भूमिका ॥ २९ सार अयनगति एकसी नहीं रहती वरञ्च उस में बहुत न्यूनाधिक्य होता है। परन्तु अयन गति सर्वदा एकसी रहती-ऐसा मानने पर भी इसकी सूक्ष्म गति मानी जाती है जिससे उस में बहुत थोड़ा अन्तर पड़ता है। आधुनिक सूर्य-सिद्धान्तोक्त अयनगति सब काल में एकसी रहती है परन्तु इस का काल ज्ञात नहीं ऐसा लिखा है। “राजमृगांक” ग्रन्थ में (शाके ९६४) अयनगति सब काल में एकसी रहती है ऐसा लिखा है। इस ग्रन्थ को पूर्व के बने ग्रन्थों में इस विषय के होने का प्रमाण अब तक नहीं मिला है। इस के अनुसार अर्यनगति का ज्ञान (बराबर) होने के पहिले द्वि० आ० भ० भट्टोत्पल के टीका में लिखा है। परन्तु दूसरे आ० भ० में ऐसा नहीं लिखा है जिस से द्वितीय आर्यभट भट्टोत्पल के पहिले थे ऐसा निश्चय होता है। उपरोक्त प्रमाणों से द्वि० आ० भट्टोक्त मेष-संक्रमण काल के उल्लेखानु- सार-द्वितीय आर्यभट का समय ८७५-सिद्ध होता है। इस द्वितीय आर्यसिद्धान्त में १८ अधिकार और ६२५ आर्या छन्द के श्लोक हैं। प्रथम १३ अध्यायों में करण ग्रन्थ के निराले २ अधिकारों का वर्णन है, चौदहवें में गोल सम्बन्ध विचार एवं प्रश्न हैं, १५ वें में १२० आर्या श्लो० में अङ्क गणित एवं क्षेत्रफल, घनफल का वर्णन है, १६वें में भुवन कोश का वर्णन है, १७वें में ग्रह मध्य की उपपत्ति इत्यादि हैं और १८ वें में बीजगणित, कुट्टक गणितहैं। इस में ब्रह्म गुप्त के ब्र० सि० से भी अधिक विषय हैं। इन ने संख्या दिखलाने का क्रम प्रथम आर्यभट से भी विलक्षण ही दिया है जैसा कि— वर्णा वर्णबोधितसंख्या वर्णा संख्या कँ, ट, प, य,= १ च, त, ष,= ६ ख, ठ, फ, र= २ छ, थ, स= ७ ग, ड, ब, ल= ३ ज, द, ह= ८ घ, ढ, भ, व= ४ झ, ध= ९ ङ, ण, म, श= ५ ञ, न= ० “अङ्कानां वामतो गतिः” यह नियम प्रथम आर्यभट ने नहीं लिखा है। हम ने यहां “द्वितीयआर्यभट” के समय आदि का विचार इस लिये किया है कि जिस से पाठकों को यह भ्रम न हो कि दोनों आर्यभटीय ग्रन्थों में पुराना कौनसा है-एवं दोनों ग्रन्थ एक ही ग्रन्थकार द्वारा बने या भिन्न २ द्वारा
३० आर्यभटीयम्- इत्यादि। अब इस का आगे "प्रथम आर्यभटीय" का अनुवाद आरम्भ होगा हमारे देशके बहुतसे अमूल्य ग्रन्थ तो अङ्गरेजों से पहिले के आये हुए विधर्मियों के उपद्रव आदि कारणों से नष्ट भए हुए, उन से बचे बचाये ग्रन्थ, देश के ईर्ष्यालु व मण्डूकों (मूर्खो) के पास सड़ते हैं और उनका प्रचार नहीं होता, इससे बचे बचाये ग्रन्थ हमारे परम माननीय अङ्गरेजी गवर्नमेण्ट के सुप्रबन्ध से पुस्त- कालयों तथा लन्दन, जर्मन आदि देशों में सुरक्षित हैं, परन्तु बड़े शोच की बात है कि जिस भारतवासियों के घर का रत्न समुद्र पार जाये, वे भड्डू के लड्डू की गाढ़ निद्रा में कुम्भकरण की नाईं खर्राट मार कर सोते हैं और जगाने पर भी नहीं जगते-और इन्हीं अमूल्य ग्रन्थों का तर्जुमा विला- यत आदि से होकर आता है तो जी की जी भाव में देखते हैं। हमने असम देश के श्रीरण रक्षार्थ डूंढिंराज के पुराने ग्रन्थ-आर्यभटीय की एक प्रति असम् देश से मंगवा कर पाठकों के अवलोकनार्थ सटीक सानुवाद प्रकाशित किया है। आशा है कि हमारे पाठकगण इस की एक २ प्रति मंगा कर अपने स्वदेशीय रत्नोंका संचय कर हमारे परिश्रम को सफल करेंगे अनुवादक.
