भारतकोश
आर्यभटीयम् (आचार्य आर्यभट - परमेश्वर टीका एवं हिन्दी अनुवाद)

आर्यभटीयम् (आचार्य आर्यभट - परमेश्वर टीका एवं हिन्दी अनुवाद)

Aryabhatiya of Aryabhata with Hindi Commentary

आचार्य आर्यभट (४७६ ई.) / पं. उदयनारायण सिंह द्वारा

DevanagariSanskritpublished134 पृष्ठ

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४ आर्य्यभटीयस्य- असुर गण ने स्वर्ग राज्य पर अपना अधिकार जमाया । यज्ञ आदि एक मात्र बन्द हो गया । भूख से पीड़ित इन्द्र आदि कों ने निरुपाय हो सुमेरु पर्वत की चोटी पर जाय ब्रह्मा की शरण लियी । और ब्रह्मा, प्रमुख देवगण की स्तुति से सन्तुष्ट होने परमदेव नारायण ने देवराज इन्द्र को उपदेश दिया कि अमृत- पान हे बलवान् न हो कर तुम असुरों गण को रण में जीत नहीं सकते । और देवता एवं असुरों के मिले बिना समुद्र मन्थन से अमृत मिलने का अन्य दूसरा उपाय नहीं । इसलिये असुरगण के साथ कपट सन्धि कर दोनों दल मिलाकर समुद्र मन्थन करो । समुद्र मन्थन से उत्पन्न अमृत परिवेश्न के समय मैं असुरों को ठग कर देवताओं को अमृत पान कराऊंगा । नारायण के आदेश से ईन्द्र ने असुर पति रैवत मनु-पुत्र बलि राजा के साथ सन्धि स्थापन कर समुद्र मन्थनार्थ उद्योग किया । इस के बाद देवता और असुर गण ने मन्दर पर्वत को उखाड़ा और गरुड़ के पीठ पर मन्दर को रख कर समुद्र के किनारे ले आये । समुद्र मन्थन के पहिले हलाहल विष और क्रम से सुरभि, उच्चैःश्रवा, ऐरावत, ८ दिग्गज, और अभ्रमु प्रभृति ८ हस्तिनी, पारिजात पुष्प, अप्सरा, कमला देवी, वारुणी, कलस हस्त धन्वन्तरि ऊपर हुए । राहुबध उपाख्यान इस पुराण में भी है । विष्णुपुराण के १ म अंश, ९ म० अध्याय में समुद्र मन्थन का वर्णन है ॥० विष्णुपुराण के मत से समुद्र मन्थन में पहिले सुरभि, क्रम से वारुणी, पारि- जात, शीतांग्शु चन्द्रमा, हलाहल विष, कमण्डलु हस्त धन्वन्तरि, और श्रीदेवी उत्पन्न हुईं । किन्तु विष्णुपुराण में राहुवध का वर्णन नहीं है । ब्रह्म वैवर्त्त पुराण के प्रकृति खण्ड के ३८ वें अध्याय में समुद्र मन्थन का वर्णन है । ब्रह्माण्ड पुराण के मत से समुद्र मन्थन में सब से पहिले धन्वन्तरि और क्रम से अमृत, उच्चैःश्रवा, नाना रत्न, ऐरावत, लक्ष्मीदेवी, सुदर्शन चक्र निकले हुए । इन के अतिरिक्त अन्यान्य पुराणों में भी समुद्रमन्थन का वर्णन है । पुराणों में समुद्र मन्थन का वर्णन है कहने से अशिक्षित लोगों में इस व्यापार को रूपक कह कर ग्रहण करना नहीं चाहते । किन्तु उपाख्यान के सम्भव या असम्भव होने की समालोचना करने पर इस की रचना अर्थवाद से भरा है यह सहज ही में सिद्ध होता है । पहिले तो मन्दर पर्वत का उखाड़ना कैसे सम्भव होगा ? दूसरे मथने की रस्सी वासुकी (सर्प) मथते समय जब उसी वासुकी शेष ने मन्दर पर्वत को