आर्यभटीयम् (आचार्य आर्यभट - परमेश्वर टीका एवं हिन्दी अनुवाद)
Aryabhatiya of Aryabhata with Hindi Commentary
आचार्य आर्यभट (४७६ ई.) / पं. उदयनारायण सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४ गीतिका पा । भा०: त्रिभुजक्षेत्र के जो दो तुल्य दल (अर्द्धभाग) कोटी । अर्थात् लम्ब । त्रि- भुज के अंधोगत भुजा को भूमि (आधार) कहते हैं । ऊपर के कोण से आधार तक जो लम्ब सूत्र उसे "लम्ब" कहते हैं । आधार के अर्द्धभाग को लम्ब से गुणन करने पर-गुणनफल "त्रिभुज क्षेत्र" का फल होगा ॥ एवं आधीगीतिका अर्थ हुआ ॥ ऊर्ध्वभुजातत्सवंर्गाधं स घनष्षडश्रिरिति ॥ ६ ॥ ऊर्ध्वभुजा क्षेत्रमध्योच्छ्रायः । तदिति क्षेत्रफलम् । ऊर्ध्वभुजायाः क्षेत्र फलस्य च संवर्गाधं यत् स घनः। घनफलं भवति। स क्षेत्रविशेषष्षडश्रिश्च भ वांत षड्बाहुर्भवति । सर्वतस्त्रिकोशं क्षेत्रमित्यर्थः । लम्बावगतिस्तु त्रिभुज भुजयोर्योगस्तदन्तरगुणो भुवाहतो लब्ध्या द्विस्या भूरूनयुता दलिताबाध तयोस्स्याताम् । स्वाबाधाभुजकृत्योरन्तरमूलं प्रजायते लम्ब इत्यनेन वेद्या युक्त्या च तत्सिध्यति । युक्तिस्तु लीलावतीव्याख्यायां प्रदर्शिता । लम्बत्तद र्धयोर्वर्गान्तरपदमत्रोर्ध्वबाहुर्भवति ॥ वृत्तक्षेत्रफलं पूर्वार्धेनाह । ऊर्द्धर्ध्वभुजा (खेत के बीच का उच्छ्राय) और क्षेत्रफल का संवर्ग का जो अर्द्ध भाग-वह 'घन' होता है । अर्थात् वह क्षेत्र "षडस्रि" या "षड्बा हु" होता है। अथवा यों समझो कि वह सब ओर से "त्रिकोण" होताहै ॥६॥ समपरिणाहस्यार्धं विष्कम्भार्धहतमेव वृत्तफलम् ॥ समपरिणाहस्य'समवृत्तक्षेत्रपरिधेरर्धं 'विष्कम्भार्धहतं वृत्तक्षेत्रफलं भवति । वृत्तक्षेत्रफलाननयनेऽयमेव प्रकारस्सूक्ष्म इत्येवशब्देन प्रदर्शयति ॥ घनसमवृत्त क्षेत्रस्य फलमपरार्धेनाह । समवृत्त क्षेत्र के परिधि के आधे को व्यास के आधे भाग से गुणन क- रने पर गुणनफल वृत्तक्षेत्र'का फल होगा॥६ एवं आधी गीतिका का अर्थ है। तन्निजमूलेन हतं घनगोलफल निरवशेषम् ॥ ७ तत्समवृत्तक्षेत्रफलं निजमूलेन स्वकीयमूलेन हतं घनगोलफलं भवति । नि- रवशेषं स्फदमित्यर्थः ॥ विषमचतुरश्रादीनामन्तः कर्णयोस्संपातादधलम्बकोर्ध्वा- धरखण्डप्रमाणं क्षेत्रफलञ्चाह । और उक्त समवृत्त क्षेत्रफल को स्वकीय मूल से गुणन करने पर स्फुट- घन गोल फल होगा ॥ ७ ॥ आयामगुणे पार्श्वे तयोर्गहृते स्वपातरेखे'ते । विस्तरयोगाधंगणे ज्ञेयं क्षेत्रफलमायामे ८ ॥