आर्यभटीयम् (आचार्य आर्यभट - परमेश्वर टीका एवं हिन्दी अनुवाद)
Aryabhatiya of Aryabhata with Hindi Commentary
आचार्य आर्यभट (४७६ ई.) / पं. उदयनारायण सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८ आर्यभटीयस्य- परन्तु ब्रह्मगुप्त के अनन्तर यह ग्रन्थ रचा गया ऐसा स्पष्ट प्रतीत होता है। इस का कारण यह है कि यह अपने सिद्धान्त को कलियुग के आरम्भ ही में बनना बतलाते हैं, इस से अपने ग्रन्थ को पौरुष ग्रन्थकारों में गणना करते हैं। ब्रह्म गुप्त के पहिले इन के ग्रन्थोल्लिखित वर्षमान या अन्यान्य मानों का वस्तुतः कहीं प्रचार होने का कोई प्रमाण नहीं मिलता। और ब्रह्म गुप्त ने अपने ग्रन्थ में आर्यभट-के दूषणों को सब से पहिले दिखलाया है। इस से ब्रह्मगुप्त के पहिले प्रथम--आर्यभट हुए यह सिद्ध होता है। द्वितीय आर्यभट के सिद्धान्त के किसी विषय का उल्लेख ब्रह्मगुप्त ने नहीं किया, यदि द्वितीय-आर्यभटग्रन्थ उस समय या उससे पहिले बना होता तो अवश्य इस का भी उल्लेख ब्रह्मगुप्त करते। "पञ्चसिद्धान्तिका" (जो शाके ४२१ का बना है) में अय गति का उल्लेख कुछ भी नहीं दीखता। पहिला आर्यभट, ब्रह्मगुप्त, लल्ल, इन के ग्रन्थों में अयनगांते का वर्णन नहीं है और इस द्वितीय आर्यसिद्धान्त में इसका वर्णन है। अधिक क्या कहा जावे-प्रथम आर्यभट के जो २ दूषण ब्रह्मगुप्त ने दिखलाये हैं, उस २ के उद्धार का यत्न, द्वितीय, आर्यभट ने किया है। इन के ग्रन्थ में युगपद्धति (सत, त्रेता, द्वापर, कलि) है; कल्प का आरम्भ रविवार को माना है, और पहिला आ० भ० में युग के आरम्भ में मध्यमग्रह एकत्र रहते, स्पष्टग्रह एकत्र नहीं रहते ऐसा लिखा है। इसका खण्डन ब्रह्मगुप्त ने किया है (अ० २। आर्या ४६) परन्तु द्वितीय आर्यभट के प्रमाण से सृष्टि के आरम्भ में स्पष्ट ग्रह एकत्र होते हैं इन सब प्रमाणों से ब्रह्मगुप्त के अनन्तर अर्थात् शाके ५८१ के अनन्तर २रे आ०भ० थे। यह उस समय का प्राचीन सिद्धान्त माना जाता और अर्वाचीन सिद्धान्त सब से पहिले आर्यकुलभूषण पं० भास्करा चार्य ने रचा। सिद्धान्त शिरोमणि के स्पष्टाधिकार के ६५ वें श्लोक में लिखा है कि " श्रीयर्यभटादिभिः सूक्ष्मत्वार्थं दृक्कोशोदयाः पठिताः " दृक्क्रोश अर्थात् राशि का तीसरा अंश (१० अंश)। प्रथम आर्यभट ने लग्नमान को तीस २ अंशों में किया है। दश २ अंशों का नहीं। परन्तु द्वितीय आ० भ० ने अ० ४ आर्या ३८-४१ में दृक्कोशोदय (लग्न- मान) कहा है। इस प्रमाण से दृक्कोशोदय साम्प्रत द्वितीय आर्यभट को छोड़ अन्य किसी ग्रन्थ में नहीं लिखा है। इस के अनुसार भास्कराचार्य के उक्त वाक्यानुसार आ०भ० पहिला नहीं, किन्तु द्वितीय आ० सि० ही सिद्ध होता है। जिस के अनुसार शाके १०७२ के पूर्व द्वितीय आर्यभट थे, ऐसा निश्चय होता है। द्वितीय आ० भ० ने अयनांश निकालने की रीति दियी है, इस के अनु-