आर्यभटीयम् (आचार्य आर्यभट - परमेश्वर टीका एवं हिन्दी अनुवाद)
Aryabhatiya of Aryabhata with Hindi Commentary
आचार्य आर्यभट (४७६ ई.) / पं. उदयनारायण सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका ॥ ५
धारण किया तो उस समय पृथिवी किस पर थी ? (क्योंकि पुराण में लिखे अनुसार लोग समझते हैं कि शेष नाग पर पृथिवी ठहरी है) तीसरे, पृथिवी पृष्ठ २० करोड़ वर्ग माइल है, उस में १५ करोड़ माइल में समुद्र विस्तृत है । इस सुविस्तीर्ण समुद्र का मन्थन कैसे सम्भव हो सकता ? चौथे, विष्णुपुराण के मत से महर्षि दुर्वासा प्रदत्त पारिजात माला देवराज इन्द्र ने ऐरावत के शिर पर पहिना दिया, ऐरावत कर्त्तृक महर्षि प्रसादभूत यह पारिजात माला भूमि के ऊपर फेंकी गई इस से महर्षि दुर्वासा के क्रोध की उत्पत्ति हुई । और उसी क्रोध के कारण महर्षि का शाप हुआ। उस के पश्चात् समुद्र मन्थन में ऐरावत की उत्पत्ति हुई यह क्योंकर सम्भव होगा ? पञ्चम, महाभारत में लिखा है कि समुद्र मन्थन से निकले हुये रत्न आदित्यमार्ग से (अयन मार्ग से) देवताओं के समीप गये । यदि देवगण ने पृथिवी पर आकर पृथिवी पर के मन्दर पर्वत को उखाड़ कर पृथिवी पर के समुद्र के तीर में रहकर समुद्र मन्थन किया, तो मथने से उत्पन्न रत्न आदि आकाशस्थ अयन मार्ग में किस प्रकार देवताओं के निकट जासकते ? सुतरां यह अवश्य ही मानना पड़ेगा कि इस उपाख्यान में अवश्य ही कोई अति गूढ़ अभिप्राय है । वेद पढ़ने से हमे इस बात का ज्ञान हुआ है कि 'समुद्र,' 'सागर,' शब्दों से अधिकतर स्थानों में जल का वर्णन किया गया है । और वेदाङ्ग + निरुक्त शास्त्र में (१४।१५) “अन्तरिक्ष नामानि सगर समुद्र” ऐसा उल्लिखित है । “समुद्रात् अन्तरिक्षात् इति सायनः” । और पुराण में जल शब्द कारण वारि अर्थ में व्यवहृत दृष्ट होता है *सुतरां महर्षियों ने पुराणों में समुद्र मन्थन समय में समुद्र और सगर शब्द को आ- काश अर्थ में व्यवहार किया है ऐसा बोध होता है। और समुद्र मन्थन अर्थ से आकाशस्थ पदार्थ का मन्थन समझना उपाख्यान को सङ्गत और संलग्न होना- बोध होता है। और मन्थन से निकले हुए रत्न आदि देवता के निकट अयन मार्ग से जा सकते । समुद्र मन्थन उपाख्यान का प्रकृत अर्थ यह है कि समुद्र नाम अन्तरिक्ष और मन्थन नाम-खगोलस्थ दिव्य ग्रह, नक्षत्र आदिक के रूप, गति स्थिति आदि का पता लगाना (Astronomical deep enquiry) से
- सुदासे दंस्रा वसु बिभ्रता रथे वृक्षो वहतमश्विनी । रयिं समुद्रा दुत दिवस्पृशंस्मे धत्तं पुरुस्पृहम् । ऋग्वेदे ।०१ । ४७ । ६ । *उत्ससर्ज च कोपेन ब्रह्माण्डं गोलके जले। ब्रह्म वै० पु० प्रकृतखण्डे २।५०