आर्य्यभटोयस्य विषयानां सूचीपत्रम् ॥ विषय पृष्ठाङ्क मङ्गलाचरणपूर्वक वस्तु कथन १ संख्या ज्ञापक अक्षरों की परिभाषा ॥ २ चतुर्युग में सूर्यादि की भगणसंख्या । ४-५ चन्द्रोच्च बुध, शुक्र के शीघ्रोच्च भगण । ६-७ कल्पान्तर्गत मनु और गत काल । ७-८ राशि आदि विभाग, आकाशकक्षा योजन प्रमाण आदि । ८ योजन परिमित भूमि आदि का योजनप्रमाण । १० ग्रहों के अपयान-प्रमाण और पुरुष-प्रमाण । ११ मङ्गलादि पांच ग्रहों का पात भगण और मन्दोच्चांश । १२ सूर्यादि के मन्दवृत्त और शनि आदि के शीघ्रवृत्त । १४ वक्री ग्रहों का युग्मपद में वृत्त एवं भू-वायु की कक्षा का प्रमाण । १५ चौबीश अर्ध्ज्या १६ दश गीतिका सूत्र परिज्ञान का फल । .१७ प्रथमपाद की विषयसूची समाप्त हुई ॥१॥ . ग्रन्थकार के जन्मस्थान का वर्णन । १७ संख्या के दश स्थानों की संज्ञा और संज्ञा का लक्षण । १८ वर्ग और घन स्वरूप वर्णन । १९ वर्गमूल । १९ घनमूल । २०-२३ त्रिभुज क्षेत्रफल और घन त्रिभुज का फल । २३-२४ वृत्तक्षेत्रफल और घन समवृत्त क्षेत्रफल । २४ विषम चतुष्कोण आदि का क्षेत्रफल । २४-२५ सब क्षेत्रों का फल लाना और व्यासार्द्ध तुल्यज्या का ज्ञान । २५-२६ वृत्त की परिधि का प्रमाण । २६-२७ जीवा की परिकल्पना की विधि । २७-२९ गीतिकोक्त खण्डज्याओं के लाने का उपाय । २९-३० वृत्तादि के परिकल्पना का प्रकार । ३०-३१ वृत्त के विष्कम्भार्द्ध का लाना । ३१ छाया का लाना । ३२ कोटी और भुजाओं का लाना । ३२-३३ कर्ण एवं अर्ध्ज्या का लाना । ३३
२ आर्यभटीयस्य विषयाणां सूचीपत्रम् ॥ विषय पृष्ठाङ्क पार्श्वगत दो शरों का लाना । ३४ श्रेढीफल का लाना । ३४-३५ गच्छ का लाना । ३६ सङ्कलित धन का लाना । ३६-३७ वर्ग और घन के सङ्कलित का लाना । ३७-३८ दो राशियों के संवर्ग से दो राशियों का लाना । ३८ राशि के संवर्ग से दो राशि का लाना । ३८-३९ मूलफल लाना । ३९-४० त्रैराशिक गणित । ४० भिन्न २ राशियों का सवर्णीकरण । ४१ व्यस्तविधि । ४२ संघ धन का लाना । ४२-४३ अव्यक्त मूल्य का मूल्य दिखलाना । ४३-४४ ग्रहान्तरों से ग्रहयोग का लाना । ४४ कुट्टाकार गणित । ४५-४८ द्वितीय पाद की विषय सूची समाप्त हुयी । काल और क्षेत्रविभाग । ४८-४९ द्वियोग और व्यतीपात की संख्या । ४९-५१ उच्च नीच वृत्त का आधार और गुरुवर्ष की संख्या । ५१ सौर, चान्द्र, सावन, नाक्षत्र मानविभाग । ५२ अधिमास, अवम दिन वा क्षय दिन । ५२ मनुष्य, पितृ, देवताओं के वर्ष का प्रमाण । ५२-५३ ग्रहों के युगकाल, ब्राह्म दिन काल । ५३ काल की उत्सर्पिणी आदि विभाग । ५३-५४ शास्त्र का प्रणयन काल एवं ग्रन्थकार की आयु । ५४-५५ युगादि प्रारम्भ काल ५५-५६ ग्रहों का समगति होना । ५६ समगति वाले ग्रहों का शीघ्र गति होना । ५६ राशि, भाग, आदि क्षेत्रों का प्रमाण । ५६-५७ नक्षत्र मण्डल से अधोगत ग्रह कक्ष्या का क्रम । ५७ उक्त कक्ष्या क्रम से काल होराधिपति, दिनपति । ५७-५८
