आर्यभटीयम् (आचार्य आर्यभट - परमेश्वर टीका एवं हिन्दी अनुवाद)
Aryabhatiya of Aryabhata with Hindi Commentary
आचार्य आर्यभट (४७६ ई.) / पं. उदयनारायण सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६ आर्य्यभटीयम्- स्कार कर आर्य्यभट इस 'कुसुम पुर' (पटना) के लोगों से समाहृत आर्य्यभटीय ग्रन्थ को कहते हैं ॥ १ ॥ पुनः— “षष्ट्यब्दानां षष्टिर्यदा व्यतीतास्त्रयश्च युगपादाः । त्र्यधिका विंशतिरब्दास्तदेह मम जन्मनोऽतीताः ॥ आ०भ०गी०३श्लो०॥१९॥ भा०:–इस वर्त्तमान २८ वीं चौयुगी के चतुर्थ भाग में से तीसरे भाग के ६० वर्ष बीतने पर मेरा (आर्य्यभट का) जन्म हुआ। और मेरे जन्म काल से अब तक २३ वर्ष बीत गयीं। वर्त्तमान महायुग के चतुर्थपाद के ३६०० सौ वर्ष बीतने पर मेरी उमर २३ वर्ष की हुई। इसी समय मैं ने इस ग्रन्थ को रचा ॥ १० ॥ पुनः आर्य्यभट ने यह भी लिखा है कि मैं ने यह ग्रन्थ प्राचीन वैदिक ज्योतिष के अनुसार ही बनाया है–इसे नवीन रचना समझ कर लोग इस की निन्दा न करें:– “सदसज्ज्ञान समुद्रात् समुद्धृतं देवताप्रसादेन ! सञ्ज्ञानोत्तमरत्नं मया निमग्नं स्वमति नावा ॥” आ०भा०गी०४श्लो०४९ भा०:–ज्योतिषशास्त्ररूपी समुद्र में अपनी बुद्धिरूपी नौका पर सवार हो समुद्र में निमग्न होकर ब्रह्मा (ब्रह्माकृत वेदाङ्ग ज्योतिष) की कृपा से सद्ज्ञान रूप रत्न को मैं ने (आर्य्यभट ने) बाहर किया अर्थात् प्रकाशित किया॥४९॥पुनः– “आर्य्यभटीयं नाम्ना पूर्वं स्वायम्भुवं सदा सद्यत् । सुकृतायुषोः प्रणाशं कुरुते प्रति कञ्चुकं योऽस्य ॥ आ०भ०गी०४श्लो०५० भा०:–आदि काल में जिस ज्योतिषशास्त्र को वेद से निकाल कर लोक में प्रचार किया गया उसी ज्योतिषशास्त्र को अर्थात् वैदिक ज्योतिषशास्त्रको मैं ने (आर्य्यभट ने) “आर्य्यभटीय” नाम से प्रकाशित किया। इस शास्त्र में जो कोई व्यक्ति मिथ्या दोष दिखलाकर इस का तिरस्कार करेगा–उस के सुकृत, पुण्य वा यश एवं आयु का नाश होगा ॥ ५० ॥ इस “आर्य्यभटीय” में दो मुख्य भाग हैं और १०८ आर्या छन्द के श्लोक हैं अतएव कोई २ इस को “आर्याष्टशत” भी कहते हैं। इन दो भागों को कोई २ टीकाकार–भिन्न २ दो ग्रन्थ मानते हैं–जैसा कि–इस के टीकाकारों में से सूर्ययज्वन्–टीकाकार ने–इन भागों को दो प्रबन्ध मानकर प्रत्येक की आदि में विघ्न शास्त्र्यर्थ मङ्गलाचरण किया है; अतएव बहुत से लोगों ने इन दो भागों को भिन्न २ ग्रन्थ माना है। परन्तु ग्रन्थ देखने से मालूम होता है कि एक भाग दूसरे भाग पर अवलम्ब रखता है। अर्थात् यदि एक को छोड़ दिया जावे तो दूसरे का कुछ उपयोग नहीं रहता। इस लिये दोनों को मिलाकर एक सिद्धान्त मानना ठीक है। स्वयं आर्य्यभट ने भी प्रथम भाग का कोई पृथक नाम