आर्यभटीयम् (आचार्य आर्यभट - परमेश्वर टीका एवं हिन्दी अनुवाद)
Aryabhatiya of Aryabhata with Hindi Commentary
आचार्य आर्यभट (४७६ ई.) / पं. उदयनारायण सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२० -आर्य्यभटीयम्- "ततोऽखिल जगत्पद्मवोधायाच्युत भानुना ॥ देवकी पूर्व सन्ध्याया माविर्भूतं महात्मना ।" विष्णुपुराणे ५ अ० ३ श्लो० इतना भ्रान्त क्यों ? क्या वेदाङ्ग भूत ज्योतिषशास्त्र यह नहीं कहता है कि यशोदा (कृत्तिका का) की अधिष्ठात्री देवता दहन (अग्नि) और रोहिणी का कमलज (ब्रह्मा); अग्नि एवं ब्रह्मा एक ही हैं। इन ब्रह्मा के नाभि पद्म में ( राशि चक्र के केन्द्र में ) विष्णु या आदित्य देव अवस्थित हैं। यह देखो रोहिणी के शिरोभाग में प्रजापति ब्रह्मा हैं। यह ब्रह्मा ही नन्दराज हैं। रासलीला—वस्त्रहरण ॥ राशि चक्र से परिचय रहने पर रासलीला समझ में आ सकता है किन्तु "वस्त्रहरण" (लीला) समझने के लिये "गोलक" ज्ञान प्रयोजनीय है। पृथिवीस्थ ज्योतिर्विद्गण ने पृथिवी के मेरु दण्ड (axis) उत्तर में प्रसारित कर गोलक में जो विन्दु प्राप्त होते हैं, उस का नाम 'ध्रुवविन्दुरेखा' रक्खा है और पृथिवी से दृश्य गोलक, वि-षु-वत् मण्डल द्वारा द्विधा किया है। राशि चक्र के केन्द्रस्थ ज्योतिर्विद् (?) राशि चक्र के मेरु दण्ड को (axis) उत्तर में प्रसारित कर गोलक में जो बिन्दु प्राप्त होता उस का नाम कदम्ब रक्खा है। और इस केन्द्र से दृश्य गोलक अयनमण्डल द्वारा द्विधा किया है। मान लो कि 'कदम्ब' पर सूर्य को रखने से अयनमण्डल के दक्षिण भागस्थ दृश्यगोलकार्द्ध अन्धकारमय होगा। इस समय वस्त्रहरण देखो ! असील गोलक के बीच आदित्य देव अव- स्थित हैं। आदित्य देव का केन्द्र (centre) और गोलक का केन्द्र एक ही है ऐसा कहने में दोष नहीं। आदित्यमण्डल को वेष्टन कर राशि चक्र अवस्थित है; इस ससूर्य राशि चक्र का नाम 'सुदर्शनचक्र' है। इससे नाम की भी सार्थकता होती है। यह देखो ! सवितृ मण्डल के बीच नारायण श्रीकृष्ण इस केन्द्र में अवस्थिति कर ससूर्य राशि चक्र को कुलाल-चक्र की नाईं घुमाते हैं। श्रीकृष्ण इस कुलाल चक्र का शक्तिमय मेधि काष्ठ हैं। सूर्यमण्डल--कुलाल चक्र को हड़काष्ठ और राशि चक्र कुलाल चक्र का वेष्टन काष्ठ (बेलन काष्ठ) है। यही कुलाल चक्र रासलीला का आदर्श (१) है। गोपीगण (२७ नक्षत्र मय) राशिचक्र में अवस्थित रहकर सूर्य किरणरूपी वस्त्र में आवृत हो जगत् के चक्षु पर रह कर लोगों के अदृश्यभाव में (१) कुलालचक्रं प्रतिभं मण्डलं पद्मनाभशंकृतम् । इति उत्कलकलिका ॥