आर्यभटीयस्य विषयाणां सूचीपत्रम् ॥ ३ विषय पृष्ठाङ्क दृष्टि के वैषम्य होने का कारण— ५८-५९ प्रतिमण्डल का प्रमाण और उस का स्थान— ५९ स्फुट ग्रहों का अन्तराल प्रमाण— ५९-६० भ्रमण प्रकार— ६०-६१ उच्च, नीच वृत्त के भ्रमण का प्रकार— ६१-६२ मन्द और शीघ्र के ऋण और धन का विभाग— ६२-६३ शनि, गुरु, मङ्गल (स्फुट) ६३-६६ भ, तारा, ग्रहों का विवर लाना— ६६ तृतीय पाद की विषयसूची समाप्त हुई । अपमण्डल का संस्थान— ६७-६८ अपक्रम मण्डल चारी ग्रहगण— ६८ अपमण्डल के चन्द्रमा का पात उत्तर से दक्षिण— ६८-७० चन्द्रमा आदि का दूर और निकटता से सूर्य प्रभा से उदयास्त ज्ञान— ७०-७१ स्वतः अप्रकाश भूमि आदि के प्रकाश का हेतु— ७१ कदम्बा और भूसंस्थान— ७१-७२ भूगोल के ऊपर प्राणियों का निवास— ७२ कल्प में भूमि की वृद्धि और ह्रास— ७२ भूमि का पूर्व की ओर चलना— ७२-७३ भपञ्जर के भ्रमण का कारण— ७३ मेरु प्रमाण और मेरु का स्वरूप— ७३-७४ मेरु, बड़वामुख आदि का अवस्थान— ७४ भूमि के चारों ओर पृथिवी के चतुर्थ भाग में ४ नगरियां— ७४-७५ लङ्का और उज्जयिनी के बीच का देश— ७५-७६ भूपृष्ठस्थित ज्योतिश्चक्र के दृश्य और अदृश्य भाग— ७६ ज्योतिश्चक्र में देवासुर दृश्य भाग— ७६-७७ देवादिकों का दिन प्रमाण— ७७-७८ गोल कल्पना— ७८-७९ क्षितिज में नक्षत्र और सूर्यादि ग्रहों का उदयास्त— ७९-८० द्रष्टा के कारण ऊंचे नीचे का विभाग— ८० दृङ्मण्डल, दृक्क्षेप मण्डल— ८०
४ आर्य्यभटीयस्य विषयाणां सूचीपत्रम् ॥ विषय पृष्ठाङ्क गोल के भ्रमण का उपाय— ८०-८१ क्षेत्र कल्पना का प्रकार और अक्षावलम्बक— ८१-८२ स्वाहोरात्रार्द्ध— ८२ निरक्ष देश में राशि का उदय प्रमाण— ८२-८३ दिन रात्र की हानि वृद्धि । ८२ स्वदेशीय राशियों का उदय । ८३-८४ इष्टकाल में शङ्कु का लाना । ८५ शङ्कु अग्रा को लाना । ८५-८६ अर्क अग्रा का लाना । ८६ सूर्य का सम मण्डलप्रवेश काल में शङ्कु का लाना ८६-८७ मध्यान्ह 'शङ्क और उस की छाया । ८७ दृक्क्षेप ज्या का लाना । ८७-८८ दृग्गति, उयावलम्बन योजन का लाना । ८८-८९ चन्द्रादि के उदयास्त लग्न सिद्धि के लिये अपने २ विक्षेप दृक् कर्म । ८९ आयर्न दृक्कर्म । ८९-९० चन्द्र, सूर्य, भूमि छाया के चन्द्र सूर्य ग्रहण के स्वरूप । ९० ग्रहणकाल । ९०-९१ भूछाया का दैर्घ । ९१ भूछाया के चन्द्रकक्षा प्रदेश में व्यास योजन का लाना । ९१-९२ स्थित्यर्ध का लाना । ९२ विमर्दार्धकाल का लाना । ९२-९३ ग्रस्त शेष प्रमाण— ९३ तात्कालिक ग्रास परिमाण— ९३ स्पर्श मोक्षादि ज्ञान— ९३-९४ गृहीत विम्ब स्थान वर्णन— ९४-९५ सूर्यग्रहण में अदृश्य भाग— ९५ स्वशास्त्र प्रतिपादित ग्रह गति से दृक् संपात द्वारा स्फुटत्वं-- ९५-९६ शास्त्र का मूल— ९६ उपसंहार— ९६ आर्य्यभटीय की विषयसूची समाप्त हुई ॥
