आर्यभटीयम् (आचार्य आर्यभट - परमेश्वर टीका एवं हिन्दी अनुवाद)
Aryabhatiya of Aryabhata with Hindi Commentary
आचार्य आर्यभट (४७६ ई.) / पं. उदयनारायण सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका ॥ २१ नृत्य-गीत में प्रमत्त हैं। कुलाल चक्र की नाईं सम्पूर्ण राशिचक्र घूमता है । किन्तु सूर्य केन्द्र को त्याग नहीं करते हहुकाष्ठ की भांति केवल घूमते हैं। गोपीगण चक्र नृत्य में आदित्यदेव श्रीकृष्ण की प्रदक्षिणा करती हैं। क्या सुदृश्य मनोहर व्यापार है ! विराट पुरुष का विराट व्यापार !* विराट पुरुष के नाभि स्थल में सूर्य हैं। किन्तु, आदित्य देव पर्य्यन्त काल के वशवर्त्ती हैं। तृतीय दिन आदित्य देव को श्रीराधा नक्षत्र त्याग कर अनुराधा नक्षत्र में पदार्पण करना पड़ेगा । किस का साध्य है कि इस नियम को तोड़ सके? इधर गोपीगण रास में उन्मत्ता हैं। अनुरोध तो सुनेंगी नहीं; राम में बाधा डालेंगी नहीं। उधर श्रीकृष्ण ने अपना माया-जाल विस्तार किया । विराट के नाभि देशस्थित सूर्य कदम्ब पर स्थापित हुए और अयन मण्डल के दक्षिणस्थ गोलकार्द्ध निशामय हुआ। गोपी का-किरण वस्त्र अपहृत (छीनागया) हुआ ? अभ्रज्जन, चन्द्रावली, चन्द्रलेखा, तुङ्गदेवी- चम्पकलता, सुदेवी, और इन्दुलेखा प्रभृति तारा-सखियों को देख पाया। लज्जा से सखीगण नील समुद्र (१) में निमज्जित हुयीं किन्तु परङ्गु-प्रयास । रूप छिपा नहीं !!! इस रूपक में सूर्य श्रीकृष्ण कदम्ब कदम्बवृक्ष, तारागण गोपी, सूर्यकिरण वस्त्र, नील अन्तरिक्ष, कालिन्दी-जल, महर्षिगणारचित इस सुधामय रूपक वृक्ष ने जो विषमम फल धारण किया है, इस को देख कर महर्षिगण आत्म- ग्लानि से दग्ध प्रायः हो गये । रासलीला भङ्ग हुयी । श्रीकृष्ण व्रज (अयन- मण्डल) में चले । सम्मुख में अनुराधा नक्षत्र है। भ्रान्त आर्य्यकुल ! जो ज्योतिष- शास्त्र तुम्हारे शयन में, स्वप्न में, उत्सव में, व्यसन में, शोक में, सुख में, समाज में, विजन में, पाप में, पुण्य में, सहाय होता था; आज तुम लोग उसी ज्यो- तिषशास्त्र को भूल कर श्रीराधाकृष्ण के आह्लीन, रासलीला के अस्तित्त्व में विश्वास करते हो !!! कहां श्रीकृष्ण ! कहां राधा ! पृथिवी से करोड़ों योजन से अधिक दूरी पर सूर्य, उस से लक्ष २ गुण योजन अन्तर पर राशिचक्र के नक्षत्र श्रीराधा आदि अवस्थित, दुर्दशामें पड़ने से इतना मोह पैदा होता है। आदि जात आदित्यदेव श्रीकृष्ण का राशिचक्र ही "सुदर्शनचक्र" है । चक्री के उस चक्र के किरण जाल में प्रच्छन्न हो आर्य्यजाति, पुरस्थित प्राकृतिक रासलीला को देखनेमें असम होरही है । रूपक रक्षाके अनुरोध से, श्रीकृष्ण की रासलीला वर्णन में पुराणकार महर्षियों ने कौतुक छल से कुकथा में कहि-० *(१) अन्तरिक्ष का नाम है। ऋग्वेद १० । ६८ । ६-१२