आर्यभटीयम् (आचार्य आर्यभट - परमेश्वर टीका एवं हिन्दी अनुवाद)
Aryabhatiya of Aryabhata with Hindi Commentary
आचार्य आर्यभट (४७६ ई.) / पं. उदयनारायण सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका ॥ २९ सार अयनगति एकसी नहीं रहती वरञ्च उस में बहुत न्यूनाधिक्य होता है। परन्तु अयन गति सर्वदा एकसी रहती-ऐसा मानने पर भी इसकी सूक्ष्म गति मानी जाती है जिससे उस में बहुत थोड़ा अन्तर पड़ता है। आधुनिक सूर्य-सिद्धान्तोक्त अयनगति सब काल में एकसी रहती है परन्तु इस का काल ज्ञात नहीं ऐसा लिखा है। “राजमृगांक” ग्रन्थ में (शाके ९६४) अयनगति सब काल में एकसी रहती है ऐसा लिखा है। इस ग्रन्थ को पूर्व के बने ग्रन्थों में इस विषय के होने का प्रमाण अब तक नहीं मिला है। इस के अनुसार अर्यनगति का ज्ञान (बराबर) होने के पहिले द्वि० आ० भ० भट्टोत्पल के टीका में लिखा है। परन्तु दूसरे आ० भ० में ऐसा नहीं लिखा है जिस से द्वितीय आर्यभट भट्टोत्पल के पहिले थे ऐसा निश्चय होता है। उपरोक्त प्रमाणों से द्वि० आ० भट्टोक्त मेष-संक्रमण काल के उल्लेखानु- सार-द्वितीय आर्यभट का समय ८७५-सिद्ध होता है। इस द्वितीय आर्यसिद्धान्त में १८ अधिकार और ६२५ आर्या छन्द के श्लोक हैं। प्रथम १३ अध्यायों में करण ग्रन्थ के निराले २ अधिकारों का वर्णन है, चौदहवें में गोल सम्बन्ध विचार एवं प्रश्न हैं, १५ वें में १२० आर्या श्लो० में अङ्क गणित एवं क्षेत्रफल, घनफल का वर्णन है, १६वें में भुवन कोश का वर्णन है, १७वें में ग्रह मध्य की उपपत्ति इत्यादि हैं और १८ वें में बीजगणित, कुट्टक गणितहैं। इस में ब्रह्म गुप्त के ब्र० सि० से भी अधिक विषय हैं। इन ने संख्या दिखलाने का क्रम प्रथम आर्यभट से भी विलक्षण ही दिया है जैसा कि— वर्णा वर्णबोधितसंख्या वर्णा संख्या कँ, ट, प, य,= १ च, त, ष,= ६ ख, ठ, फ, र= २ छ, थ, स= ७ ग, ड, ब, ल= ३ ज, द, ह= ८ घ, ढ, भ, व= ४ झ, ध= ९ ङ, ण, म, श= ५ ञ, न= ० “अङ्कानां वामतो गतिः” यह नियम प्रथम आर्यभट ने नहीं लिखा है। हम ने यहां “द्वितीयआर्यभट” के समय आदि का विचार इस लिये किया है कि जिस से पाठकों को यह भ्रम न हो कि दोनों आर्यभटीय ग्रन्थों में पुराना कौनसा है-एवं दोनों ग्रन्थ एक ही ग्रन्थकार द्वारा बने या भिन्न २ द्वारा