॥ ओ३म् ॥ अथार्यभटीयं ज्योतिषशास्त्रम् ॥ " यस्तेजः प्रेरयेत् प्रज्ञां सर्वस्य शशिभूषणम् । मृगटङ्काभयेष्टाङ्कन्त्रिणेत्रन्तमुपास्महे ॥ लीलावती भास्करीयं लघु चान्यच्च मानसम् । व्याख्यातं शिष्यबोधार्थं येन प्राक्तेनं चाधुना ॥ तन्त्रस्यार्यभटीयस्य व्याख्याल्पा क्रियते मया । परमादीश्वराख्येन नाम्नात्र भटदीपिका ॥" तत्रायमाचार्य आर्यभटो विघ्नोपशमनार्थं स्वेष्टदेवतानमस्कारं प्रतिपा- द्य वस्तुकथनञ्चार्यरूपया करोति ॥ प्रणिपत्यैकमनेकं कं सत्यां देवतां परं ब्रह्म । आर्यभटस्त्रीणि गदति गणितं कालक्रियां गोलम्॥ इति ॥ कं ब्रह्माणं एकं कारणरूपेणैकं अनेकं कार्यरूपेणानेकं सत्यां देवतां देव एवदेवता। स्वयम्भूरैव पारमार्थिको देव अन्ये तेन सृष्टा इत्यपारमार्थिकाः। परंब्रह्म जगतो मूलकारणं त्रिमूर्त्यतीतं सर्वव्याप्तं ब्रह्म स्वयम्भूरित्युक्तौ भ- वति । आर्यभट एवं ब्रह्माणं प्रणिपत्य गणितं कालक्रियां गोलम्-इत्येतानि त्रीणि वस्तूनि निगदति * परोक्षत्वेन निर्देशान्निगदतीति वचनम्। तत्र गणि- तन्नाम सङ्कलितमिश्रश्रेढीदर्शधीकुट्टाकारच्छायाक्षेत्राद्यनेकविधम् । इह तु काल- क्रियागोलयोर्यावन्मात्रं परिकरभूतं तावन्मात्रं सामान्यगणितमेव प्रायशः प्र- तिज्ञातम् । अन्यच्च किञ्चित्। कालस्य क्रिया कालक्रिया । कालपरिच्छेदोपाय- भूतं ग्रहगणितं कालक्रियेत्यर्थः । गोलनाम ब्रह्माण्डकटाहमध्यवर्त्याकाशम- ध्यस्थसंहनक्षत्रकक्ष्यात्मकं स्वमध्यस्थघनवृत्तभूमिकमपक्रमाद्यशेषविशेषोपेतं प्रवाहाख्यवायुप्रेरितं कालचक्रज्योतिश्चक्रभपञ्जरादिशब्दवाच्यं गोलः । स च
२ गीतिकापादः ॥ वृत्तक्षेत्रत्वाच्चतुरश्राद्यनेकक्षेत्रकल्पनाधारत्वाच्च गणितविशेषगोचर एव । एतच्च यमपि द्विविधम् । उपदेशमात्रावसेयन्तन्मूलन्यायावसेयञ्चेति । तत्र युगप्रमाण मन्दोच्चादिवृत्ताद्युपक्रमाद्युपदेशमात्रावसेयम् इष्टदिनग्रहगतीष्टापक्रमस्वाहोरा- त्रचरदलादिच्छायानाडिकाद्युपदेशसिद्धयुगप्रमाणादितो न्यायावसेयम् । एवं द्वै- विध्यम् ॥ अत्र स्वयम्भूप्रणामकरणेन करिष्यमाणस्य तन्त्रस्य ब्रह्मसिद्धान्तं मूलमिति च प्रदर्शितम् ॥ अथोपदेशावगम्यान्युगभगणादीन् सङ्क्षेपेण प्रदर्शयितुं दशगीतिकासूत्रं क- रिष्यन् तदुपयोगिनीं परिभाषामाह ॥ भा०:-अनेक दैवतायों में परमश्रेष्ठ ब्रह्मा-जगत् स्रष्टा (जिस ने अनेक देवों को रचा ) को प्रणाम कर आर्यभट ( ग्रन्थकार ) ' गणित , 'कालक्रिया' और ' गोल विद्या ' इन तीन वस्तुओं को वर्णन करते हैं ॥ वर्गाक्षराणि वर्गेऽवर्गे ऽवर्गाक्षराणि कात् ङ्मौ यः । खद्विनवके स्वरा नव वर्गेऽवर्गे नवान्त्यवर्गे वा ॥ इति=वर्गाक्षराणि वर्गे। ककारादीनि मकारान्तानि वर्गाक्षराणि । तानि वर्गस्थाने एकशतायुताद्योजस्थाने स्थाप्यानि । एवं क्रमेण संख्या वेद्या ॥ अ- वर्गे अवर्गाक्षराणि। यकारादीनि अवर्गाक्षराणि । तान्यवर्गस्थाने दशसहस्र- लक्षादियुग्मस्थाने स्थाप्यानि । कात् ककारादारभ्य संख्या वेद्या । ककार- एकसंख्यः खकारो द्विसंख्य एवं क्रमेण संख्या वेद्या । ञकारो दशसंख्यः । टकार- एकादशसंख्यः । नकारो विंशतिसंख्यः । मकारः पञ्चविंशतिसंख्यः । एवं लि- पिपाठक्रमेण संख्या वेद्या ॥ ङ्मौ यः । ङकारमकारयोर्योगेन तुल्यो यकारः पञ्चसंख्यायाः पञ्चविंशतिसंख्यायाश्च योगस्त्रिंशत्संख्य इत्यर्थः । अत्र प्रथम- स्थानमङ्गीकृत्य त्रिंशदित्युक्तं नतु द्वितीयस्थानमङ्गीकृत्य । द्वितीयस्थाने पि त्रिसंख्यो यकारः । इत्युक्तं भवति । रेफादयः क्रमेण द्वितीयस्थाने चतुरादि- संख्यास्स्युः। हकारो द्वितीयस्थाने दशसंख्यः शतसंख्यावाचक इत्यर्थः । एवम- वर्गस्थानविहितापि हकारसंख्या संख्यान्तरत्वेन वर्गस्थाने स्थाप्यते । एवं ञ- कारादिसंख्या वर्गस्थानविहिताप्यवर्गस्थाने संख्यान्तरत्वेन स्थाप्यते । एतद्धि न्यायतस्सिद्धम्। अत्रगतुल्यो यकार इति वक्तव्ये ङ्मौ य इति वर्णाद्वयेन यद्रूपं तेन संयुक्तैरप्यक्षरैस्संख्या प्रतिपादयिष्यत इति प्रदर्शितं भवति ॥ शून्यभूता- नामनङ्गीकृतसंख्याविशेषाणां के प्रयुज्यन्ते । इत्यत्राह । खद्विनवके स्वरा न-
आर्यभटीये ३ र्गेऽवर्गे । इति । द्विनवकेऽष्टादशके नव स्वराः क्रमेण प्रयुज्यन्ते । अ, इ, उ, ऋ, लृ, ए, ऐ, ओ, औ । इत्येते नव स्वराः । एतदुक्तं भवति । ककाराद्यक्षर- तास्तस्वरास्स्थानप्रदर्शका भवन्ति न संख्याविशेषप्रदर्शका इति । कथं नव- ोख्यां अष्टादशके प्रयुज्यन्ते । इत्यत्राह । वर्गेऽवर्गे । इति । वर्गस्थानेषु न- स्वकाराद्या नव स्वराः क्रमेण प्रयुज्यन्ते । तथा अवर्गस्थानेषु च त एव । ए- वमन्यैरपि कल्प्यम् । तथा प्रथमस्वरयुतैर्यकारादिभिर्विहिता संख्या प्रथमे प्रवर्गस्थाने स्थाप्या । द्वितीयस्वरयुतैर्द्वितीये अवर्गस्थाने।एवमन्यैरपीति। ए- ामष्टादशस्थानेषु संख्या वेद्या।यदा पुनस्ततोऽधिकापि संख्या केनचिद्विवक्षि- ता तदा कथमित्यत्राह। नवान्त्यवर्गे वा । इति । नवानां वर्गस्थानानामन्त्ये ऊर्ध्वगते वर्गस्थाननवके तथा नवानांमवर्गस्थानानामन्त्ये ऊर्ध्वगते अवर्ग- स्थाननवके च एते नव स्वराः प्रयुज्यन्ते वा । केनचिदनुस्वारादिविशेषेण संयुक्ताः प्रयोक्तव्या इत्यर्थः । शास्त्रव्यवहारस्त्वष्टादशस्थानानि नातिवर्तते ॥ अथ चतुर्युगे रव्यादीनां भगणसंख्यामाह । भा०.