आर्यभटीयम् (आचार्य आर्यभट - परमेश्वर टीका एवं हिन्दी अनुवाद)
Aryabhatiya of Aryabhata with Hindi Commentary
आचार्य आर्यभट (४७६ ई.) / पं. उदयनारायण सिंह द्वारा
पृष्ठ 3, कुल 134 में से
संदर्भ में पढ़ेंओ३म् प्रस्तावना । वेद आर्यशास्त्रों का शिरोभूषण है । वेद सम्पूर्ण आर्यशास्त्रों की अपेक्षा प्राचीन और सब शास्त्रों का एकमात्र आकर कह कर प्रसिद्ध है । विदेशीय-जर्मेन देश वासी पं० महमैल मूलर साहब कहते हैं कि-*वेद सब विद्याओं का मूल है । अङ्ग सहित वेद ज्ञान विना-भारतवर्षीय किसी आर्यग्रन्थ पर कुछ लेख लिखना बहुत कठिन है। आज ऐसे अमूल्य रत्न वेद का-यथावत् प्रचार न होने के कारण हमारे देश में प्रति दिन मत मतान्तरों तथा फूट की वृद्धि होती जाती है और लोगों को वैदिक धर्म से अश्रद्धा होती जाती है । इस वेद के तात्पर्य समझने के लिये हमारे ऋषियों ने इस के छः अङ्ग रचे हैं । इन शिक्षा आदि छः अङ्गों में से-वेदाङ्ग ज्योतिष के न जानने से हम भारतवासिगण वेद, शास्त्र, पुराण प्रतिपादित गूढ़ार्थ के सम- झने में असमर्थ होकर वेद, ब्राह्मण, पुराण, तन्त्र आदि प्रतिपादित ज्योतिष मूलक आध्यात्मिक वर्णन का उलटा वो निन्दित आशय समझ कर हम अपने ऋषियों को गुरुतल्पगामी, किन्हीं को चोर, ब्रह्मा को अपनी कन्या के पीछे मैथुनार्थ दौड़ना, रासलीला, यमयमी सम्बाद ( भाई वहन का सम्बन्ध ) श्रीकृष्ण जी का व्रजाङ्गनाओं के साथ नाचना आदि अकर्त्तव्य कर्म करना, गौतम अहल्या की कथा, चन्द्रमा की ३३ कन्या, समुद्र-मथन आदि का युक्ति- युक्त तात्पर्य नहीं समझ समझा सकते । आज हम उन्हीं उपरोक्त आलंङ्का- रिक लेखों में से-दो तीन लेखों का असली तात्पर्य पाठकों को सुनावेंगे- जिस से हमारे पाठक यह समझ जायेंगे कि निस्सन्देह असली "सिद्धान्त- ज्योतिषशास्त्र" के जानने ही से वेद, ब्राह्मण, पुराण, आदि प्रोक्त उपाख्यानों की सङ्गति लगा सकेंगे। अब हम यहां पहिले 'समुद्रमथन,' 'रासलीला' और 'वस्त्र हरणलीला' का रहस्य कह कर-"आर्यभटीय" पुस्तक का अनुवाद करेंगे। उदयनारायणसिंह-अनुवादक
Every one acquainted with indian literature must have observed how impossible it is to open any book on Indian subjects without being thrown back upon an earlier authority; which is generally acknowledged by the Indians as the basis of all thier knowledge whether sacred or profane. This earlier authority which we find alluded to in theological and philosophical works as well as in poetry in codes of law in astronomical, grammatical, matrical and lexicographical compositions is called by one comprehensive name the Veda. (P. Max Muller H of Ancient Sanskrit Literature, P. 2)