आर्यभटीयम् (आचार्य आर्यभट - परमेश्वर टीका एवं हिन्दी अनुवाद)
Aryabhatiya of Aryabhata with Hindi Commentary
आचार्य आर्यभट (४७६ ई.) / पं. उदयनारायण सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका ॥ १९ सानन्द आसीन हैं । रासलीला देखने के आनन्द में ३३ कोटि देवता के साथ विद्याधर, अप्सरागण, यक्ष, रक्ष, गन्धर्व, किन्नर, पिशाच, गुह्यक, सिद्धाचरण, दैव, दानव, असुर, आदि परिवृत्त होकर रासमण्डल के ऊर्द्ध देश (१) में आसीन हैं। इसी उपलक्ष्य से श्रीराधा 'ब्रजेश्वरी', 'रासेश्वरी', आदि पुराणों में कही गयीं हैं । और महर्षि वाल्मीकि ने विशाखा को सूर्य्यवंश का कुल नक्षत्र कह कर वर्णन किया है । और बङ्गाल के कवियों ने "रायो राजा," “रायी किशोरी” नाम से श्रीराधा का नाम कीर्त्तन किया है और उसी से पाश्चात्य ज्योतिषी लोगों ने श्रीराधा नक्षत्र पर राजमुकुट वाला लिखा (Corona) (२) है। आज राशिचक्र के केन्द्र स्थान में श्रीकृष्ण (सूर्य्यदेव) और उन के दक्षिण भाग में बलदेव (वृषचक्र) अवस्थित हैं । और राशिचक्र में गोपी- गण (तारकागण) श्रीराधा और ८ सखियों के सन्निकटतानुसार में चक्र व्यूह में नाच कर कृष्ण बलराम को प्रफुल्लित करती हैं। बलदेव जी भी प्रमोदित हो चक्र नृत्य में साथ दिया। राधेश्वर वासुदेव चक्र व्यूह की गति परीक्षा करते हैं। कार्त्तिकी चन्द्रिका ज्योत्स्ना बाहु-विस्तार पूर्व्वत कम्बल, गन्ध, वातान आलिङ्गन कर स्नेह में डूब रही हैं । कार्त्तिकी परिशोभा के रतिमय ज्योत्स्ना सागर में तीनों जगत् बह चले। आनन्द मय सुखाम्बु सागर में जीव मात्र के हृदय निमग्न और अभिषिक्त हुए । अकथनीय विमल ज्योत्स्ना जल में विश्व ने अव- गाहन किया । बाहुली (कार्त्तिकी) ज्योत्स्ना ने सुफलता को विस्तार कर ब्रह्मर्षि देवर्षि और राजर्षिगण को आलिङ्गन कर विमुग्ध किया। इस मोह में विमुग्ध होकर हमारे ऋषियों ने सूर्य्य भूतरूप सर्व्वव्यापी परम पुरुष को सूक्ष्मभाव से ज्ञानकृत रूप से सवितृमण्डल मध्यवर्त्ती नारायण का ही वर्णन किया है। और सवितृमण्डल ही इस प्राकृतिक शोभा की (३) मूल कारण है कहने से सवितृमण्डल को ही विष्णुभाव से पूजा किया करते थे। और श्रीकृष्ण लीला की रूपक रचना कियी हैं। आदितिनन्दन आदित्य देव में और देवकी नन्दन श्रीकृष्ण में भेद कहां ? क्या ऋषियों ने सतर्क नहीं कर दिया है कि “अदितिर्देवकीह्यभूत् (हरिवंशे) (अदिति) और “देवमाता च देवकी” (ब्रह्मवैवर्त्ते जन्मखण्डे) क्या ऋषियों ने इङ्गित नहीं कर दिया है कि आ- दित्यदेव ही देवकीनन्दन हैं ? (१) - गोलक में ५००० वर्ष पहिले यह दृश्य था इस समय अब उतना सुदृश्य नहीं रहा ।। (२) - श्रीराधा के शिर पर किरीटमण्डल (Corona) (३) सूर्य्यकिरण चन्द्रमण्डल में प्रतिफलित होने से ज्योत्स्ना की उत्पत्ति होती है ।