- वर्ग के अक्षरों को (क, ख' ग, घ, ङ, च, छ, ज, झ, ञ, ट, ठ, ड, ढ, ण, त, थ, द, ध, न, प, फ, ब, भ, म,) वर्ग के स्थान में एक से अयुत तकको (विषम) स्थान में रख कर संख्या जाननी चाहिये । इसी प्रकार अवर्ग में प्रवर्ग के अक्षर जानना यकारादि (य, र, ल, व, श, ष, स, ह,) अवर्ग के स्था- न में दशसहस्र, लक्ष, आदि को "सम" स्थान में रक्खे। ककारसे लेकरसंख्या माननी अर्थात् क, से १, ख, से, २ ग, से ३ इत्यादि, म, से २५ इसप्रकार क को १ सं- ख्या मानकर म पर्यन्तक्रमशः २५ संख्याहोगी। ङ, और म इन दोनों कीसंख्यां का योग "य' की संख्या है। प्रथम स्थान में य ३० का बोधक, द्वितीय स्थान में ३ का, इसी प्रकार 'र' ४० का बोधक और द्वितीय स्थान में ४ का बोधक है। हकारादि भी इसी प्रकार जानना। यहां ककारादि में जो अकारादि स्व- ः संयुक्त हैं वे संख्या प्रदर्शक नहीं हैं किन्तु स्थान प्रदर्शक हैं। अ, इ, उ, ए, ऐ, ओ, औ, ऋ, लृ, ये नव स्वर हैं-तो १८ संख्या स्थानों में नवस्वर दयां कर रक्खे जावेंगे १ वर्ग स्थान में नव स्वर क्रम से प्रयुक्त होते हैं, उसी प्र- कार अवर्ग स्थान में भी वेही नव स्वर हैं। इसी प्रकार औरों का भी जानना प्रथम स्वर युक्त यकारादि द्वारा संख्या कही जावे-उस को पहिले अवर्ग स्था- न में, और द्वितीय स्वर युक्त को द्वितीय अवर्ग स्थान में रखनी । इसी प्र-
४ गीतिकापादः ॥ कार और भी १८ संख्या जाननी चाहिये। अगर १८ से अधिकसंख्या हों, तो इसी नियमसे जानना । परन्तु शास्त्रों में १८ संख्या से अधिक का व्यवहार नहीं है। भा०:—निम्न लिखित चक्र से (अक्षर द्वारा जो इस ग्रन्थ में संख्याओं का निर्देशहुआ है) गीतिका का अर्थ किया गया है। संख्याज्ञापक चक्र। अक्षर । संख्या । अक्षर संख्या । अ = १ लृ = १०००००००० इ = १०० ए = १०००००००००० उ = १०००० ओ = १०००००००००००० ऋ = १०००००० औ = १०००००००००००००० क = १ च = ६ ट = ११ त = १६ प = २१ य = ३० श = ७० ख = २ छ = ७ ठ = १२ थ = १७ फ = २२ र = ४० ष = ८० ग = ३ ज = ८ ड = १३ द = १८ ब = २३ ल = ५० स = ९० घ = ४ झ = ९ ढ = १४ ध = १९ भ = २४ व = ६० ह = १०० ङ = ५ ञ = १० ण = १५ न = २० म = २५ और नव स्वरों का योग, यदि वर्ग या अवर्ग अक्षरों के साथ होता है, तो वे १८ स्थानों के प्रदर्शक होते हैं। जैसे:— क क्+अ=१ इसी प्रकार और व्यञ्जनों का भी जानना कि क्+इ=१०० य और य्+अ=३० कु क्+उ=१०००० यि य्+इ=३००० कृ क्+ऋ=१०००००० यु य्+उ=३००००० कॢ क्+लृ=१०००००००० इत्यादि। के क्+ए=१०००००००००० और कै क्+ऐ=१०००००००००००० र र्+अ=४० को क्+ओ=१०००००००००००००० रि र्+इ=४००० कौ क्+औ=१०००००००००००००००० रु र्+उ=४००००० इत्यादि इसी प्रकार 'ख' का भी जानना । ख ख्+अ=२ खि ख्+इ=२०० खु ख्+उ=२०००० इति संख्यापरिभाषा-समाप्ता ।
