भारतकोश
आर्यभटीयम् (आचार्य आर्यभट - परमेश्वर टीका एवं हिन्दी अनुवाद)

आर्यभटीयम् (आचार्य आर्यभट - परमेश्वर टीका एवं हिन्दी अनुवाद)

Aryabhatiya of Aryabhata with Hindi Commentary

आचार्य आर्यभट (४७६ ई.) / पं. उदयनारायण सिंह द्वारा

DevanagariSanskritpublished134 पृष्ठ

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भूमिका ॥ २७ • नहीं रक्खा है और न उस के अन्त में उपसंहार ही किया है, एकत्र पूरे (दोनों भागों का) ग्रन्थ के अन्त में ही उपसंहार किया है और "आर्य- भटीय" ऐसा नाम रक्खा है। इसीप्रकार ग्रन्थकार ने ग्रन्थ भर में चार पाद रक्खे हैं पाद का अर्थ चौथा भाग है और चतुर्थ भाग किसी पूरे १६ अंशों की वस्तु में होता है-अतएव प्रथम पाद के पूर्व दो श्लोक, प्रथम पाद में १० श्लो०, द्वितीय में ३३ श्लो०, तृतीय पाद में २५ और चतुर्थ में ५०, यों सब मिल कर १२१ श्लोक हैं। परन्तु "आर्याष्टशत" इस लेख को देख कर बहुतसे युरोपियन विद्वानों ने भ्रम से इस ग्रन्थ में ८०० श्लोकों का होना माना है। जो श्रीमान् डाक्टर करण साहब के-सन् १८७४ ई० के छप वाये संस्कृत टीका- सहित आर्यभटीय के देखने से पाश्चात्य विद्वानों का ८०१ आर्या श्लो० होने का भ्रम दूर हुआ। आर्यसिद्धान्त नाम से एक दूसरा भी ज्योतिष ग्रन्थ- प्रसिद्ध है-उस पर विचार किया जाता है। द्वितीय आर्यसिद्धान्त ॥ द्वितीय आर्यभट शाके ८७५ में हुए "प्रथम आर्यभट" के अतिरिक्त यह एक द्वितीय "आर्यभट" नवीन हुए; अतएव इन्हें "द्वितीयआर्यभट" और इन के ग्रन्थ को "द्वितीयआर्यसिद्धान्त" कहते हैं। पूना के "दक्षिण- कालिज" में "द्वितीय आर्यसिद्धान्त की एक प्रति है जिस पर "लघुआर्य- सिद्धान्त" लिखा है, परन्तु स्वयं ग्रन्थकार ने अपने ग्रन्थ में ग्रन्थ का नाम "लघु" या "बृहत्" कुछ भी नहीं लिखा है। इस ग्रन्थ के पहिली "आर्या" (छन्द) में लिखा है कि- "विधि ध खगागम पाटी कुट्टक बीजादि दृष्टशास्त्रेण । आर्यभटेन क्रियते सिद्धान्तो रुचिर आर्याभिः" ॥ भाः-इन ने अपने ग्रन्थ को "सिद्धान्त" ऐसा लिखा है इस के पूर्व के "आर्यभट" से यह नवीन हैं, (जो आगे सिद्ध होगा) इसलिये इन को "द्वितीय आर्यभट" और इन के सिद्धान्त को "द्वितीय आर्यसिद्धान्त" कहते हैं। इन ने अपना ग्रन्थ निर्माण या जन्मकाल के विषय में कुछ नहीं लिखा है। किन्तु "पराशरसिद्धान्त" ग्रन्थ का मध्यम मान दिया है इससे इन ने दोनों सिद्धान्त ग्रन्थों का उल्लेख किया है। "एतत् सिद्धान्तद्वयमषिष्ट्यादि कलौ युगे जातम्" ॥ २ ॥ अध्याय २ ॥ इस के अनुसार कलियुग के थोड़े ही समय बीतने पर ये दोनों सिद्धान्त रचे गये ऐसा दिखलाने का-इन का उद्देश्य है।