आर्यभटीयम् (आचार्य आर्यभट - परमेश्वर टीका एवं हिन्दी अनुवाद)
Aryabhatiya of Aryabhata with Hindi Commentary
आचार्य आर्यभट (४७६ ई.) / पं. उदयनारायण सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२ आर्य्यभटीयस्य- समुद्र-मन्थन । “ऋषीणां भारतीभाति सरला-गहनान्तरा । धीरोस्तत्तत्व मृच्छन्ति मुह्यन्ति प्राकृता जनाः” ॥ ॰ भा०:-अर्थात् प्राचीन ग्रन्थों की वाक्य-शैली ऊपर से तो बहुत सरल मालूम होती है परन्तु उन के आशय बहुत कठिन हुआ करते जिन को विद्वान् लोग तो समझ लेते पर प्राकृत पुरुष मुग्ध होकर अर्थ का अनर्थ करने लगते हैं ॥ समुद्र-मन्थन उपाख्यान महाभारत के आदि पर्व में १५-से १९ अध्यायों में इस प्रकार वर्णित है कि:- एक समय महात्मा देवगण सुमेरु पर्वत के ऊपर एकत्र होकर अमृत प्राप्ति के लिये परस्पर विचार करने लगे । इसी अवसर में परम देव नारा- यण आकर बोले “हे पितामह ! देवगण और असुरगण मिलकर समुद्र मथन में प्रवृत्त हों । इस के अनुसार देव और असुर गण मन्थन-दण्ड के योग्य मन्दर पर्वत को उखाड़ने लगे, परन्तु वे कृत कार्य्य न हो सके । इस के बाद परम देव नारायण की आज्ञानुसार अनन्त देव ने मन्दर पर्वत को जड़ से उखाड़ा और देवगण मन्दर पर्वत को लेकर समुद्र के तीर पर आये । अमृत पाने की आशा में समुद्र अपने मन्थन में सम्मत हुआ-और कूर्मर राज ने मन्दर पर्वत को अपने ऊपर धारणा करना स्वीकार किया ॥ देव राज इन्द्र, कूर्म के पीठ पर ‘मन्दर’ रख कर मन्थन रज्जु (म- हने की डोरी) वासुकी (सर्प) द्वारा मन्दर को बांधकर समुद्र मन्थन में प्रवृत्त हुए । असुरों ने वासुकी के गले के ऊपरले भाग को पकड़ा। और देवगण ने पूच्छ की ओर पकड़ा । विलोडन करते २ मन्दर पर्वत पर के बड़े २ वृक्षों और औषधियों से निर्यास और रस समुद्र जल में निपतित होने लगा और अमृत के तुल्य रस स्रोत में देवताओं का शरीर आमृत होने लगा, देवगण अमर हुए । अपूर्व रस से मिश्रित हो समुद्र का जल दूध हो गया और दूध से घृत उत्पन्न हुआ । समुद्र मन्थन में पहिले दूध से चन्द्रमा उत्पन्न हुए और घृत से लक्ष्मीदेवी सुरादेवी, उच्चैःश्रवा नामक घोड़ा और अत्यन्त उज्ज्वल कौस्तुभ मणि क्रमशः उत्पन्न हुए। कौस्तुभ मणि परम देव नारायण ने अपने हृदय में धारण किया।