आर्यभटीये युगरविभगणाः ख्युघृ शशि चयगियिडुशुछृॡ ङिशिबुण्ऌ ष्षुप्राक्शने ढुङ्विध्व गुरु खिच्युभ कुज भद्लिकून्मुख भृगु- बुध·सौराः ॥१॥ ष्टादशस्थानगतानां संख्यानां संज्ञा तुः- «एकदशशतसहस्रायुतलक्षप्रयुतकोटयः क्रमशः। अर्बुदमब्जं खर्बनिखर्वमहापद्मशङ्खवस्तस्मात् ॥ जलधिश्चान्त्यं मध्यं परार्द्धमिति दशगुणोत्तरां संज्ञाः» इत्यनेन वेद्या ॥ युगरविभगणाः । चतुर्युगे रवेर्भगणाः ख्युघृ इति । उकारयु- तखकारेणायुतद्वयमुक्तम् । उकारयुतयकारेण लक्षत्रयम् एवं सर्वत्र हल्द्वये एक एव स्वर उभयत्र सम्बध्यते । ऋकारयुतघकारेण प्रयुतचतुष्कम् । एवमनेन न्यायेन सर्वत्र संख्या वेद्या ॥ शशि । शशिन इत्यर्थः । सूत्रे ह्यविभक्तिकोऽपि प्रयोग- स्स्यात् । चयगियिडुशुछृॡ इति युगभगणाश्शशिनः । च षट् । य त्रिंशत् । शि त्रिशतम् । यि त्रिसहस्रम् । ङु अयुतपञ्चकम् । शु लक्षसप्तकम् । छृ प्रयुतसप्तकम् । लॄ कोटिपञ्चकम् । इति ॥ कु भूमेरित्यर्थः । ङिशिबुण्ऌष्वृ इति भगणाः । प्राक् प्राग्गत्या सम्भूता भगणा इत्यर्थः । ष्लॄ पञ्चदशार्बुदम् । नवमस्था ने पञ्चदशम- स्थाने एकडचेत्यर्थः। खृ प्रयुतद्वयम् । ष्टृ कोट्यष्टकम् । भूमेर्यत्प्राङ् मुखभ्रमणं तस्य चतुर्युगे संभूता संख्यात्रोक्ता । भूमिश्चांचलेति प्रसिद्धा तस्याःकथमत्र भ्र- मणकथनम्। उच्यते । प्रवहाक्षेपात्पश्चिमाभिमुखं भ्रमतो नक्षत्रमण्डलस्य मि- थ्याज्ञानवशाद्भूमेर्भ्रमणं प्रतीयते तदङ्गीकृत्येह भूमिभ्रमणमुक्तम् । वस्तुतस्तु न भूमेर्भ्रमणमस्ति । अतो नक्षत्रमण्डलस्य भ्रमणप्रदर्शनपरमत्र भूभ्रमणकथ- नमितिवेद्यम् । वक्ष्यति च मिथ्याज्ञानम् अनुलोमगतिर्नौस्थः पश्यत्यचलं विलोमगं यद्वत् । अचलानि भानि समपश्चिमगानि लङ्कायाम् ॥ इति । अंहोरात्रेण हि भूगोलस्य समस्तभागभ्रमणादद्धैव रवेर्दिनगतितुल्यभागो ऽपि भ्रमति । अतो रवेर्यु गभगणायुतभूदिवसैस्तुल्या नक्षत्रमण्डलस्य भ्रमणनि- र्तिर्भवति । सैवात्रोक्ता स्यात् ॥ शनि ढुङ्विध्व इति । शनेर्यु गभगणाः । ढु- अयुतानाञ्चतुर्दश । ङि पञ्चशतम् । वि षट्सहस्रम् । घ चत्वारि । व षष्ठिः ॥
गुरू ख्रिद्युभ इति । गुरोर्भगणाः । खि इति द्विशतम् । रि इति चतुस्सहस्रम् । घु इत्ययुतषट्कम् । यु इति लक्षत्रयम्। भ इति चतुर्विंशतिः॥ कुज भद्लिकिनुखृ इति । कुजस्य भगणाः । भ चतुर्विंशतिः । दि अष्टशताधिकसहस्रम् । लि पञ्च सहस्रम् । कु अयुतनवकम् । नु लक्षद्वयम्। खृ प्रयुतद्वयम्। अत्र संख्यायोगेभगणसि- द्धिः॥ भृगुबुध सौराः। भृगुबुधयोर्यु गभगणास्सौरा एव। सूर्यभगणाः ख्युघृएव ॥ एवं प्रथमसूत्रेण रव्यादीनां युगभगणान् प्रदर्श्य द्वितीयसूत्रेण चन्द्रोच्चभ- गणान् बुधभृगोश्शीघ्रोच्चभगणांश्च शेषाणां कुजगुरुशनैश्चराणां शीघ्रोच्चश्च चन्द्रपातभगणांश्च भगणारम्भकालञ्चाह । चन्द्रोच्च जू ष्खिध बुध सुगुशिथून भृगु जषबिखुछृ शेषाकीः। बुफिनच पातविलोमा बुधाह्नहजार्कोदयाच्च लङ्कायाम् ॥२॥ चन्द्रोच्चस्य जू ष्खिध इति भगणाः । जुँ ष्खिध इति वा पाठः । जु अयु- ताष्टकम्। ह लक्षचतुष्कम् । षि अष्टसहस्रम्। खि द्विशतम्। ध एकोनविंशतिः ॥ बुधस्य शीघ्रोच्चभगणाः सुगुशिथून इति। सु लक्षनवकम्। गु अयुतत्रयम्। शि स- प्तसहस्रम्। थू प्रयुतसप्तदशकम्। न विंशतिः॥ भृगोश्शीघ्रोच्चभगणा जबिखुछृइति ज अष्टौ। ष अशीतिः । विशतत्रयाधिकद्विसहस्रम् । खु अयुतद्वयम् । दृ प्रयुतसप्त- कम् ॥ शेषाकः। शेषाणां कुजगुरुमन्दानां शीघ्रोच्चभगणा अकीः । अर्कभगणा एव । उपरिष्टादेषां मन्दोच्चांणान्यक्ष्यति । अत इहोक्ताश्शीघ्रोच्चभगणा इति सिध्यति ॥ बुफिनच इति पातस्य चन्द्रपातस्य विलोमात्मकभगणाः । बु अ- युतानां त्रयोविंशतिः । फि .शतद्वयाधिकसहस्रद्वयम् । न विंशतिः । च षट् ॥ कुजादीनां पातभगणान्वक्ष्यति । अर्कस्य तु विक्षेपो न विधीयते । अत एते चन्द्रपातस्य भगणा इति सिध्यति । उच्चपातानां व्योम्नि दर्शनं नास्ति । तथा च ब्रह्मगुप्तः— « प्रतिपादनार्थमुच्चाः प्रकल्पिता ग्रहगतेस्तथा पाताः । » इति॥ बुधाह्नजार्कोदयाच्च लङ्कायाम् । कृतयुगादौ बुधवारे लङ्कायां सूर्यो- दयमारभ्य । अजात् मेषादिसारभ्य राशिचक्रे गच्छतां रव्यादीनां भगणा प्रोक्ता इत्यर्थः। सूर्योदयो मध्यसूर्योदयः कल्पारम्भस्तु स्फुटसूर्योदयः। तत्र मध्य मस्फुटयोर्विशेषाभावात् ॥ कल्पकालान्तर्गतमनून् गतकालञ्च तृतीयसूत्रेणाह ।
आर्यभटीये 9 ग्रहगण युगीय भगणसंख्या । पृथिवी १५८२२३७५०० सूर्य ४३२०००० चन्द्रमा ५७७५३३३६ बृहस्पति ३६४२२४ मङ्गल २२९६८२४ शुक्र ४३२०००० बुध शीघ्रोच्च १७९३७०२० सावन दिन १५७७९१७५०० चन्द्रोच्चभगण ४८८२१९ चन्द्रपातभगण २३२२२६ बुधपातभगण ४३२०००० शुक्रशीघ्रोच्चभगण ७०२२२३८८ शनिभगण १४६५६४ सौर मास ५१८४०००० अधिमास १५९३३३६ चान्द्रमास ५३४३३३३६ तिथि १६०३००००८० क्षयाह २५०८२५८० वर्षमान दिन ३६५ घ १५ प ३१ वि १५ ॥ १, २ ॥ काहोमनवो ढ मनुयुग श्ख गतास्तें'त मनुयुग छूना च । कल्पादेर्युगपादा ग च गुरुदिवसाच्च भारतात्पूर्वम् ॥३॥ काहोमनवो ढ । क कस्य ब्रह्मणः । अहः अह्नि मनवो ढ चतुर्दश भ- वन्ति । मनुयुग श्ख । एकैकस्य मनोः काले युगानि चतुर्युगानि श्ख । श स- प्ततिः । ख द्वयम् । द्वासप्ततिरित्यर्थः । गतास्ते च। एतस्माद्वर्तमानात्कलियु- गात्पूर्वमतीतास्तै मनवः । च षट् । मनुयुग छूना च । वर्तमानस्य सप्तमस्य मनोः । अतीतानि चतुर्युगानि छूना । छा सप्त । ना विंशतिः । सप्तविंशति- रित्यर्थः । स्वराणां ह्रस्वदीर्घयोर्न विशेषः । अकारर दृश एवाकारः ॥ कल्पा-